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मुगल बादशाहों के दौर में कैसे मनाई जाती थी दिवाली? लाल किले में जलता था 40 गज ऊंचा दीया

मुगलकाल में दिवाली को जश्न-ए-चिरागा कहा जाता था। लाल किले में हजारों दीये जलाए जाते थे और करीब 40 गज ऊंचे खंभे पर विशाल आकाश दीया लगाया जाता था। अकबर, शाहजहां और बहादुर शाह जफर के दौर से जुड़ी दिवाली की शाही परंपराओं, लक्ष्मी पूजा, मिठाइयों, दान और आतिशबाजी के दिलचस्प किस्से जानिए।
मुगल बादशाहों के दौर में कैसे मनाई जाती थी दिवाली? लाल किले में जलता था 40 गज ऊंचा दीया
जब लाल किले में मनती थी दिवाली, 100 किलो की बत्ती से जगमगाता था आकाश दीया

दिवाली आते ही घरों से लेकर बाजारों तक रोशनी और खुशियों का माहौल छा जाता है। कहीं मां लक्ष्मी और गणेश जी की पूजा होती है, तो कहीं घरों को दीयों और रंग-बिरंगी लाइटों से सजाया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि मुगल बादशाहों के दौर में भी दिवाली बड़े शाही अंदाज में मनाई जाती थी? उस समय इस त्योहार को 'जश्न-ए-चिरागा' कहा जाता था। लाल किले में हजारों दीये जलाए जाते थे, मिठाइयों की खास तैयारी होती थी और आतिशबाजी से आसमान रोशन हो उठता था। मुगल शासन के दौरान दिवाली सिर्फ आम लोगों का त्योहार नहीं थी, बल्कि शाही महल में भी इसे खास तरीके से मनाया जाता था। बाबर से लेकर बहादुर शाह जफर तक के दौर से जुड़ी कई ऐतिहासिक किताबों और यात्रियों के विवरणों में इस उत्सव का जिक्र मिलता है। खासकर शाहजहां द्वारा बसाए गए शाहजहानाबाद यानी पुरानी दिल्ली में दिवाली का जश्न देखने लायक होता था।

मुगल महल में दिवाली को कहते थे 'जश्न-ए-चिरागा'

मुगल दौर में दिवाली को 'जश्न-ए-चिरागा' यानी रोशनी का त्योहार कहा जाता था। लाल किले में इस मौके पर खास सजावट की जाती थी। महल के आंगन, गलियारों और दरबार को दीयों से रोशन किया जाता था। शाही परिवार के साथ-साथ दरबार के लोग भी इस जश्न में हिस्सा लेते थे। इतिहास से जुड़े विवरणों के मुताबिक, मुगल बादशाहों के समय दिवाली मनाने की परंपरा अकबर के शासनकाल में भी देखने को मिलती है। अकबर के बाद आने वाले शासकों ने भी इस परंपरा को आगे बढ़ाया। अलग-अलग दौर में त्योहार मनाने के तरीके और शाही तैयारियां बदलती रहीं, लेकिन रोशनी और उत्सव का रंग बना रहा।

महीनों पहले शुरू हो जाती थी मिठाइयों की तैयारी

दिवाली के जश्न में मिठाइयों का खास महत्व था। लाल किले में शाही परिवार और दरबार के मेहमानों के लिए कई तरह के पकवान और मिठाइयां बनाई जाती थीं। इसके लिए आगरा, मथुरा, लखनऊ और भोपाल जैसे शहरों से खास हलवाइयों को बुलाया जाता था। मिठाइयों को स्वादिष्ट बनाने के लिए आसपास के गांवों से शुद्ध देसी घी मंगवाया जाता था। शाही रसोई में त्योहार के लिए कई तरह की तैयारियां होती थीं। यानी दिवाली की मिठास सिर्फ घरों तक सीमित नहीं थी, बल्कि लाल किले के शाही दस्तरख्वान तक पहुंचती थी।

लाल किले पर जलता था 40 गज ऊंचा आकाश दीया

शाहजहां के दौर में दिवाली की रोशनी का एक खास आकर्षण 'आकाश दीया' हुआ करता था। इसे किले के सबसे ऊंचे स्थान पर करीब 40 गज ऊंचे बांस के खंभे पर लगाया जाता था। बताया जाता है कि इस विशाल दीये में 100 किलोग्राम से ज्यादा रुई की बत्ती और बड़ी मात्रा में सरसों का तेल इस्तेमाल किया जाता था। इसे जलाने और संभालने के लिए बड़ी-बड़ी सीढ़ियों की मदद ली जाती थी। जब दिवाली की रात यह आकाश दीया जलता था, तो इसकी रोशनी दूर तक दिखाई देती थी। लाल किले से लेकर चांदनी चौक के बाजारों तक रोशनी का खूबसूरत नजारा बन जाता था। उस दौर में यह शाही दिवाली की सबसे खास परंपराओं में से एक मानी जाती थी।

लाल किले में होती थी लक्ष्मी पूजा और आतिशबाजी

मुगल शासन के अंतिम दौर में बहादुर शाह जफर के समय भी लाल किले में दिवाली मनाने की परंपरा जारी रही। ऐतिहासिक विवरणों के मुताबिक, किले में लक्ष्मी पूजा का आयोजन किया जाता था। पूजा के लिए जरूरी सामान चांदनी चौक के कटरा नील बाजार से खरीदा जाता था। दिवाली की रात आतिशबाजी भी शाही जश्न का बड़ा हिस्सा होती थी। इसके लिए जामा मस्जिद के पीछे स्थित पाइवालान इलाके के आतिशबाजों को बुलाया जाता था। उनके बनाए पटाखों और आतिशबाजी से आसमान जगमगा उठता था। शाहजहां के दौर से जुड़ी कुछ ऐतिहासिक जानकारियों में यह भी बताया गया है कि महल की रानियां, बेगमें और शहजादे आतिशबाजी का नजारा देखने के लिए कुतुब मीनार तक जाया करते थे।

छोटी दिवाली पर रहता था खास पहरा

साल 1885 में प्रकाशित मुंशी फैजुद्दीन देहलवी की किताब 'बज्म-ए-आखिर' में लाल किले की दिवाली से जुड़ी कई दिलचस्प परंपराओं का जिक्र मिलता है। इसमें त्योहार को पहले, दूसरे और तीसरे दीये के रूप में बताया गया है। पहले दीये यानी छोटी दिवाली के दिन किले में खास सावधानी बरती जाती थी। उस समय तंत्र-मंत्र और काले जादू को लेकर कई तरह की मान्यताएं प्रचलित थीं। इन्हीं आशंकाओं के चलते किले की सुरक्षा बढ़ा दी जाती थी। बताया जाता है कि इस दिन कर्मचारियों को किले से बाहर जाने और बाहरी लोगों को अंदर आने की अनुमति नहीं होती थी। यहां तक कि बाहर से सब्जियां मंगाने पर भी रोक रहती थी। अगर बैंगन, कद्दू या चुकंदर जैसी सब्जियां पकानी होती थीं, तो उन्हें अच्छी तरह छीलकर जांचा जाता था। यह सब शाही परिवार, खासकर महल की महिलाओं को किसी कथित तांत्रिक प्रभाव से बचाने की मान्यता के तहत किया जाता था।

बड़ी दिवाली पर बादशाह का होता था तुलादान

मुख्य दिवाली यानी तीसरे दीये के दिन लाल किले में एक खास रस्म निभाई जाती थी। इस दिन बादशाह को सोने, चांदी और कीमती रत्नों के बराबर तौला जाता था। इस परंपरा को 'तुलादान' कहा जाता था। पूजा के बाद इस धन और कीमती चीजों को गरीबों और जरूरतमंदों में बांट दिया जाता था। इसके अलावा बादशाह की ओर से लोगों को सतनजा, सरसों का तेल, काले कंबल और दूसरी चीजें भी दान की जाती थीं। इसे सदका कहा जाता था। रात होते ही पूरा महल दीयों की रोशनी से जगमगा उठता था। महल की दासियां और सेवक घर-घर जाकर खील-बताशे, मिट्टी के खिलौने और गन्ने बांटते थे। शाही परिवार के बच्चे भी इस उत्सव में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। शहजादे और शहजादियां मिट्टी के छोटे-छोटे घर बनाकर उनमें खील-बताशे रखते और उनके सामने दीये जलाते थे।

शहनाई और नगाड़ों से गूंजता था शाही महल

मुगल बादशाहों की दिवाली में रोशनी के साथ संगीत का भी खास इंतजाम होता था। शाही नौबतखाने में शहनाई, नगाड़े और ढोल बजाए जाते थे। इन वाद्ययंत्रों से निकलने वाली मंगल धुनों को 'नौबत' कहा जाता था। महल के अलग-अलग हिस्सों में नींबू बांधकर गन्ने सजाए जाते थे। अगले दिन सुबह इन गन्नों को सेवकों में बांट दिया जाता था। इस दौरान शाही रथ की सजावट भी की जाती थी। रथ खींचने वाले सांडों के खुरों पर मेहंदी लगाई जाती थी और उनके गले में घंटियां बांधी जाती थीं। सम्राट के रथ पर बैठने से पहले सांडों की पीठ पर सोने और चांदी के तारों से सजी कीमती पोशाक रखी जाती थी। इस तरह शाही दिवाली में छोटी-छोटी चीजों का भी खास ध्यान रखा जाता था।

जहांगीर को पसंद था चौसर खेलना, रंगीला की दिवाली थी मशहूर

मुगल बादशाहों के दौर में दिवाली से जुड़ी कुछ अलग परंपराएं भी थीं। इतिहास से जुड़े विवरणों के मुताबिक, जहांगीर के समय दिवाली की रात चौसर खेलने का चलन था। वहीं, मुगल बादशाह मोहम्मद शाह रंगीला के दौर में चांदनी चौक की दिवाली काफी मशहूर थी। इसे 'रंगीला की दिवाली' के नाम से भी जाना जाता था। बताया जाता है कि बादशाह खुद शाही लश्कर के साथ बाजारों की रौनक देखने निकलते थे। इस दौरान चांदनी चौक की गलियां दीयों से सजी रहती थीं। बाजारों में मिठाइयों, सजावट और आतिशबाजी का माहौल होता था। दरबारियों और मनसबदारों की ओर से बादशाह को महंगे उपहार भी दिए जाते थे। रंग महल हजारों दीयों और झाड़-फानूसों से रोशन किया जाता था।

मुगल दौर की दिवाली में दिखती थी संस्कृति की झलक

मुगलकाल की दिवाली से जुड़े ये किस्से बताते हैं कि उस दौर में यह त्योहार सिर्फ पूजा-पाठ तक सीमित नहीं था। इसमें रोशनी, संगीत, मिठाइयां, दान और आतिशबाजी जैसी कई परंपराएं शामिल थीं। लाल किले से लेकर चांदनी चौक तक दिवाली का जश्न शाही अंदाज में मनाया जाता था। समय के साथ त्योहार मनाने के तरीके बदल गए, लेकिन दीपों की रोशनी और खुशियां बांटने का संदेश आज भी वैसा ही है।

Dolly Wasvani
By Dolly Wasvani

डोली वासवानी | People’s Institute of Media Studies से BAMC Student। पत्रकारिता की दुनिया में नई शुरु...

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