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Iran- US War :जंग में अमेरिका पर भारी ईरान? घटते हथियारों से ट्रंप की बढ़ी चिंता...कैसे निकालेंगे हल!

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान के साथ संघर्ष में अमेरिका का हथियार भंडार तेजी से घट रहा है। शुरुआती 39 दिनों में ही अमेरिकी सेना ने हजारों लक्ष्यों को निशाना बनाया, जिससे मिसाइल और डिफेंस सिस्टम का बड़ा हिस्सा खर्च हो चुका है
जंग में अमेरिका पर भारी ईरान? घटते हथियारों से ट्रंप की बढ़ी चिंता...कैसे निकालेंगे हल!
Image Courtesy : Bloomberg

वॉशिंगटन डीसी। ईरान और अमेरिका में जारी तनाव के बीच अमेरिका की रणनीति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तय समय सीमा खत्म होने से कुछ घंटे पहले एकतरफा सीजफायर को फिर बढ़ा दिया। इस महीने में यह दूसरी बार है जब अमेरिका ने अचानक युद्धविराम का ऐलान किया है।
इस कदम से यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या अमेरिका जल्द से जल्द इस जंग से बाहर निकलना चाहता है। विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन एक ऐसे मौके की तलाश में है, जहां वह अपनी शर्तों पर जीत का दावा कर सके।

मिडिल ईस्ट में बढ़ता जोखिम और खर्च

ईरान की ओर से उन्नत मिसाइलों और हाइपरसोनिक तकनीक के इस्तेमाल ने अमेरिकी डिफेंस सिस्टम पर अतिरिक्त दबाव डाला है। एक-एक मिसाइल को रोकने के लिए कई इंटरसेप्टर दागने पड़ रहे हैं, जिससे लागत और सोर्स की खपत तेजी से बढ़ रही है। खाड़ी क्षेत्र में तैनात अमेरिकी ठिकानों पर भी हमलों का खतरा बना हुआ है। कई जगह इंटरसेप्टर मिसाइलों की कमी की खबरें सामने आई हैं, जो अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए चिंता का विषय है।

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हथियारों की कमी बन रही बड़ी चुनौती...

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान के साथ संघर्ष में अमेरिका का हथियार भंडार तेजी से घट रहा है। शुरुआती 39 दिनों में ही अमेरिकी सेना ने हजारों लक्ष्यों को निशाना बनाया, जिससे मिसाइल और डिफेंस सिस्टम का बड़ा हिस्सा खर्च हो चुका है।

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पैट्रियट, THAAD और टॉमहॉक जैसी अहम मिसाइलों का बड़ा स्टॉक इस्तेमाल हो चुका है। विशेषज्ञों का कहना है कि इन हथियारों को दोबारा तैयार करने में तीन से पांच साल तक लग सकते हैं, जिससे अमेरिका की सैन्य क्षमता पर दबाव बढ़ रहा है।

रणनीतिक दबाव में अमेरिका, विकल्प भी कम है

घटते संसाधन, बढ़ते खर्च और क्षेत्रीय तनाव के बीच अमेरिका के सामने विकल्प सीमित होते जा रहे हैं। ईरान भी पीछे हटने के मूड में नहीं दिख रहा और उसने खाड़ी क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत कर ली है, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य पर। वहीं, क्षेत्र में अन्य तनाव जैसे यमन के हूती विद्रोहियों की धमकियां और समुद्री मार्गों पर खतरा भी वैश्विक व्यापार के लिए जोखिम बढ़ा रहे हैं।

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ऐसे में साफ है कि अमेरिका के लिए यह जंग अब सिर्फ सैन्य नहीं, बल्कि रणनीतिक और आर्थिक चुनौती बन चुकी है। सीजफायर के बार-बार ऐलान इस बात की ओर इशारा करते हैं कि वॉशिंगटन अब इस संघर्ष से बाहर निकलने का रास्ता तलाश रहा है।

Aakash Waghmare
By Aakash Waghmare

आकाश वाघमारे | MCU, भोपाल से स्नातक और फिर मास्टर्स | मल्टीमीडिया प्रोड्यूसर के तौर पर 3 वर्षों का क...

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