सड़क पर बनी इस लकीर के दोनों तरफ रखा कदम, क्या सच में बदल जाता है मौसम?

स्कूल की किताबों में आपने कर्क रेखा के बारे में जरूर पढ़ा होगा। नक्शे पर खिंची एक ऐसी लकीर, जो धरती को दो हिस्सों में बांटती है। लेकिन क्या आपने कभी इसे जमीन पर देखा है? क्या वाकई कर्क रेखा के एक तरफ गर्मी और दूसरी तरफ ठंड होती है? इसी सवाल का जवाब तलाशने के लिए हम पहुंचे भोपाल से सांची जाने वाले रास्ते पर, रायसेन जिले के सलामतपुर के पास। यहां सड़क किनारे कर्क रेखा की मार्किंग बनी हुई है। हमने भी इस रेखा के दोनों तरफ खड़े होकर मौसम का टेस्ट किया। एक कदम इधर रखा और दूसरा उधर, लेकिन न गर्मी बदली और न ठंड का अहसास हुआ।
कर्क रेखा पार करते ही क्यों नहीं बदलता मौसम?
दरअसल, कर्क रेखा को लेकर लोगों के बीच कई तरह की धारणाएं हैं। इनमें सबसे दिलचस्प धारणा यही है कि इसे पार करते ही मौसम बदल जाता है। जबकि वैज्ञानिक रूप से ऐसा नहीं होता। कर्क रेखा धरती पर मौजूद एक काल्पनिक अक्षांश रेखा है। यह कोई वास्तविक दीवार या सीमा नहीं है, जिसे पार करते ही तापमान में अचानक बदलाव आ जाए। कर्क रेखा लगभग 23.5 डिग्री उत्तरी अक्षांश पर स्थित है। इसकी खासियत पृथ्वी के झुकाव और सूर्य की किरणों से जुड़ी है।
पृथ्वी के झुकाव से जुड़ा है कर्क रेखा का विज्ञान
हमारी पृथ्वी अपनी धुरी पर लगभग 23.5 डिग्री झुकी हुई है। इसी झुकाव के कारण सालभर सूर्य की सीधी किरणों की स्थिति बदलती रहती है। कर्क रेखा पृथ्वी का सबसे उत्तरी अक्षांश है, जहां सूर्य साल में एक बार जून में ग्रीष्म अयनांत के आसपास स्थानीय दोपहर के समय ठीक सिर के ऊपर दिखाई दे सकता है। इस स्थिति में कर्क रेखा पर खड़े व्यक्ति की परछाईं स्थानीय दोपहर में बिल्कुल छोटी होकर पैरों के नीचे आ सकती है। इसे जीरो शैडो या शून्य छाया की स्थिति कहा जाता है।
भारत के 8 राज्यों से गुजरती है कर्क रेखा
कर्क रेखा सिर्फ मध्य प्रदेश ही नहीं, बल्कि भारत के कुल 8 राज्यों से होकर गुजरती है। इनमें गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और मिजोरम शामिल हैं। यानी देश के अलग-अलग हिस्सों में इस काल्पनिक रेखा का भौगोलिक महत्व देखा जा सकता है।
सड़क किनारे बनी मार्किंग भी आकर्षण का केंद्र
भोपाल से सांची और विदिशा की तरफ जाने वाले रास्ते पर सलामतपुर के पास सड़क किनारे कर्क रेखा की मार्किंग दिखाई देती है। यहां से गुजरने वाले कई लोग रुककर इसे देखते हैं। हमने भी यहां रुकने वाले राहगीरों और स्थानीय लोगों से बातचीत की। उनसे जाना कि वे इस मार्किंग के बारे में कितना जानते हैं और क्या उन्होंने भी कभी इसे लेकर मौसम बदलने वाली बात सुनी है। इसके पास मौजूद ढाबे पर भी चाय की चुस्की के साथ लोगों से बातचीत की। यह जानने की कोशिश की कि यहां आने वाले यात्री क्या खास तौर पर कर्क रेखा देखने के लिए रुकते हैं और स्थानीय लोगों को इस जगह के बारे में कब जानकारी मिली।
कब और किसने बनाई कर्क रेखा की मार्किंग?
इस जगह से जुड़ा एक सवाल यह भी है कि आखिर सड़क किनारे कर्क रेखा की यह मार्किंग कब बनाई गई और इसके पीछे क्या उद्देश्य था? स्थानीय लोगों से इस बारे में जानकारी जुटाने की कोशिश की गई। हालांकि, मार्किंग के निर्माण की तारीख और इसे बनवाने वाले विभाग की आधिकारिक पुष्टि जरूरी है। कुल मिलाकर, नक्शे में पढ़ी जाने वाली कर्क रेखा को जमीन पर देखना अपने आप में दिलचस्प अनुभव है। अगली बार जब आप भोपाल से सांची या विदिशा की तरफ जाएं, तो सलामतपुर के पास इस मार्किंग पर नजर जरूर डालिएगा। यहां एक कदम इस तरफ और एक कदम उस तरफ रखकर आप भी समझ सकते हैं कि भूगोल की किताबों में पढ़ी जाने वाली यह रेखा असल में कितनी खास है।




















