‘जिस दिन डर गया, समझो मर गया’... नाना पाटेकर ने सच में बेखौफ जी जिंदगी, क्रिकेट से रंगमंच और बॉलीवुड तक ऐसा रहा सफर..!

मुंबई। नाना पाटेकर का नाम भारतीय सिनेमा के उन कलाकारों में लिया जाता है, जिन्होंने अपने अभिनय से ज्यादा अपने अंदाज से पहचान बनाई। 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के मुरुड-जंजीरा में जन्मे नाना का असली नाम विश्वनाथ गजानन पाटेकर था। बचपन से ही उनके सामने संघर्ष थे, लेकिन इन्हीं मुश्किलों ने उनके भीतर वह जिद पैदा की, जिसने आगे चलकर उन्हें हिंदी और मराठी सिनेमा का बड़ा नाम बना दिया।
विश्वनाथ से ‘नाना’ बनने की कहानी भी है खास
दुनिया उन्हें नाना पाटेकर के नाम से जानती है, लेकिन ‘नाना’ उनका जन्म नाम नहीं था। उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था कि उनकी मां की एक करीबी सहेली उन्हें बचपन में प्यार से ‘नाना’ बुलाती थीं। धीरे-धीरे यही नाम घर और आसपास चल पड़ा। स्कूल के दिनों में उन्हें ‘विश्वनाथ’ या ‘विशू’ कहा जाता था। नाना कहते थे कि आज भी कोई उन्हें ‘विशू’ कहकर बुलाता है तो उन्हें अपने स्कूल के दिनों की याद आ जाती है।
फिल्मों से पहले क्रिकेट था उनका पहला प्यार
नाना का पहला सपना अभिनेता बनना नहीं, बल्कि क्रिकेटर बनना था। वह शिवाजी पार्क में क्रिकेट खेलते थे और ऑफ स्पिन गेंदबाजी करते थे। उन्होंने बताया था कि वह अच्छे क्रिकेटर थे और बल्लेबाजों को गेंदबाजी करना उन्हें पसंद था। लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी थी कि वह क्रिकेट में आगे नहीं बढ़ सके। खेल का जुनून हालांकि आखिरी समय तक उनके साथ रहा। भारत-पाकिस्तान का मैच हो तो वह टीवी के सामने से हटते नहीं थे। विराट कोहली उनके पसंदीदा क्रिकेटरों में थे। नाना ने एक इंटरव्यू में कहा था कि विराट जल्दी आउट हो जाएं तो उनका खाना खाने का मन तक नहीं करता था।
रंगमंच बना असली पहचान की पहली सीढ़ी
पढ़ाई पूरी करने के बाद नाना का झुकाव थिएटर की ओर बढ़ा। रंगमंच ने उन्हें अभिनय की वह बारीकी सिखाई, जो बाद में फिल्मों में उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी। उनकी आवाज, संवाद बोलने का तरीका और किरदार के भीतर उतरने की आदत थिएटर से ही मजबूत हुई। यहीं से वह धीरे-धीरे फिल्मी दुनिया की तरफ बढ़े।
‘गमन’ से शुरू हुआ फिल्मी सफर
1978 में नाना ने ‘गमन’ से फिल्मों में कदम रखा। शुरुआती दौर में उन्हें तुरंत स्टारडम नहीं मिला, लेकिन उनके अभिनय पर फिल्मकारों की नजर पड़ने लगी। हिंदी के साथ उन्होंने मराठी फिल्मों में भी काम किया। 1986 की ‘अंकुश’ और इसके बाद ‘प्रतिघात’ जैसी फिल्मों ने उन्हें पहचान दिलाई। 1988 की ‘सलाम बॉम्बे!’ में भी उनकी मौजूदगी ने उनके काम को व्यापक दर्शकों तक पहुंचाया।
‘परिंदा’ ने बदल दिया नाना का पूरा करियर
1989 की ‘परिंदा’ उनके करियर का सबसे बड़ा मोड़ बनी। फिल्म में उन्होंने अन्ना नाम के गैंगस्टर का किरदार निभाया। नाना की आंखों, आवाज और संवाद अदायगी ने इस भूमिका को यादगार बना दिया। फिल्म के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर अवॉर्ड में सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेता का सम्मान मिला। इसके बाद वह गंभीर और दमदार भूमिकाओं के लिए फिल्म इंडस्ट्री की पहली पसंद बनते चले गए।
तीन नेशनल अवॉर्ड ने बनाया अभिनय का दिग्गज
नाना पाटेकर को अभिनय के लिए तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिले। ‘परिंदा’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेता, ‘क्रांतिवीर’ के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता और ‘अग्निसाक्षी’ के लिए फिर सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। इसके अलावा उन्हें कई फिल्मफेयर और दूसरे प्रतिष्ठित सम्मान भी मिले। 2013 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया।
अवॉर्ड्स की पूरी चमक से ज्यादा किरदारों की ताकत रही खास
‘अंगार’ के लिए उन्हें फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ विलेन पुरस्कार मिला। ‘क्रांतिवीर’ के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर सम्मान मिला और ‘अपहरण’ में नकारात्मक भूमिका के लिए भी उन्हें फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला। मराठी सिनेमा में ‘नटसम्राट’ और ‘डॉ. प्रकाश बाबा आमटे’ जैसे कामों को भी खूब सराहा गया।
‘साला, ये दुख काहे खत्म नहीं होता बे!’ से याद आते हैं नाना
नाना की पहचान सिर्फ फिल्मों से नहीं, उनके डायलॉग्स से भी बनी। ‘क्रांतिवीर’ का ‘साला, ये दुख काहे खत्म नहीं होता बे!’ आज भी उनके सबसे चर्चित संवादों में गिना जाता है। ‘यशवंत’ का ‘जिस दिन डर गया, समझो मर गया’ उनके बेखौफ अंदाज को दिखाता है। ‘परिंदा’ का ‘बाप का नाम मत लेना!’, ‘अब तक छप्पन’ का ‘पुलिस की नौकरी में दोस्ती नहीं होती’, ‘अग्निसाक्षी’ का ‘हर आदमी के अंदर एक जानवर होता है’ और ‘वेलकम’ का ‘दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं’ जैसे संवाद उनकी अलग पहचान बन गए।
नाना पाटेकर का निधन! 45 मिनट तक चला CPR, 75 की उम्र में थमा दमदार अभिनेता का सफर
गंभीर अभिनेता से कॉमेडी के ‘उदय शेट्टी’ तक
नाना ने खुद को किसी एक तरह के किरदार में कभी नहीं बांधा। ‘तिरंगा’, ‘खामोशी: द म्यूजिकल’, ‘शक्ति: द पावर’, ‘अब तक छप्पन’, ‘अपहरण’ और ‘राजनीति’ में उन्होंने अलग-अलग रंग दिखाए। फिर 2007 की ‘वेलकम’ आई और उदय शेट्टी के किरदार ने उन्हें कॉमेडी में भी घर-घर पहुंचा दिया। ‘वेलकम बैक’ में उन्होंने फिर यही भूमिका निभाई।
‘नटसम्राट’ ने फिर याद दिलाई रंगमंच की ताकत
मराठी फिल्म ‘नटसम्राट’ में नाना ने एक बुजुर्ग रंगमंच कलाकार का किरदार निभाया। उनके अभिनय को व्यापक सराहना मिली और यह फिल्म उनके करियर की सबसे यादगार मराठी फिल्मों में शामिल हो गई। थिएटर से शुरू हुआ उनका सफर जैसे इस भूमिका में फिर लौटता दिखाई दिया।
अभिनेता के साथ निर्देशक और लेखक भी बने
नाना ने सिर्फ कैमरे के सामने काम नहीं किया। 1991 में आई ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ से उन्होंने निर्देशन में कदम रखा। फिल्म में उन्होंने अभिनय के साथ लेखन और निर्देशन भी किया। आर्मी मेजर के किरदार को वास्तविक बनाने के लिए उन्होंने मराठा लाइट इन्फैंट्री के साथ सैन्य प्रशिक्षण लिया। बाद में वह टेरिटोरियल आर्मी से जुड़े और मानद अधिकारी के रूप में सेवाएं दीं।
कारगिल के समय भी सेना के साथ खड़े रहे
1999 के कारगिल युद्ध के दौरान नाना का सेना से जुड़ाव और मजबूत हुआ। रिपोर्ट्स के मुताबिक उन्होंने तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस से अनुमति लेकर सेना के साथ अग्रिम इलाकों में समय बिताया। द्रास, लेह, कुपवाड़ा और सोपोर जैसे इलाकों में उनकी मौजूदगी का भी जिक्र मिलता है। अभिनय के बाहर उनका यह पक्ष उनके व्यक्तित्व को और खास बनाता रहा।
समाजसेवा को भी बनाया जिंदगी का हिस्सा
नाना पाटेकर सामाजिक कामों से भी जुड़े रहे। उन्होंने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ नाम फाउंडेशन की शुरुआत की। यह संस्था किसानों और ग्रामीण इलाकों से जुड़े लोगों की मदद के लिए काम करती है। इसी वजह से नाना की पहचान सिर्फ अभिनेता की नहीं बल्कि जमीन से जुड़े इंसान की भी बनी।
2:30 बजे दोस्त को मैसेज... 5:20 बजे मौत, नाना पाटेकर की आखिरी रात में क्या हुआ?
आखिरी फिल्मों तक कैमरे के सामने रहे
करीब पांच दशक लंबे करियर में नाना ने 100 से ज्यादा फिल्मों में काम किया। ‘वनवास’, ‘हाउसफुल 5’ और विशाल भारद्वाज की ‘ओ’ रोमियो’ उनकी आखिरी दौर की फिल्मों में शामिल रहीं। ‘ओ’ रोमियो’ फरवरी 2026 में रिलीज हुई थी। इसके अलावा वह ‘सूबेदार’ में भी विशेष भूमिका में दिखाई दिए।
मौत से चार दिन पहले गोवा में दिखे थे
गोवा से नाना का खास रिश्ता था। वह मुंबई और पुणे के साथ गोवा में भी समय बिताते थे। 4 अक्टूबर को निधन से सिर्फ चार दिन पहले वह गोवा में एक कार्यक्रम में नजर आए थे। सफेद कुर्ते और गमछे में पहुंचे नाना ने मनोहर पर्रिकर को याद किया और कलाकारों के साथ मंच भी साझा किया। यह उनकी आखिरी सार्वजनिक मौजूदगी में से एक रही।
मौत पर पहले ही बोल चुके थे, अपनी आखिरी इच्छा भी बताई थी
सितंबर 2023 के एक इंटरव्यू में नाना ने मृत्यु को लेकर बेहद सहज अंदाज में बात की थी। उन्होंने कहा था कि उन्होंने अपनी चिता के लिए करीब 12 मन सूखी लकड़ी रखी है। वह चाहते थे कि अंतिम संस्कार में गीली लकड़ी इस्तेमाल न हो। उनका मजाकिया अंदाज में कहना था कि गीली लकड़ी से धुआं होगा और वहां मौजूद लोगों की आंखों में पानी आएगा, तो उन्हें गलतफहमी हो सकती है कि लोग उनके लिए रो रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि इंसान के जाने के कुछ समय बाद लोग उसे भूल जाते हैं और उनकी तस्वीर भी लगाने की जरूरत नहीं है। उनके इन शब्दों में जिंदगी की नश्वरता को लेकर उनका अपना अलग नजरिया साफ दिखाई देता था।
फिर थम गई नाना की वह दमदार आवाज
8 अक्टूबर 2026 की सुबह नाना पाटेकर के जीवन का सफर अचानक खत्म हो गया। गोवा के डोना पाउला स्थित उनके घर पर उनकी तबीयत बिगड़ी और वह बेहोश मिले। डॉक्टरों के मुताबिक उन्हें गंभीर कार्डियक अरेस्ट आया था। उन्हें मणिपाल अस्पताल ले जाया गया, जहां मेडिकल टीम ने करीब 45 मिनट तक CPR देकर उन्हें बचाने की कोशिश की, लेकिन वह प्रतिक्रिया नहीं दे सके। सुबह 5:20 बजे उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। अस्पताल की ओर से पोस्टमॉर्टम और मेडिको-लीगल प्रक्रिया की जानकारी भी दी गई। रात करीब 2:30 बजे नाना ने एक दोस्त को तबीयत ठीक नहीं लगने का संदेश भेजा था। दोस्त ने बाद में संदेश देखा और करीब 4 बजे उनके घर पहुंचा। उस समय नाना की हालत काफी खराब थी। मेडिकल टीम को बुलाया गया, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका।
‘गमन’ से शुरू हुई कहानी ‘परिंदा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘अग्निसाक्षी’, ‘अब तक छप्पन’, ‘नटसम्राट’ और ‘वेलकम’ तक पहुंची। नाना ने कभी खुद को सिर्फ एक अभिनेता तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने रंगमंच किया, फिल्में लिखीं, निर्देशन किया, सेना से जुड़े, क्रिकेट को चाहा और समाजसेवा की। पर्दे पर उनकी आवाज जितनी तेज थी, पर्दे के बाहर उनकी जिंदगी उतनी ही सादगी से भरी रही। अब उनके जाने के बाद भारतीय सिनेमा के पास उनकी फिल्मों, किरदारों और उन दमदार संवादों की यादें ही उनकी सबसे बड़ी विरासत हैं।




















