ईरान जंग के बीच UAE का बड़ा फैसला : 60 साल बाद OPEC से अलग, वैश्विक तेल बाजार में हलचल

दुबई। मिडिल ईस्ट पूर्व में बढ़ते तनाव और बदलते ऊर्जा समीकरणों के बीच UAE (संयुक्त अरब अमीरात) ने एक बड़ा भू-राजनीतिक फैसला लेते हुए OPEC और OPEC+ से अलग होने की घोषणा कर दी है। करीब छह दशक तक इस संगठन का हिस्सा रहने के बाद UAE का यह कदम वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए अहम माना जा रहा है।
UAE सरकार ने अपने बयान में कहा कि बदलते आर्थिक दृष्टिकोण और ऊर्जा क्षेत्र में तेजी से हो रहे बदलावों को देखते हुए यह निर्णय लिया गया है। OPEC+ समूह में रूस भी शामिल है, इसलिए इससे बाहर निकलना एक व्यापक रणनीतिक बदलाव का संकेत माना जा रहा है।
OPEC के लिए बड़ा झटका
UAE का बाहर होना OPEC, खासकर उसके प्रमुख सदस्य सऊदी अरब के लिए बड़ा झटका है। यह संगठन वैश्विक तेल उत्पादन का करीब 36% नियंत्रित करता है और लगभग 80% तेल भंडार पर प्रभाव रखता है। UAE लंबे समय से उत्पादन कोटा बढ़ाने की मांग कर रहा था, क्योंकि वह अपनी उत्पादन क्षमता को OPEC द्वारा तय सीमाओं से कहीं अधिक बढ़ाना चाहता है।
OPEC की स्थापना 1960 में सऊदी अरब, इरान, इराक, वेनेजुएला और कुवैत ने मिलकर की थी। UAE 1967 में इसमें शामिल हुआ था और आज दुनिया के टॉप 10 तेल उत्पादक देशों में गिना जाता है।
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उत्पादन और नियंत्रण पर असर
विशेषज्ञों के अनुसार, UAE के अलग होने से OPEC अपनी लगभग 15% उत्पादन क्षमता खो सकता है। UAE हर साल करीब 2.9 मिलियन बैरल तेल का उत्पादन करता है, जबकि सऊदी अरब अकेले लगभग 9 मिलियन बैरल का उत्पादन करता है।
अब सऊदी अरब के लिए संगठन के बाकी सदस्यों को एकजुट रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। साथ ही, अन्य सदस्य देशों में भी असंतोष बढ़ सकता है, जिससे भविष्य में और देशों के बाहर होने की आशंका जताई जा रही है। यह स्थिति वैश्विक ऊर्जा राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है।
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भारत पर संभावित असर
इस फैसले का असर भारत जैसे बड़े आयातक देशों पर भी पड़ सकता है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है। ऐसे में अगर UAE उत्पादन बढ़ाता है, तो कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आ सकती है, जिससे भारत को राहत मिल सकती है।
हालांकि, अमेरिका और इरान के बीच जारी तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति को देखते हुए तेल बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है।
बीते कुछ वर्षों में भारत और UAE के बीच रणनीतिक साझेदारी मजबूत हुई है। UAE भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) का एक प्रमुख स्रोत भी है। ऐसे में UAE का यह फैसला भारत के लिए जोखिम और अवसर दोनों लेकर आ सकता है।











