मौत के बाद लोग क्यों करते हैं चिता पर ‘94’ लिखने की रीत? जानिए चौंकाने वाला कारण

इंसान के जीवन में जन्म और मृत्यु दो सबसे महत्वपूर्ण क्षण माने जाते हैं। जब कोई व्यक्ति इस दुनिया से विदा लेता है, तो उसकी मृत्यु के बाद अलग-अलग धर्मों में अलग-अलग तरीके अपनाए जाते हैं। हिंदू धर्म में भी मरणोपरांत कई परंपराएं आज भी निभाई जाती हैं।
दाह संस्कार-अस्थि विसर्जन की परंपरा
कुछ क्षेत्रों में दिवंगत की अस्थियों को सीधे नदी में विसर्जित किया जाता है, जबकि कई जगहों पर दाह संस्कार के बाद राख पर 94 लिखने की प्रथा भी प्रचलित है। यह परंपरा खासकर काशी, हरिद्वार और सहारनपुर में देखी जाती है।
सहारनपुर और हरिद्वार की धार्मिक परंपराएं
सहारनपुर उत्तर प्रदेश का अंतिम जिला है और यह हरिद्वार के पास स्थित है। पहले हरिद्वार भी सहारनपुर का हिस्सा हुआ करता था। यहां के लोग अपने दिवंगत का पिंडदान और अस्थि विसर्जन करने हरिद्वार जाते हैं। इसी दौरान दाह संस्कार के बाद राख पर 94 लिखने की परंपरा निभाई जाती है।
क्यों लिखा जाता है राख पर ‘94’?
धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान ने कुल 100 कर्म बनाए हैं। इनमें से 94 कर्म मनुष्य को दिए गए हैं, जिन्हें वह अपने जीवन में अपनी इच्छा और कर्मों के आधार पर करता है। बाकी 6 कर्म- धन, लाभ, हानि, यश, कीर्ति और अपयश केवल भगवान के अधिकार में हैं।
94 लिखने का आध्यात्मिक महत्व
दाह संस्कार के बाद राख पर 94 लिखना यह दर्शाता है कि व्यक्ति ने अपने जीवन के 94 कर्म पूरे कर लिए हैं और अब वह अपने आपको भगवान को समर्पित कर रहा है। इसे आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना का प्रतीक माना जाता है।
आचार्य कहते हैं कि यह परंपरा एक मौन संदेश देती है कि व्यक्ति अपने सभी सांसारिक कर्म पीछे छोड़कर अब प्रभु चरणों में समर्पित हो गया है। यही कारण है कि यह रीति आज भी देश के कई इलाकों में निभाई जाती है।











