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Warship Drone System: युद्धपोत बनेंगे मिनी एयरक्राफ्ट कैरियर, भारतीय नौसेना खरीदेगी 40 शिपबोर्न ड्रोन सिस्टम

जुलाई 2026 में DAC से मिली मंजूरी, 31 जनवरी 2027 तक पूरा होगा टेंडर, 100 मीटर लंबे युद्धपोतों पर तैनात होंगे 2 ड्रोन वाले सिस्टम। हेलीकॉप्टर की तुलना में ड्रोन कम खर्च में ज्यादा देर तक हवा में रह सकते हैं। इससे जहाज बड़े इलाके पर नजर रख सकते हैं।
Warship Drone System: युद्धपोत बनेंगे मिनी एयरक्राफ्ट कैरियर, भारतीय नौसेना खरीदेगी 40 शिपबोर्न ड्रोन सिस्टम
Warship Drone System

 नई दिल्ली। एक युद्धपोत को छोटे एयरक्राफ्ट कैरियर में बदलने का विचार भारत में आकार ले रहा है। भारत और अमेरिका दोनों ही जहाज से चलने वाले ड्रोन  (मानवरहित विमान) की क्षमताएं विकसित कर रहे हैं।  हालांकि इस तकनीक को विकसित करने के तरीके और स्तर में काफी अंतर है। चलते हुए डेक से उड़ान भरने में सक्षम मानवरहित विमान (ड्रोन) यह बदल रहे हैं कि एक युद्धपोत (वॉरशिप) क्या देख सकता है और किस पर हमला कर सकता है। भारत की इस दिशा में कोशिश 'नेवल शिपबोर्न अनमैन्ड एरियल सिस्टम' प्रोग्राम है। जुलाई 2026 में डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल से मंजूरी मिलने के बाद नौसेना ने खरीद प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए इंडस्ट्री को एक नोटिस जारी किया। इस प्रक्रिया को 31 जनवरी 2027 तक पूरा करने का लक्ष्य है।

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40 सिस्टम खरीदने की योजना

नौसेना की योजना 100 मीटर से अधिक लंबे युद्धपोतों के लिए लगभग 40 सिस्टम खरीदने की है। हर सिस्टम में मूल रूप से दो मानवरहित विमान, एक प्राइमरी कंट्रोल स्टेशन और एक स्टैंडबाय कंट्रोल स्टेशन शामिल करने की योजना है। ये ड्रोन मुख्य रूप से खुफिया जानकारी जुटाने, निगरानी और टोह लेने (reconnaissance) का काम करेंगे। ये संदिग्ध जहाजों पर नजर रखेंगे और रियल-टाइम तस्वीरें व सेंसर डेटा युद्धपोत के कमांड सेंटर तक पहुंचाएंगे। इनसे समुद्री डकैती-रोधी अभियानों, आतंकवाद-रोधी कार्रवाई, खोज और बचाव और युद्ध में हुए नुकसान का आकलन करने जैसे कार्यों में भी मदद मिलने की उम्मीद है। इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इन्फ्रारेड सेंसर दिन में तस्वीरें लेने और रात में चीजों का पता लगाने में सक्षम होंगे। वहीं रडार और इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस पेलोड रडार उत्सर्जन और कम्युनिकेशन सिग्नल को पकड़ सकेंगे।

ड्रोन से खर्च होता है कम, ज्यादा देर तक निगरानी

हेलीकॉप्टर की तुलना में ड्रोन कम खर्च में ज्यादा देर तक हवा में रह सकते हैं। इससे जहाज बड़े इलाके पर नजर रख सकते हैं और तेजी से कार्रवाई कर सकते हैं। साथ ही इनसे मिलने वाले डेटा का इस्तेमाल कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम में किया जा सकता है। इस खरीद प्रक्रिया में कम से कम 60% स्वदेशी सामग्री की शर्त रखी गई है। साथ ही कम से कम 50% मटीरियल, पुर्जे और सॉफ्टवेयर भारत में ही बने होने चाहिए।

हिलते-डुलते डेक से ड्रोन उड़ाना आसान नहीं होता

इसमें तेज हवाएं, खारे पानी से होने वाला नुकसान, सुरक्षित डेटा लिंक और मुश्किल इलेक्ट्रॉनिक माहौल जैसी चुनौतियां इसमें शामिल हैं। भारतीय कंपनी JSW ग्रुप और अमेरिकी कंपनी Shield AI  ने भारत में V-Bat रनवे-इंडिपेंडेंट ड्रोन बनाने के लिए साझेदारी की है। Shield AI के X-BAT को AI से चलने वाले वर्टिकल टेकऑफ और लैंडिंग करने वाले फाइटर-क्लास एयरक्राफ्ट के तौर पर पेश किया जा रहा है, जिसे रनवे की जरूरत नहीं होती। इसका विंगस्पैन 39 फीट है, रेंज 2,000 नॉटिकल माइल (3704 किमी) है और यह 50,000 फीट से ज्यादा ऊंचाई तक उड़ सकता है। यह कंपनी के Hivemind AI पायलट से चलता है, जो GPS और कम्युनिकेशन जैम होने पर भी हमला करने, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और निगरानी जैसे मिशन पूरे कर सकता है। Shield AI का कहना है कि इसके पहले प्रोटोटाइप इस महीने के आखिर तक तैयार हो जाएंगे। साल खत्म होने से पहले इसकी फ्लाइट टेस्टिंग होगी और 2029 में इसका बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन शुरू करने की योजना है।

Puneet Pandey
By Puneet Pandey

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