PU Special :नाना पाटेकर का महू की निशानेबाजी रेंज से था गहरा रिश्ता, 40 की उम्र के बाद बनाया निशानेबाजी को शौक

अंकित राठौड़, महू। वर्ष 1991 में आई फिल्म प्रहार के लिए भारतीय सेना के साथ की गई कड़ी प्रशिक्षण प्रक्रिया ने नाना पाटेकर के भीतर राइफल निशानेबाजी के प्रति ऐसा जुनून पैदा किया, जो आगे चलकर उन्हें महू की सेना की निशानेबाजी रेंज और इंदौर की सीमा सुरक्षा बल की रेवती निशानेबाजी रेंज तक ले आया। 40 वर्ष की उम्र के बाद उन्होंने निशानेबाजी को पूरी गंभीरता के साथ अपनाया और लंबे समय तक इसका अभ्यास करते रहे। भारतीय सिनेमा के दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर अब हमारे बीच नहीं रहे। फिल्मों में अपने दमदार अभिनय के लिए पहचान बनाने वाले नाना पाटेकर का महू और इंदौर से भी गहरा रिश्ता रहा है। यह रिश्ता फिल्मों से नहीं, बल्कि निशानेबाजी के उस जुनून से जुड़ा था, जिसे उन्होंने उम्र के एक पड़ाव के बाद शौक नहीं बल्कि साधना बना लिया था।
उधार की राइफल से पाया कांस्य पदक
वर्ष 2004 में इंदौर की सीमा सुरक्षा बल रेवती रेंज में आयोजित 48वीं राष्ट्रीय निशानेबाजी प्रतियोगिता के 300 मीटर बड़ी नली वाली राइफल मुकाबले में नाना पाटेकर ने रजत पदक हासिल किया। इसके बाद वर्ष 2007 में महू में आयोजित राष्ट्रीय 300 मीटर बड़ी नली वाली राइफल निशानेबाजी प्रतियोगिता में उनके पास अपनी अत्याधुनिक राइफल नहीं थी। उन्होंने दूसरे निशानेबाज से राइफल उधार लेकर मुकाबले में हिस्सा लिया। इसके बावजूद उन्होंने 600 में से 549 अंक हासिल किए और प्रतियोगिता में शामिल 49 अनुभवी निशानेबाजों के बीच 13वां स्थान प्राप्त किया। महाराष्ट्र का प्रतिनिधित्व करते हुए उन्होंने कांस्य पदक भी हासिल किया। महू में आयोजित इस प्रतियोगिता में शानदार प्रदर्शन के बाद राष्ट्रीय राइफल संघ ने उन्हें आधिकारिक रूप से प्रसिद्ध निशानेबाज का दर्जा दिया। इसके बाद उन्हें अपनी खेल राइफल विदेश से मंगाने का कानूनी अधिकार भी मिला। निशानेबाजी के प्रति उनकी एकाग्रता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपने पुणे स्थित फार्महाउस पर भी 50 मीटर की निजी निशानेबाजी रेंज बनवा रखी थी, जहां वे घंटों अभ्यास करते थे।
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कई बार आए थे महू
नाना पाटेकर वर्ष 2008, 2009 और 2015 में भी महू में आयोजित बड़ी नली वाली राइफल निशानेबाजी प्रतियोगिताओं में शामिल हुए। इसके अलावा वर्ष 2001 से 2015-16 तक वे कई बार बिना किसी तामझाम के केवल निशानेबाजी के अभ्यास के लिए महू आते रहे। प्रादेशिक सेना में मानद पद मिलने के बाद सेना के अधिकारियों और महू छावनी से उनका जुड़ाव और मजबूत हो गया था।
नाना पाटेकर दोस्तों से निभाते थे रिश्ता
नाना पाटेकर का व्यक्तित्व भी बेहद मिलनसार था। महू आने से पहले वे अपने सैन्य प्रशासन से जुड़े कुछ दोस्तों को फोन कर इसकी जानकारी दे देते थे। निशानेबाजी के अभ्यास में व्यस्त रहने के बावजूद वे महू में अपने दोस्तों के लिए समय निकालते थे और उनके साथ घूमने-फिरने तथा पिकनिक पर भी सहज रूप से चले जाते थे। फिल्मों से होने वाली कमाई से वे जरूरतमंद युवा निशानेबाजों की मदद भी करते रहे। कई युवा निशानेबाजों को उन्होंने आर्थिक सहयोग देने के साथ उनका मार्गदर्शन भी किया।
मनोरंजन नहीं, साधना मानते थे निशानेबाजी को
नाना पाटेकर के लिए निशानेबाजी महज खेल या मनोरंजन नहीं थी। वे इसे एकाग्रता और साधना का माध्यम मानते थे। उनका मानना था कि भारत में निशानेबाजी का भविष्य भारतीय सेना की वजह से ही मजबूत है। महू की निशानेबाजी रेंज और इंदौर के निशानेबाजी मैदान पर उनके अभ्यास की यादें लंबे समय तक उनसे जुड़े लोगों के बीच रहेंगी। फिल्मों के पर्दे से अलग महू और इंदौर की निशानेबाजी रेंज से जुड़ा नाना पाटेकर का यह पक्ष उनके व्यक्तित्व की ऐसी कहानी है, जिसे कम ही लोग जानते हैं।




















