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रेटिनोपैथी ऑफ प्री मैच्योरिटी के इलाज से 9 माह में बची 88 मासूम आंखों की रोशनी

विश्व दृष्टि दिवस आज ऑक्सीजन भी नवजात की आंखों के लिए खतरा
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रेटिनोपैथी ऑफ प्री मैच्योरिटी के इलाज से 9 माह में बची 88 मासूम आंखों की रोशनी

भोपाल। समय से पहले जन्मे शिशु के लिए ऑक्सीजन प्राणदायी होती है। कृत्रिम ऑक्सीजन इन कमजोर नवजातों का जीवन तो बचाती है, लेकिन ज्यादा मात्रा में कृत्रिम ऑक्सीजन से नवजातों की आंखों की रोशनी जाने का खतरा बढ़ जाता है। इसे रेटिनोपैथी ऑफ प्री मैच्योरिटी (आरओपी) कहते हैं। जन्म के बाद आंखों की जांच न होने पर इन बच्चों की आंखों की रोशनी जा सकती है। बच्चों को इस समस्या से बचाने के लिए हमीदिया अस्पताल के नेत्ररोग विभाग में आरओपी क्लीनिक चलाई जा रही है। यहां बीते नौ महीने में 88 मासूमों की आंखों की रोशनी बचाई जा चुकी है।

हर महीने आते हैं करीब 100 बच्चे

हमीदिया अस्पताल के नेत्ररोग विभाग में हर महीने 100 से ज्यादा प्रीमेच्योर बच्चे आते हैें। इन बच्चों की जांच में करीब 10 फीसदी बच्चे आरओपी से पीड़ित होते हैं। जनवरी से सितंबर तक यहां 975 बच्चों की जांच की गई, जिसमें से 88 बच्चों में यह बीमारी मिली। इलाज के बाद इन बच्चों की आंखों की रोशनी बच गई।

ऑक्सीजन लगाने से कम होता है विजन

हमीदिया अस्पताल के नेत्ररोग विभाग की एचओडी डॉ. कविता कुमार बताती हैं कि 27 से 30 हफ्ते में जब प्रीमेच्योर बच्चा पैदा होता है, तो उसे रिवाइव करने के लिए वेंटीलेटर पर रखा जाता है। इस दौरान कई बार उसे लंबे समय तक ऑक्सीजन दी जाती है। इससे बच्चों की आंखों के आसपास खून का प्रवाह बढ़ जाता है और नवजात का विजन कम होना शुरू हो जाता है।

चार सप्ताह तक होती है जांच, तब पकड़ में आती है बीमारी

डॉ. कुमार के मुताबिक आरओपी की जांच इतनी आसान नहीं होती। दरअसल बच्चों में इसके लक्षण एक से चार सप्ताह के बीच सामने आते हैं। उनका कहना है कि ऐसे में प्रीमेच्योर बच्चे की चार बार यानी हर सप्ताह जांच की जाती है। तब बीमारी पकड़ में आती है। इसके बाद नवजात को दवा, लेजर या ऑपरेशन के माध्यम से इलाज किया जाता है।

शिशु रोग विशेषज्ञ नहीं भेजते आंखों के डॉक्टर के पास

नेत्र रोग विशेषज्ञों का कहना है कि इस बीमारी से बच्चों को बचाने में शिशुरोग विशेषज्ञों की बड़ी भूमिका है। शिशु रोग विशेषज्ञ एसएनसीयू में भर्ती बच्चों को जांच के लिए नेत्ररोग विशेषज्ञों के पास नहीं भेजते। खासकर छोटे शहरों में इसको लेकर जागरूकता नहीं है। अगर समय पर जांच हो जाए, तो बच्चों की दृष्टि बचाई जा सकती है।

(इनपुट-प्रवीण श्रीवास्तव)
Javedakhtar Ansari
By Javedakhtar Ansari

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