छत्तीसगढ़। छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले से एक ऐसी खोज सामने आई है, जिसने इतिहास और पुरातत्व जगत में नई हलचल पैदा कर दी है। यहां मनोरा विकासखंड के जयमरगा गांव के गढ़पहाड़ पर स्थित एक गुफा में हजारों साल पुराने शैलचित्र मिले हैं। विशेषज्ञों के अनुसार ये चित्र करीब 4,000 से 6,000 ईसा पूर्व के हैं। यानी यह स्थल करीब 6,000 साल पुरानी मानव सभ्यता की कहानी बयां करता है। इस खोज ने यह संकेत दिया है कि आज का यह शांत और प्राकृतिक क्षेत्र कभी आदिमानवों का बसेरा हुआ करता था। गुफा में मिले चित्र, औजार और प्राकृतिक संसाधनों के प्रमाण इस क्षेत्र को प्रागैतिहासिक जीवन का एक महत्वपूर्ण केंद्र साबित करते हैं।
यह गुफा जशपुर मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर दूर स्थित जयमरगा गांव के गढ़पहाड़ पर मौजूद है। जयमरगा गांव की आबादी करीब 1400 के आसपास है और यहां तक सड़क मार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है। हालांकि गुफा तक पहुंचने के लिए करीब 300 मीटर की चढ़ाई करनी पड़ती है, जो इस स्थान को और भी रोमांचक बना देती है। ऊंचाई पर स्थित यह गुफा आसपास के पूरे क्षेत्र का विहंगम दृश्य प्रस्तुत करती है, जिससे यह अनुमान लगाया जा रहा है कि प्राचीन समय में इसका उपयोग निगरानी स्थल के रूप में भी किया जाता होगा।
इस गुफा में मिले शैलचित्र प्रागैतिहासिक काल की कला और जीवनशैली को दर्शाते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार ये चित्र मध्य पाषाण काल (Mesolithic Age) के हैं।
इन चित्रों में कई प्रकार की आकृतियां देखने को मिली हैं :
इन शैलचित्रों में मुख्य रूप से लाल और सफेद रंगों का उपयोग किया गया है। माना जा रहा है कि इन रंगों को बनाने के लिए आदिमानव प्राकृतिक खनिजों का उपयोग करते थे।

गुफा के आसपास हेमाटाइट पत्थर भी पाया गया है, जिसे लाल रंग बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इससे यह अनुमान लगाया जा रहा है कि आदिमानव न केवल चित्र बनाते थे, बल्कि रंग तैयार करने की तकनीक भी जानते थे। यह उस समय की विकसित सोच और कलात्मक समझ को दर्शाता है।
इस खोज का अध्ययन कर रहे आदिम कला पुरातत्त्ववेत्ता डॉ. अंशुमाला तिर्की और बालेश्वर कुमार बेसरा का मानना है कि यह स्थल हजारों वर्ष पहले मानव निवास का केंद्र रहा होगा। उनके अनुसार यहां पाए गए शैलचित्र और पत्थर के औजार इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि उस समय यहां रहने वाले लोग शिकार, भोजन संग्रह और दैनिक जीवन के अन्य कार्यों में दक्ष थे।
गुफा के आसपास बड़ी मात्रा में माइक्रोलिथिक (सूक्ष्म पत्थर) उपकरण भी मिले हैं। इनमें शामिल हैं- लुनैट (अर्धचंद्राकार औजार), स्क्रैपर, पॉइंट, ट्रैपेज और ब्लेड। इन औजारों का उपयोग शिकार करने, काटने और अन्य दैनिक गतिविधियों में किया जाता था। यह दर्शाता है कि यहां रहने वाले आदिमानव तकनीकी रूप से काफी विकसित थे और अपने पर्यावरण के अनुसार खुद को ढाल चुके थे।
विशेषज्ञों का मानना है कि जयमरगा क्षेत्र प्राचीन मनुष्यों के लिए बेहद उपयुक्त स्थान रहा होगा। इसके पीछे कई कारण हैं- चारों ओर घने जंगल, पहाड़ी इलाका और पास में जल स्रोत। प्राचीन काल में जीवन के लिए भोजन, पानी और आश्रय सबसे जरूरी होते थे, और यह स्थान इन तीनों जरूरतों को पूरी तरह पूरा करता था।
गुफा की स्थिति को देखकर विशेषज्ञों का मानना है कि यह किसी ‘वॉच टावर’ की तरह काम करती रही होगी। ऊंचाई पर होने के कारण यहां से दूर-दूर तक नजर रखी जा सकती थी। संभव है कि आदिमानव यहां से जंगली जानवरों की गतिविधियों पर नजर रखते हों या अपने समूह की सुरक्षा सुनिश्चित करते हों।
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जहां एक ओर यह गुफा ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, वहीं स्थानीय ग्रामीणों के लिए यह आस्था का केंद्र भी है। जयमरगा के लोग यहां नियमित रूप से पूजा-अर्चना करते हैं। उनके लिए यह स्थान केवल एक पुरातात्विक स्थल नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी रखता है।
यह क्षेत्र अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के लिए भी जाना जाता है। गुफाओं के साथ-साथ यहां झरने, पहाड़ और हरियाली का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। यहां की शांत और स्वच्छ हवा, प्राकृतिक वातावरण और ऐतिहासिक महत्व इसे पर्यटन की दृष्टि से भी बेहद खास बनाते हैं।