दुनिया के तीसरे सबसे छोटे देश ने बदला अपना नाम!अब 'नौरू' नहीं बल्कि 'रिपब्लिक ऑफ नाओएरो' कहलाएगा

प्रशांत महासागर में स्थित दुनिया के तीसरे सबसे छोटे देश नौरू ने अपनी पहचान से जुड़ा बड़ा फैसला लिया है। अब इस देश का आधिकारिक नाम 'रिपब्लिक ऑफ नाओएरो' (Republic of Naoero) होगा। संयुक्त राष्ट्र (UN) ने भी अपने आधिकारिक रिकॉर्ड में नया नाम दर्ज कर लिया है।
करीब 12 हजार की आबादी वाले इस द्वीपीय देश का कहना है कि 'नाओएरो' उसका पारंपरिक और मूल नाम है, जबकि 'नौरू' विदेशी लोगों की सुविधा के लिए प्रचलित हो गया था। सरकार का मानना है कि अब दुनिया के सामने अपनी असली सांस्कृतिक पहचान के साथ आने का समय है।
21वीं सदी में नाम बदलने वाला आठवां देश
नाओएरो 21वीं सदी में अपना नाम बदलने वाला दुनिया का आठवां देश बन गया है। इससे पहले स्वाजीलैंड ने 2018 में अपना नाम बदलकर इस्वातिनी किया था। वहीं 2022 में तुर्की ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना नाम तुर्किये कर लिया था।
यह भी पढ़ें: Strait of Hormuz: होर्मुज पर ईरान-ओमान की नई चाल, पुराने रास्ते से अलग बनेगा नया समुद्री रूट!
कैसे शुरू हुआ पूरा विवाद?
19वीं सदी के आखिर तक नाओएरो में 12 स्थानीय जनजातियां रहती थीं। यहां कोई आधुनिक सरकार या सेना नहीं थी। लोग मछली पकड़ने, नारियल की खेती और समुद्री संसाधनों पर निर्भर थे। 1870 के दशक में यूरोपीय व्यापारी यहां पहुंचे और व्यापार के साथ स्थानीय लोगों को शराब और बंदूकें बेचने लगे। 1878 में एक शादी समारोह के दौरान विवाद इतना बढ़ा कि गोली चल गई और एक कबीलाई प्रमुख के बेटे की मौत हो गई। इसके बाद बदले की घटनाएं शुरू हुईं और पूरा द्वीप 10 साल तक गृहयुद्ध की चपेट में रहा। आखिरकार 1888 में जर्मनी ने हस्तक्षेप कर हथियार जब्त किए और संघर्ष खत्म कराया।
जर्मनी- ऑस्ट्रेलिया के कब्जे के बाद मिली आजादी
गृहयुद्ध खत्म होने के बाद जर्मनी ने नाओएरो पर नियंत्रण कर लिया। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान 1914 में ऑस्ट्रेलियाई सेना ने इस द्वीप पर कब्जा कर लिया। कई दशकों तक विदेशी शासन में रहने के बाद 31 जनवरी 1968 को नाओएरो को पूर्ण स्वतंत्रता मिली और यह एक संप्रभु गणराज्य बना।
फॉस्फेट ने बनाया अमीर, फिर वही बना संकट
1900 में यहां फॉस्फेट के बड़े भंडार मिले। इसके बाद खनन शुरू हुआ और नाओएरो दुनिया के प्रमुख फॉस्फेट निर्यातकों में शामिल हो गया। आजादी के बाद सरकार ने इस उद्योग पर नियंत्रण हासिल किया और 1970 के दशक में यह दुनिया के सबसे समृद्ध देशों में गिना जाने लगा। हालांकि लगातार खनन के कारण द्वीप का बड़ा हिस्सा बंजर हो गया। इससे अर्थव्यवस्था कमजोर हुई और देश को नए आर्थिक विकल्प तलाशने पड़े।
अब जलवायु परिवर्तन सबसे बड़ी चुनौती
आज नाओएरो के सामने सबसे बड़ा खतरा जलवायु परिवर्तन है। समुद्र का बढ़ता जलस्तर इस छोटे द्वीपीय देश के अस्तित्व पर संकट पैदा कर रहा है। खनन के कारण द्वीप का अधिकांश अंदरूनी इलाका रहने लायक नहीं बचा है, इसलिए बड़ी आबादी समुद्र किनारे रहती है, जहां तटीय कटाव और ऊंची लहरों का खतरा लगातार बढ़ रहा है।
इसी चुनौती से निपटने के लिए सरकार ने विदेशी नागरिकों को निवेश के बदले नागरिकता देने की योजना शुरू की है। इससे मिलने वाले धन का इस्तेमाल लोगों को सुरक्षित स्थानों पर बसाने और जलवायु परिवर्तन से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर किया जाएगा।











