Peoples Update Special :इंडियन ऑर्गन डोनेशन-डे, एक 'हां' बचा सकती है कई जिंदगियां, मध्यप्रदेश में हजारों मरीज अंगदान के इंतजार में

प्रवीण श्रीवास्तव, भोपाल। प्रदेश में किडनी, लिवर और हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए हजारों मरीज अंग मिलने का इंतजार कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ब्रेन डेथ के बाद यदि परिजन अंगदान के लिए सहमति दें, तो कई मरीजों को नया जीवन मिल सकता है। इसके बावजूद जागरूकता और व्यवस्थाओं की कमी सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। यही वजह है कि हर साल कई उपयोगी अंग अंतिम संस्कार के साथ नष्ट हो जाते हैं।
डायलिसिस पर टिकी जिंदगी, किडनी का इंतजार जारी
24 वर्षीय अंकित (परिवर्तित नाम) पिछले दो वर्षों से सप्ताह में तीन बार चार-चार घंटे डायलिसिस करवा रहा है। डॉक्टरों ने स्पष्ट कर दिया है कि उसका स्थायी इलाज केवल किडनी प्रत्यारोपण है। परिवार में केवल उसके पिता ही हैं और रिश्तेदार किडनी देने के लिए तैयार नहीं हैं। ऐसे में हर बार उसके पिता उसे यही भरोसा देते हैं कि जल्द ही नंबर आएगा, लेकिन यह इंतजार कब खत्म होगा, इसका जवाब किसी के पास नहीं है।
एक 'हां' कई मरीजों को दे सकती है नया जीवन
प्रदेश के अस्पतालों में डॉक्टर और ट्रांसप्लांट की सुविधा मौजूद है, लेकिन सबसे बड़ी कमी अंगदान के लिए मिलने वाली सहमति की है। ब्रेन डेथ के बाद परिजनों की असहमति के कारण हर साल कई ऐसे अंग दफन या जला दिए जाते हैं, जो सात-आठ लोगों को नई जिंदगी दे सकते थे। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि हर एक्सीडेंटल डेथ के बाद प्रभावी काउंसलिंग हो और अंगदान हो जाए, तो लाइव डोनेशन की जरूरत काफी हद तक खत्म हो सकती है।
मध्यप्रदेश में हजारों मरीज कर रहे प्रत्यारोपण का इंतजार
विशेषज्ञों से जुटाई गई जानकारी के अनुसार, मध्यप्रदेश में करीब 3 हजार मरीज किडनी, 800 से अधिक मरीज लिवर और 30 से 40 मरीज हार्ट प्रत्यारोपण का इंतजार कर रहे हैं। चौकसे नगर निवासी मनोज मोटवानी ने बताया कि उनके पिता को भी किडनी की जरूरत थी, लेकिन एक ब्रेन-डेड मरीज के परिजनों ने अंगदान से इनकार कर दिया। कुछ महीने बाद उनके पिता की मौत हो गई। उनका मानना है कि यदि उस समय सहमति मिल जाती, तो शायद उनके पिता आज जीवित होते।
देश में ऑर्गन डोनेशन में मप्र की हिस्सेदारी बेहद कम
नेशनल ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन के अनुसार, भारत में हर साल करीब 1100 ब्रेन-डेड मरीजों से ऑर्गन डोनेशन होता है। इनमें तेलंगाना, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात की हिस्सेदारी 82 प्रतिशत से अधिक है। वहीं मध्यप्रदेश की हिस्सेदारी केवल 0.7 प्रतिशत, राजस्थान की 0.6 प्रतिशत और छत्तीसगढ़ की 0.3 प्रतिशत है। इसकी बड़ी वजह सरकारी अस्पतालों में पर्याप्त व्यवस्था का अभाव और जागरूकता की कमी मानी जा रही है।
सरकारी अस्पतालों में सीमित सुविधाएं बनी चुनौती
प्रदेश में ब्रेन-डेड मरीजों से ऑर्गन डोनेशन की सुविधा फिलहाल केवल एम्स जैसे एक सरकारी अस्पताल में उपलब्ध है। इसके अलावा भोपाल के दो निजी अस्पतालों सहित पूरे प्रदेश में सिर्फ पांच अस्पतालों में ही कैडेवर डोनेशन की सुविधा है। भोपाल और इंदौर के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में यह व्यवस्था शुरू करने की योजना अभी तक कागजों से आगे नहीं बढ़ सकी है। हालांकि राजधानी में एम्स और हमीदिया में ट्रांसप्लांट की रफ्तार बढ़ी है, लेकिन प्रदेश अब भी देश के शीर्ष राज्यों में शामिल नहीं हो पाया है।
विशेषज्ञ बोले-जागरूकता और व्यवस्था दोनों बढ़ाने की जरूरत
किरण फाउंडेशन के डॉ. राकेश भार्गव का कहना है कि केडेवर डोनेशन के मामले में प्रदेश काफी पीछे है। उनकी टीम लगातार परिजनों की काउंसलिंग करती है, लेकिन लगभग 90 प्रतिशत मामलों में सहमति नहीं मिलती। वहीं वरिष्ठ किडनी ट्रांसप्लांट विशेषज्ञ डॉ. विद्यानंद त्रिपाठी का कहना है कि जागरूकता की कमी के साथ अस्पतालों में ब्रेन-डेड घोषित करने की प्रक्रिया और आवश्यक संसाधनों का अभाव भी बड़ी बाधा है। उनका मानना है कि मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर और व्यापक जनजागरूकता से ही स्थिति में सुधार संभव है।












