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‘मजिस्ट्रेट ने नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे की?’ CJP प्रोटेस्ट मामले में छात्र को नोटिस पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

ग्रेटर नोएडा में CJP प्रोटेस्ट से जुड़े मामले ने अब सुप्रीम कोर्ट का रुख कर लिया है। गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के छात्र अक्षत त्रिपाठी को पांच लाख रुपये के निजी बॉन्ड का नोटिस दिए जाने पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कड़ी नाराजगी जताई।
‘मजिस्ट्रेट ने नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे की?’ CJP प्रोटेस्ट मामले में छात्र को नोटिस पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
ग्रेटर नोएडा में छात्र को नोटिस देने पर CJI सूर्यकांत की सख्त नाराजगी

ग्रेटर नोएडा में CJP यानी कॉकरेच जनता पार्टी के प्रस्तावित प्रदर्शन से जुड़ा मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी के छात्र अक्षत त्रिपाठी को जारी किए गए एक नोटिस पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। छात्र को पांच लाख रुपए के Personal Bond का नोटिस दिया गया था। मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने हुई। वरिष्ठ अधिवक्ता बिश्वजीत भट्टाचार्य ने कोर्ट को बताया कि छात्र के खिलाफ यह कार्रवाई ऐसे समय में की गई, जब सुप्रीम कोर्ट पहले ही छात्रों से जुड़े मामले में FIR रद्द कर चुका है और छात्रों के खिलाफ जबरन कार्रवाई पर रोक लगाने के निर्देश दे चुका है। इस पर कोर्ट ने संबंधित अधिकारी की कार्रवाई को लेकर सवाल उठाए।

छात्र अक्षत त्रिपाठी को क्यों भेजा गया नोटिस?

मामला गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी के दूसरे वर्ष के छात्र अक्षत त्रिपाठी से जुड़ा है। चार सितंबर 2026 को जारी नोटिस में पुलिस रिपोर्ट का हवाला दिया गया था। पुलिस रिपोर्ट में आरोप लगाया गया कि अक्षत यूनिवर्सिटी के छात्रों के बीच सरकार विरोधी और भ्रामक बातें फैला रहे थे। उन पर छात्रों को CJP के प्रस्तावित धरने में शामिल होने के लिए कथित तौर पर प्रेरित करने का भी आरोप लगाया गया। पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में आशंका जताई थी कि ऐसी गतिविधियों से यूनिवर्सिटी में तनाव बढ़ सकता है और लड़ाई-झगड़े या शांति भंग होने की स्थिति पैदा हो सकती है। इसी रिपोर्ट के आधार पर कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS की धाराओं 126 और 135 के तहत कार्रवाई शुरू करने का आधार माना।

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5 लाख रुपए के बॉन्ड का था मामला

कार्यकारी मजिस्ट्रेट की ओर से अक्षत त्रिपाठी को कारण बताओ नोटिस भेजा गया था। इसमें उनसे पूछा गया था कि शांति बनाए रखने के लिए उनसे पांच लाख रुपए का Personal Bond क्यों न लिया जाए। इसके साथ ही दो जमानतदारों से भी पांच-पांच लाख रुपए के Personal Bond की मांग की गई थी। यानी छात्र को  बड़ी आर्थिक जिम्मेदारी वाले बांड की प्रक्रिया का सामना करना पड़ सकता था। वरिष्ठ अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि नोटिस पर कार्रवाई होने वाली थी। हालांकि, मामला मीडिया में आने के बाद संबंधित नोटिस वापस ले लिया गया।

नोटिस वापस हुआ, फिर भी सुप्रीम कोर्ट नाराज

नोटिस वापस लिए जाने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने मामले को हल्के में नहीं लिया। सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने सवाल किया कि अगर नोटिस वापस ले लिया गया है तो अब कार्रवाई का आधार क्या बचता है। वकील की ओर से कहा गया कि नोटिस वापस लेने से मामले की गंभीरता खत्म नहीं हो जाती। उन्होंने इसे सुप्रीम कोर्ट के आदेश और उसकी गरिमा से जुड़ा विषय बताया। इसके बाद चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए सवाल किया कि सुप्रीम कोर्ट के पहले से दिए गए स्पष्ट निर्देशों के बावजूद मजिस्ट्रेट ने छात्र को नोटिस कैसे जारी कर दिया।

CJI ने पूछा- ‘मजिस्ट्रेट ने ऐसा करने की हिम्मत कैसे की?’

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने बेहद सख्त रुख अपनाया। उन्होंने सवाल किया कि जब सुप्रीम कोर्ट छात्रों के खिलाफ जबरन कार्रवाई पर रोक लगा चुका था, तब संबंधित मजिस्ट्रेट ने छात्र को नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे की। कोर्ट की इस टिप्पणी से साफ है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर गंभीर है। अदालत अब यह जानना चाहती है कि उसके पहले के आदेश के बावजूद छात्र के खिलाफ किस आधार पर कार्रवाई शुरू की गई।

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सुप्रीम कोर्ट अब अधिकारी से मांगेगा जवाब

चीफ जस्टिस ने वरिष्ठ अधिवक्ता से कहा कि नोटिस को उचित याचिका के माध्यम से रिकॉर्ड पर लाया जाए। कोर्ट ने संकेत दिया कि संबंधित कार्यकारी मजिस्ट्रेट से इस कार्रवाई को लेकर स्पष्टीकरण मांगा जा सकता है। इसका मतलब यह है कि नोटिस वापस लिए जाने के बावजूद मामला पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। सुप्रीम कोर्ट अब यह देख सकता है कि अधिकारी ने किस आधार पर छात्र के खिलाफ BNSS की धाराओं के तहत कार्रवाई शुरू की थी।

छात्रों के बीच डर का माहौल बनने का आरोप

वरिष्ठ अधिवक्ता ने कोर्ट में यह भी कहा कि इस तरह के नोटिस छात्रों के बीच डर पैदा कर सकते हैं। उनका तर्क था कि अगर किसी छात्र को प्रदर्शन में शामिल होने के आरोप में इतनी बड़ी राशि के Personal Bond का नोटिस दिया जाता है, तो इससे दूसरे छात्र भी अपनी बात रखने से डर सकते हैं। हालांकि, पुलिस की रिपोर्ट में छात्र पर सरकार विरोधी और भ्रामक बातें फैलाने तथा प्रदर्शन के लिए छात्रों को कथित रूप से प्रेरित करने के आरोप लगाए गए थे। इन आरोपों की अंतिम वैधता और कार्रवाई का आधार अब कोर्ट के सामने जांच का विषय है।

अब आगे क्या होगा?

अब सुप्रीम कोर्ट इस मामले में संबंधित अधिकारी से स्पष्टीकरण मांग सकता है। अदालत यह देखेगी कि पहले के आदेशों के बावजूद छात्र को नोटिस जारी करने की जरूरत क्यों पड़ी और क्या यह कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप थी।

Garima Vishwakarma
By Garima Vishwakarma

गरिमा विश्वकर्मा | People’s Institute of Media Studies से B.Sc. Electronic Media की डिग्री | पत्रकार...Read More

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