मोहन भागवत बोले- भारत में धर्म और राष्ट्र अलग नहीं, धर्म संकट में आया तो देश को भुगतना पड़ेगा खामियाजा

मुंबई में ऑल इंडिया विहार सेवा ग्रुप के 14वें सम्मेलन को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि अगर धर्म संकट में आता है तो देश को उसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। उन्होंने भारत की ज्ञान परंपरा और मानवता के सुरक्षित भविष्य में उसके योगदान का भी जिक्र किया।
धर्म और राष्ट्र एक-दूसरे पर निर्भर
मोहन भागवत ने कहा कि हमारा राष्ट्र और धर्म अलग नहीं हैं। राष्ट्र का उद्देश्य धर्म है और धर्म राष्ट्र को बनाए रखता है, दोनों एक-दूसरे पर निर्भर हैं। अगर एक मौजूद है तो दूसरा भी मौजूद है और अगर एक नहीं है तो दूसरा भी नहीं है। उन्होंने कहा कि धर्म संकट में आया तो देश को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा।
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दुनिया संतुलन का रास्ता खोज रही
भागवत ने मुंबई में ऑल इंडिया विहार सेवा ग्रुप के 14वें सम्मेलन को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि दुनिया विकास और पर्यावरण सुरक्षा के साथ-साथ व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पारिवारिक जीवन के बीच संतुलन तलाश रही है।
भारत से निकलेगा समस्याओं का समाधान
मोहन भागवत ने कहा कि भारत ने दूसरे देशों पर कब्जा करने या लोगों का धर्म बदलने की कोशिश किए बिना अपना ज्ञान दुनिया के साथ साझा किया है। उन्होंने कहा कि दुनिया जानती है कि रास्ता भारत से निकलेगा और भारत के ज्ञान की आज दुनिया को जरूरत है।
भारत के पास विशाल ज्ञान परंपरा
भागवत ने कहा कि भारत के पास वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत और गीता जैसी विशाल ज्ञान परंपरा है। इसमें जैन आगम, त्रिपिटक, गुरु ग्रंथ साहिब और संतों की शिक्षाएं भी शामिल हैं, जबकि भक्ति की शक्ति से ईश्वर के करीब पहुंचा जा सकता है।
ज्ञान और परंपराओं की रक्षा जरूरी
मोहन भागवत ने कहा कि इस ज्ञान को आगे बढ़ाने वाले लोगों के जीवन और परंपराओं को बचाना सिर्फ धार्मिक जिम्मेदारी नहीं है। उन्होंने कहा कि यह मानवता की सेवा भी है, क्योंकि आप सिर्फ एक जीवन की रक्षा नहीं कर रहे हैं, बल्कि पूरी मानव जाति के सुरक्षित भविष्य की रक्षा कर रहे हैं।




















