इंदौर हाई कोर्ट ने कहा-हर अनियमितता के लिए सीईओ जिम्मेदार नहीं, 110 ट्रांजिट पासबुक, 26 खदानों के अनुबंध के मामले में पूर्व सीईओ सबीना बरी

इंदौर। किसी अधिकारी के कार्यकाल में प्रशासनिक अनियमितता सामने आना मात्र उसे भ्रष्टाचार के अपराध का दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं है। आपराधिक कदाचार साबित करने के लिए अभियोजन को अधिकारी की बेईमान मंशा, आपराधिक उद्देश्य या स्वयं अथवा किसी अन्य को अनुचित आर्थिक लाभ पहुंचाने का ठोस प्रमाण प्रस्तुत करना होगा। इस महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत के साथ मध्यप्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने जनपद पंचायत उज्जैन की तत्कालीन सीईओ सबीना निनामा की दोषसिद्धि निरस्त कर दी।
विशेष न्यायाधीश का फैसला निरस्त
न्यायमूर्ति जय कुमार पिल्लई ने आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम) उज्जैन के 27 फरवरी 2018 के फैसले को निरस्त करते हुए आरोपों से बरी कर दिया। कोर्ट ने जुर्माना जमा होने पर वापस करने और जमानत बांड समाप्त करने के निर्देश दिए। निनामा 17 सितंबर 2002 से 14 अक्टूबर 2003 तक जनपद पंचायत उज्जैन की सीईओ थीं। उनके कार्यकाल को लेकर 110 ट्रांजिट पासबुक के रखरखाव में गड़बड़ी, 26 खदानों के नीलामी अनुबंध समय पर नहीं होने और शिक्षा कर्मियों की भर्ती के विज्ञापनों में अधिक भुगतान के आरोप लगाए गए थे। वर्ष 2005 में मामला दर्ज होने के बाद जांच आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ को सौंपी गई थी।
पासबुक की जिम्मेदारी लेखाकारों की थी
हाई कोर्ट ने पाया कि ट्रांजिट पासबुक जारी करने और उनका रिकॉर्ड रखने की जिम्मेदारी लेखाकारों की थी। तत्कालीन सीईओ की गवाही से भी सामने आया कि निनामा पासबुक की कस्टोडियन नहीं थीं। उनके द्वारा पासबुक जारी करने या दुरुपयोग के निर्देश देने का कोई दस्तावेजी प्रमाण नहीं मिला। कथित आर्थिक नुकसान का ठोस प्रमाण भी सामने नहीं आया।
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तबादले के बाद पूरी होनी थी कार्रवाई
26 खदानों के मामले में कोर्ट ने संबंधित नीलामियों की समय-सीमा और निनामा की तबादला तारीख को महत्वपूर्ण माना। निर्धारित अवधि पूरी होने से पहले ही 14 सितंबर 2003 को उनका तबादला हो चुका था। इसलिए केवल पर्यवेक्षण में कमी को आपराधिक कदाचार नहीं माना जा सकता। विज्ञापन भुगतान के मामले में भी कोर्ट ने पाया कि विज्ञापन वास्तविक थे और सार्वजनिक उद्देश्य से प्रकाशित किए गए थे। भुगतान में कोई प्रशासनिक त्रुटि हुई भी हो तो निनामा को व्यक्तिगत या अनुचित आर्थिक लाभ मिलने का प्रमाण नहीं था।
साजिश का प्रमाण नहीं
कोर्ट ने कहा कि केवल साथ काम करने या किसी प्रशासनिक निर्णय में शामिल होने से आपराधिक साजिश साबित नहीं होती। इसके लिए आपराधिक उद्देश्य से बनी सहमति का ठोस प्रमाण जरूरी है। अभियोजन स्वीकृति पर भी सवाल उठाते हुए कोर्ट ने कहा कि स्वीकृति महज औपचारिकता नहीं है। स्वीकृति देने वाले अधिकारियों को गवाही के लिए पेश नहीं किया गया, इसलिए स्वतंत्र विवेक के इस्तेमाल का प्रमाण नहीं मिला। अंततः अभियोजन आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका और निनामा को सभी आरोपों से बरी कर दिया।
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