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मप्र हाईकोर्ट ने 430 दिन की देरी से दाखिल अपील की खारिज, कहा- सरकारी लालफीताशाही पर्याप्त कारण नहीं

मप्र हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार मामले में बरी किए गए आरोपियों के खिलाफ 430 दिन की देरी से दाखिल अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने सरकारी लालफीताशाही और प्रशासनिक सुस्ती को पर्याप्त कारण नहीं माना।
मप्र हाईकोर्ट ने 430 दिन की देरी से दाखिल अपील की खारिज, कहा- सरकारी लालफीताशाही पर्याप्त कारण नहीं
मप्र हाईकोर्ट ने 430 दिन की देरी से दाखिल अपील की खारिज

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार के एक मामले में दो आरोपियों को बरी किए जाने के खिलाफ 430 दिन की देरी से दाखिल अपील को खारिज कर दिया। जस्टिस संजीव कलगांवकर की सिंगल बेंच ने कहा कि सरकारी विभागों के बीच फाइलों का घूमना, प्रशासनिक प्रक्रिया में देरी और लालफीताशाही को अपील दाखिल करने में हुई देरी के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकारी मशीनरी की सुस्ती के कारण किसी आरोपी को निचली अदालत से मिली बरी होने की राहत और उससे जुड़े कानूनी अधिकारों को अनिश्चितकाल तक खतरे में नहीं रखा जा सकता। खासतौर पर तब, जब मामला बरी किए जाने के आदेश के खिलाफ दायर अपील से जुड़ा हो।

लोकायुक्त ने दी थी विशेष अदालत के फैसले को चुनौती

यह मामला विशेष पुलिस स्थापना, लोकायुक्त रीवा की ओर से दायर पुनरीक्षण याचिका से जुड़ा था। याचिका में विशेष अदालत के उस फैसले को चुनौती दी गई थी जिसमें रीवा के तत्कालीन ब्लॉक शिक्षा अधिकारी आनंद प्रकाश सिंह तिवारी और सहायक ग्रेड-3 विनय श्रीवास्तव को रिश्वत मांगने के आरोप से बरी कर दिया गया था। विशेष अदालत ने दोनों आरोपियों को 20 सितंबर 2019 के अपने फैसले में बरी किया था। इसी फैसले के खिलाफ सरकारी पक्ष की ओर से अपील दाखिल करने में 430 दिनों की देरी हुई। सुनवाई के दौरान बरी किए गए दोनों आरोपियों की ओर से अधिवक्ता रोहित शर्मा और राहुल मिश्रा ने पक्ष रखा।

फाइल कई अधिकारियों और विभागों के बीच घूमती रही

देरी को माफ करने के लिए सरकारी पक्ष की ओर से बताया गया कि अपील दाखिल करने की अनुमति से जुड़ी फाइल जिला अभियोजन अधिकारी, पुलिस अधीक्षक अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक, विधि विभाग और महाधिवक्ता कार्यालय के बीच भेजी गई। इस दौरान कानूनी राय लेने और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं के कारण अपील दाखिल करने में देरी हुई। हालांकि हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। जस्टिस संजीव कलगांवकर ने कहा कि किसी फाइल का एक अधिकारी या विभाग से दूसरे अधिकारी और विभाग के पास जाना देरी का संतोषजनक कारण नहीं है।

एक टेबल से दूसरी टेबल पर फाइल घूमना पर्याप्त कारण नहीं

अदालत ने अपने आदेश में सरकारी कामकाज में होने वाली इस तरह की देरी पर कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट के मुताबिक फाइल को एक टेबल से दूसरी टेबल तक भेजना और प्रशासनिक प्रक्रिया का हवाला देना यह साबित नहीं करता कि देरी के लिए पर्याप्त और वास्तविक कारण मौजूद था। बेंच ने कहा कि ऐसी स्थिति सरकारी व्यवस्था में नौकरशाही की सुस्ती, उदासीनता और लापरवाही को दर्शाती है। सरकारी विभागों को अपनी आंतरिक प्रक्रिया के कारण न्यायिक समयसीमा प्रभावित नहीं होने देनी चाहिए।

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भ्रष्टाचार के मामले में भी समयसीमा का महत्व

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मामला भ्रष्टाचार जैसे गंभीर आरोपों से जुड़ा होने के बावजूद सरकारी पक्ष को निर्धारित समयसीमा का पालन करना होगा। केवल मामले की गंभीरता के आधार पर लंबी देरी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि यदि सरकारी मशीनरी अपनी आंतरिक प्रक्रियाओं और लालफीताशाही के कारण समय पर कानूनी कदम नहीं उठा पाती है तो इसका खामियाजा आरोपी को नहीं भुगताया जा सकता। बरी होने के बाद आरोपी को मिले कानूनी अधिकारों को केवल प्रशासनिक देरी के आधार पर लंबे समय तक अनिश्चित स्थिति में नहीं रखा जा सकता। इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने 430 दिन की देरी से दाखिल अपील को खारिज कर दिया।

Sanjay Tiwari
By Sanjay Tiwari

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