आशीष शर्मा, ग्वालियर। लाल रंग, गोल आकार और नाम है ‘लेडी रोसेटा’। हम यहां बात कर रहे आलू की किस्म की, जिसे लेडी रोसेटा के अनोखे नाम जाना जाता है। मध्य प्रदेश के किसान भी इस आलू की खेती करके गुजरात, बिहार, दिल्ली, जालंधर के किसानों की तरह अच्छा मुनाफा कमा सकेंगे। ऐसा इसलिए संभव हो पाएगा, क्योंकि राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विवि किसानों की आय में बढ़ोतरी के लिए काम कर रहा है और इसे लेकर विवि में लेडी रोसेटा आलू के बीज एरोपोनिक्स तकनीक से तैयार किए जा रहे हैं, जो कि दो-तीन साल में किसानों को खेती करने के लिए मिल सकेंगे।
लेडी रोसेटा आलू के अच्छी क्वालिटी के चिप्स तैयार होते हैं। यही वजह है कि चिप्स कंपनियां खेत में ही किसान से सौदा कर लेती हैं। आलू में शुगर कम चिप्स तलने के बाद काले और लाल नहीं पड़ते हैं।
एरोपोनिक्स तकनीक से आलू तैयार करने में मिट्टी का उपयोग नहीं किया जाता है, बल्कि सबसे पहले टिश्यू कल्चर और बायो-टेक्नोलॉजी की मदद से आलू के पौधों को नर्सरी में तैयार किया जाता है। एक महीने के अंदर जड़ और पत्ते निकल आते हैं। इसके बाद इन्हें जार से निकालकर थमार्कोल की शीट में छेद करके इस तरह से लगाया जाता है कि जड नीचे और पत्ते ऊपर रहते हैं। पौधों की जड़ों पर पोषक तत्वों और पानी की धुंध (स्प्रे) की जाती है, जिससे उन्हें आवश्यक पोषक तत्व मिलते है। इस तकनीक से तैयार आलू के बीज रोग-मुक्त होते हैं और उनमें किसी प्रकार के फंगल संक्रमण का खतरा नहीं होता है।
विवि के कुलपति प्रो. अरविंद कुमार शुक्ला ने बताया कि एक एकड़ में सादा आलू की खेती के लिए 8 से 10 क्विंटल आलू की जरूरत पड़ती है और 100 क्विंटल पैदावार होती है जबकि एरोपोनिक्स तकनीक से तैयार आलू सिर्फ 1.20 क्विंटल लगेगा और 238 क्विंटल उत्पादन होगा। एरोपोनिक्स आलू भी सामान्य आलू की तरह से दो से ढाई महीने में तैयार हो जाता है।
लेडी रोसेटा आलू की चिप्स कंपनियों में काफी डिमांड है, क्योंकि शुगर कम होने से आलू काले और लाल नहीं पड़ते। आलू के बीज विवि में तैयार किए जा रहे हैं, जो दो से तीन साल में प्रदेश के किसानों को उपलब्ध कराए जाएंगे।
प्रो. अरविंद कुमार शुक्ला, कुलपति, कृषि विवि, ग्वालियर