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महू वन अपराध मामले में 3 आरोपी 22 महीने से जेल में, परिजनों ने जांच और जमानत प्रक्रिया पर उठाए सवाल

महू वन अपराध मामले में तीन आरोपी करीब 22 महीने से जेल में हैं। परिजनों ने जांच, दो एफआईआर और बार-बार जमानत खारिज होने को लेकर सवाल उठाए हैं और मानवाधिकार आयोग जाने की तैयारी की है।
महू वन अपराध मामले में 3 आरोपी 22 महीने से जेल में, परिजनों ने जांच और जमानत प्रक्रिया पर उठाए सवाल

वन्यजीवों के शिकार और मांस की तस्करी से जुड़े एक मामले में तीन लोग करीब 22 महीने से जेल में बंद हैं। मामले में आरोपियों के परिजनों और उनसे जुड़े लोगों ने जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए दावा किया है कि अब तक आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त गवाह और ठोस सबूत सामने नहीं आए हैं। उनका कहना है कि बार-बार जमानत आवेदन खारिज होने के कारण आरोपी लंबे समय से जेल में हैं। मामला वनमंडल इंदौर के वन परिक्षेत्र महू का बताया जा रहा है। इस प्रकरण में इम्तियाज (40), सलमान (43) और जौहर हुसैन (71) को आरोपी बनाया गया है। वर्ष 2024 में दर्ज इस मामले में भोपाल निवासी आमिर मम्मा और लटेरी निवासी बिलाल को भी आरोपी बनाया गया है, जो फिलहाल फरार बताए जा रहे हैं।

जांच में गवाह और सबूत नहीं मिलने का दावा

आरोपियों से जुड़े लोगों का दावा है कि मामले की जांच कर रही टाइगर स्ट्राइक फोर्स अब तक आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य सामने नहीं ला सकी है। उनका कहना है कि जिस अंतरराष्ट्रीय समूह के जरिए मांस की तस्करी किए जाने का आरोप बताया जा रहा है, उससे जोड़ने वाला कोई प्रत्यक्ष गवाह, बैंक लेनदेन या अन्य ठोस सबूत सामने नहीं आया है। परिजनों का यह भी कहना है कि आरोपियों के खिलाफ शिकार या किसी अन्य संबंधित अपराध का दोष अब तक अदालत में सिद्ध नहीं हुआ है। इसके बावजूद उनकी जमानत याचिकाएं खारिज होती रही हैं। हालांकि मामले की जांच और न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने से पहले आरोपों को सही या गलत मानने का अंतिम फैसला अदालत द्वारा ही किया जाना है।

एक ही मामले में दो एफआईआर का आरोप

इस प्रकरण को लेकर आरोपियों से जुड़े लोगों ने एक ही घटना के संबंध में दो एफआईआर दर्ज किए जाने का भी दावा किया है। उनका कहना है कि इससे मामले की कानूनी स्थिति और अधिक उलझ गई है। परिजनों का दावा है कि एक ही मामले में दो अलग-अलग एफआईआर दर्ज किए जाने की प्रक्रिया को लेकर भी उन्होंने कानूनी विशेषज्ञों से राय ली है। उनके मुताबिक इस पहलू को भी जांच और न्यायिक प्रक्रिया के दौरान स्पष्ट किया जाना जरूरी है।

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22 महीने से जेल में हैं तीन आरोपी

परिजनों के मुताबिक, मामले में लगाए गए आरोपों में अधिकतम सजा सात वर्ष तक बताई जा रही है। उनका दावा है कि तीन आरोपी करीब 22 महीने जेल में बिता चुके हैं लेकिन अभी तक उन्हें जमानत नहीं मिल पाई है। परिवार का सवाल है कि यदि भविष्य में अदालत से आरोपी दोषमुक्त होते हैं तो इतने लंबे समय तक जेल में रहने से उनके व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन पर पड़े असर की भरपाई की जिम्मेदारी किसकी होगी। इसी आधार पर परिजन मामले की निष्पक्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया में तेजी की मांग कर रहे हैं।

मानवाधिकार आयोग जाने की तैयारी

मामले से जुड़े लोगों ने अब मानवाधिकार आयोग का दरवाजा खटखटाने की तैयारी की है। उनका कहना है कि लंबे समय से जेल में बंद आरोपियों के मामले में उनके कानूनी अधिकारों और जमानत प्रक्रिया की भी समीक्षा होनी चाहिए। परिजनों की ओर से सुप्रीम कोर्ट की जमानत संबंधी व्यवस्थाओं का हवाला देते हुए दावा किया गया है कि अधिकतम सजा की अवधि के एक हिस्से तक जेल में रहने के बाद जमानत पर विचार किया जाना चाहिए। हालांकि, ऐसे मामलों में जमानत का फैसला संबंधित अदालत मामले के तथ्यों, आरोपों, साक्ष्यों और लागू कानूनी प्रावधानों के आधार पर करती है।

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जांच और अदालत की प्रक्रिया पर टिकी नजर

महू के इस वन अपराध मामले में अब आरोपियों के परिजन जांच की निष्पक्षता और लंबे समय से चल रही न्यायिक प्रक्रिया को लेकर सवाल उठा रहे हैं। दूसरी ओर, मामले में दर्ज आरोपों और जांच के आधार पर आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी है। फिलहाल यह मामला अदालत में विचाराधीन बताया जा रहा है। इसलिए आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों की अंतिम पुष्टि या खंडन न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही माना जाएगा।

Amit Sen
By Amit Sen

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