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High Court News : 'प्रोजेक्ट रद्द होने पर भी किसानों को वापस नहीं मिलेगी जमीन'

जमीन अधिग्रहण पर मप्र हाईकोर्ट का बड़ा फैसला आया है। कोर्ट ने कहा कि एक बार कानूनी प्रक्रिया के तहत, मुआवजा देकर जमीन का अधिग्रहण कर लिया जाता है और वह सरकार की हो जाती है, तो प्रोजेक्ट रद्द होने पर भी वह जमीन किसानों को वापस नहीं सौंपी जा सकती।
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'प्रोजेक्ट रद्द होने पर भी किसानों को वापस नहीं मिलेगी जमीन'

जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भूमि अधिग्रहण के मुद्दे पर अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि एक बार कानूनी प्रक्रिया के तहत, मुआवजा देकर जमीन का अधिग्रहण कर लिया जाता है और वह सरकार के अधीन हो जाती है, तो मूल प्रोजेक्ट रद्द होने की स्थिति में भी वह जमीन किसानों को वापस नहीं सौंपी जा सकती। हालांकि, जस्टिस दीपक खोत की अदालत ने प्रभावित किसान परिवारों को राहत भी दी है। अदालत ने राज्य सरकार को कहा है कि चूंकि किसानों की आजीविका छीनी गई है, इसलिए नए प्रस्तावित औद्योगिक क्षेत्र में लगने वाले उद्योगों में प्रभावित परिवारों के कम से कम एक सदस्य को रोजगार दिलाना सुनिश्चित किया जाए।

सतना जिले के दिवाकर मिश्रा की याचिका

हाईकोर्ट ने यह फैसला सतना जिले की रघुराजनगर तहसील के ग्राम बाघा में रहने वाले दिवाकर प्रसाद मिश्रा व 27 अन्य (सभी किसान) की ओर से वर्ष 2012 में दाखिल याचिका पर दिया। इन सभी आवेदकों की जमीनों का वर्ष 1997-98 में इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन के एलपीजी टैंक और बॉटलिंग प्लांट के लिए करीब 40.271 हेक्टेयर निजी भूमि का अधिग्रहण किया गया था। अधिग्रहण के समय 'भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894' की धारा 41 के तहत सरकार और इण्डियन आयल कार्पोरेशन के बीच एक द्विपक्षीय समझौता हुआ था, जिसमें शर्त थी कि प्रत्येक प्रभावित किसान परिवार के एक सदस्य को नौकरी दी जाएगी।

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मुआवजा मिला लेकिन प्लांट नहीं लगा

किसानों को मुआवजा तो मिल गया, लेकिन बाद में आईओसीएल ने घाटे और प्रोजेक्ट के व्यावहारिक न होने की बात कहकर प्लांट की योजना को रद्द  कर दिया और जमीन राज्य सरकार को लौटा दी। साल 2010 में सरकार ने इस जमीन मप्र औद्योगिक विकास निगम को सौंपकर वहां 'औद्योगिक क्षेत्र' विकसित करने का विज्ञापन जारी कर दिया। इस पर जमीन वापस पाने यह याचिका वर्ष 2012 में दाखिल की गई थी। मामले पर हुई सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता किसानों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विपिन संघी, केसी घिल्डियाल, सिद्धार्थ गुलाटी, राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता प्रशान्त सिंह, शासकीय अधिवक्ता सुमित रघुवंशी ने दलीलें रखीं।

सरकारी जमीन है फिर निजी भूमि पर क्यों बनाई जा रही सड़क? 

दमोह में सरकारी जमीन के बजाए निजी भूमि पर बनाई जा रही सड़क को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर मप्र हाईकोर्ट ने राज्य सरकार व अन्य से जवाब मांगा है। जस्टिस डीडी बंसल और जस्टिस बीपी शर्मा की वेकेशन बेंच ने इसके लिए दो दिन का वक्त देते हुए 25 मई को आगे सुनवाई करने के निर्देश दिए हैं।

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स्कूल से स्टेशन तक बनने वाली सड़क पर सवाल 

दमोह जिले की पथरिया तहसील के वार्ड नं. 12 में रहने वाले संजय सोनी की ओर से दायर याचिका में पथरिया के ग्राम चोपड़ा से जगदीश शाला होते हुए स्टेशन रोड तक बनाई जा रही सड़क पर सवाल उठाए गए हैं। याचिका में आरोप है कि सरकारी जमीन होने के बाद भी यह सड़क निजी जमीनों पर बनाई जा रही, जिससे यह सड़क डेढ़ किमी लंबी बन रही है। इस बारे में संबंधित अधिकारियों को शिकायतें देने के बाद भी कोई कार्रवाई न होने पर यह याचिका दायर की गई। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सौरभ सिंह ठाकुर की दलीलों को सुनने के बाद वेकेशन बेंच ने अनावेदकों को दो दिन में जवाब पेश करने के निर्देश दिए।

Naresh Bhagoria
By Naresh Bhagoria

नरेश भगोरिया। 27 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि...Read More

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