मक्का समझौते के बाद पाकिस्तान को मिला सुरक्षा कवच? भारत के एक्शन पर क्या करेंगे तुर्की और सऊदी

पाकिस्तान के नए सैन्य गठजोड़ की दिशा में इसे महत्वपूर्ण कदम बताया जा रहा है। पाकिस्तान इससे पहले शीत युद्ध के दौर में सेंट्रल ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन और साउथ एशिया ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन जैसे सैन्य गठबंधनों का हिस्सा रह चुका है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान को चीन और तुर्की से मिली सैन्य मदद का भी इस पूरे समीकरण में जिक्र हो रहा है। हालांकि, नए समझौते से पाकिस्तान की भारत के खिलाफ परमाणु प्रतिरोधक क्षमता में तत्काल कोई बदलाव नहीं माना जा रहा है। सऊदी अरब के साथ भारत के 43 अरब डॉलर के व्यापार और ऊर्जा संबंधों के कारण दिल्ली के लिए यह समझौता खास महत्व रखता है। वहीं, तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने साफ कहा है कि समझौते का उद्देश्य किसी देश को निशाना बनाना नहीं है।
भारत-पाकिस्तान युद्ध की स्थिति में क्या होगा?
नए रक्षा समझौते के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर भविष्य में भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य संघर्ष होता है, तो क्या तुर्की और सऊदी अरब पाकिस्तान के समर्थन में सीधे उतरेंगे। इसी तरह भारत-पाकिस्तान युद्ध की स्थिति में क्या सऊदी अरब और तुर्की भारत के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करेंगे, यह सवाल भी चर्चा में है। हालांकि, समझौते की वास्तविक भूमिका किसी सैन्य संकट की स्थिति में ही साफ होगी।
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ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन और तुर्की ने पाकिस्तान की सैन्य मदद की!
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान को चीन और तुर्की से सैन्य मदद मिलने की बात सामने आई थी। पाकिस्तान ने इस संघर्ष में अपनी सेना के साथ दूसरे देशों से मिले रक्षा उपकरणों का इस्तेमाल किया था। ऐसे में नया समझौता पाकिस्तान की सैन्य क्षमता में सीधे कितना इजाफा करेगा, यह अभी बड़ा सवाल है। भारत के खिलाफ पाकिस्तान के पास पहले से परमाणु प्रतिरोधक क्षमता मौजूद है और उसकी परमाणु नीति को मुख्य रूप से भारत केंद्रित माना जाता है। मक्का में हुआ यह समझौता इस परमाणु समीकरण को सीधे तौर पर नहीं बदलता। हालांकि, समझौता उस राजनीतिक और सैन्य समर्थन को स्थायी आधार दे सकता है, जिसने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान को मदद मिलने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसके पक्ष को रखने में भूमिका निभाई थी।
भारत के लिए सऊदी अरब क्यों महत्वपूर्ण?
भारत-पाकिस्तान संकट के बीच सऊदी अरब की भूमिका इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दिल्ली और रियाद के बीच मजबूत आर्थिक और ऊर्जा संबंध हैं। भारत और सऊदी अरब के बीच करीब 43 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार है। सऊदी अरब ने भारत में ऊर्जा, रिफाइनिंग, पेट्रोकेमिकल्स और इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में 100 अरब डॉलर तक निवेश की मंशा जाहिर की है। भारत के पश्चिमी तट पर बड़े डाउनस्ट्रीम प्रोजेक्ट्स में सऊदी कंपनी अरामको की भी भागीदारी है। वहीं, सऊदी अरब में 25 लाख से ज्यादा भारतीय काम करते हैं और बड़ी रकम भारत भेजते हैं। सऊदी का कच्चा तेल भी भारत के ऊर्जा आयात का अहम हिस्सा है, इसलिए दोनों देशों के संबंधों में आर्थिक हित बेहद महत्वपूर्ण हैं।
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अमेरिका और तुर्की ने समझौते को लेकर क्या कहा?
विश्लेषकों के मुताबिक, तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब तीनों अमेरिका के अहम सहयोगी हैं। इसलिए इन तीनों के बीच क्षेत्रीय सुरक्षा समझौते को वॉशिंगटन बोझ साझा करने की दिशा में एक कदम के तौर पर देख सकता है। हालांकि, यह समझौता खाड़ी क्षेत्र में सुरक्षा प्रदाता के रूप में अमेरिका की भूमिका को खत्म नहीं करता। तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने कहा कि समझौते का मकसद किसी देश को निशाना बनाना नहीं है। उन्होंने इसे संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 51 के तहत आत्मरक्षा के अधिकार के अनुरूप बताया और कहा कि क्षेत्र में शांति, समृद्धि और स्थिरता चाहने वाले मित्र देश इसमें शामिल हो सकते हैं।












