चार बाइप्लेन से शुरू हुआ वायुसेना का सफर 94 साल में राफेल तक पहुंचा, हर युद्ध में देश की रक्षा में रहे आगे

नई दिल्ली। चार वेस्टलैंड वापिटी (Wapiti) बाइप्लेन (ब्रिटिश मूल का दो सीटों वाला सैन्य बाइप्लेन), RAF से ट्रेनिंग पाए छह अफसर और 19 हवाई सिपाही। 1933 में भारतीय वायु सेना का यही स्वरूप था, जब कराची (जो तब ब्रिटिश भारत का हिस्सा था) के ड्रिग रोड से इसकी पहली ऑपरेशनल उड़ान भरी गई थी। वापिटी आज के फाइटर जेट्स से बिल्कुल अलग थी। दो सीटों वाला यह बाइप्लेन एक ऐसी फोर्स की साधारण शुरुआत को दिखाता था जो आगे चलकर युद्ध लड़ेगी। भारत के आसमान की रक्षा करेगी और देश की सीमाओं से दूर जाकर मिशन पूरे करेगी। नौ दशक से ज्यादा समय के बाद IAF अब राफेल, Su-30MKI, मिराज-2000, मिग-29, जगुआर और तेजस जैसे विमान उड़ाती है। इन्हें ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट, अटैक और भारी सामान उठाने वाले हेलीकॉप्टर, ड्रोन और कई स्तरों वाले एयर-डिफेंस नेटवर्क का साथ मिलता है। 2025 में 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान इसने अपनी कई क्षमताओं का इस्तेमाल किया। उन चार वापिटी विमानों और आज के फाइटर बेड़े के बीच का फर्क सिर्फ तकनीकी तरक्की का पैमाना नहीं है। यह उन युद्धों का भी रिकॉर्ड है जो भारत ने लड़े, उनसे सीखे गए सबक और उस तरह की वायु सेना का भी, जिसकी जरूरत भारत ने धीरे-धीरे महसूस की। 8 अक्टूबर को जब IAF अपने 94 साल पूरे किए तो उसका सफर यह कहानी बताता है कि कैसे हर संघर्ष, हर नए विमान और हर तकनीकी तरक्की ने इसे आज की फोर्स बनाने में मदद की।

1932-1945 का दौर
IAF की स्थापना 8 अक्टूबर 1932 को हुई थी। इसकी पहली ऑपरेशनल उड़ान छह महीने बाद, 1 अप्रैल 1933 को भरी गई थी। कराची के ड्रिग रोड पर बनी छोटी सी यूनिट में RAF से ट्रेनिंग पाए छह अफसर और 19 हवाई सिपाही शामिल थे। चार वापिटी IIA एयरक्राफ्ट उस यूनिट का मुख्य हिस्सा थे जो आगे चलकर 'नंबर 1 स्क्वाड्रन' बनी। शुरुआती दौर सटीक हमले करने वाले हथियारों और नेटवर्क-बेस्ड युद्ध के जमाने से बहुत अलग था। 1936 में, इस नई फोर्स ने उत्तरी वजीरिस्तान (जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है) के मीरान शाह से अपना पहला ऑपरेशनल मिशन पूरा किया। अप्रैल 1936 में दूसरी फ्लाइट और जून 1938 में तीसरी फ्लाइट बनाई गई, जिससे 'नंबर 1 स्क्वाड्रन' पूरी तरह तैयार हो गई। जब दूसरा विश्व युद्ध शुरू हुआ, तब भी यह IAF का एकमात्र ग्रुप था। उसमें 16 अफसर और 662 जवान थे, फिर युद्ध ने सब कुछ बदल दिया। उस समय भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था और दूसरे विश्व युद्ध के दौरान मित्र देशों (Allied forces) की तरफ से लड़ रहा था। इस दौरान अहम बंदरगाहों और तटीय ठिकानों की सुरक्षा के लिए 'कोस्टल डिफेंस फ्लाइट्स' बनाई गईं। ये फ्लाइट्स उपमहाद्वीप के कई रणनीतिक रूप से अहम तटीय शहरों में तैनात थीं। मद्रास, बॉम्बे, कलकत्ता, कराची और कोचीन और बाद में विशाखापत्तनम में भी एक और फ्लाइट बनाई गई।
IAF की पहली यूनिट के सदस्य।
बढ़ती गईं स्क्वाड्रन
1941 तक IAF ने वापिटी (Wapiti) विमानों का इस्तेमाल कम करना शुरू कर दिया था। शुरुआती ट्रेनिंग के लिए टाइगर मॉथ (Tiger Moths) का इस्तेमाल हो रहा था जबकि नंबर 1 स्क्वाड्रन वेस्टलैंड लाइजेंडर (Westland Lysander) पर शिफ्ट हो गया था। हरिकेन (Hurricane) के आने से पहले, नंबर 2 और नंबर 3 स्क्वाड्रन ऑडाक्स (Audax) विमान उड़ाते थे। 1942 के आखिर तक, IAF में पांच स्क्वाड्रन काम कर रहे थे। 1943 में नंबर 7 स्क्वाड्रन अमेरिका में बने वेंजेन्स (Vengeance) डाइव बॉम्बर पर शिफ्ट हो गया। 1944 के आखिर तक, नौ स्क्वाड्रन एक्टिव थे; इनमें से ज्यादातर हरिकेन और एक स्क्वाड्रन स्पिटफायर (Spitfires) उड़ाता था। मार्च 1945 में, इस फोर्स को "रॉयल" नाम मिला। हालांकि, यह नाम ज्यादा समय तक नहीं रहा।
1947–1962 में जेट विमानों का आगमन
1947 में आजादी तो मिली लेकिन साथ ही सेना का अचानक पुनर्गठन भी हुआ। संपत्ति के बंटवारे के कारण IAF को अपने कर्मचारी और उपकरण नई बनी रॉयल पाकिस्तान एयर फोर्स को देने पड़े। इसकी ताकत लगभग आधी हो गई। हालांकि बंटवारे से पहले 1946 तक इस फ़ोर्स में लगभग 28,500 लोग थे। इनमें करीब 1,600 अफसर शामिल थे। युद्ध के दौरान इसके लोगों को बाईस 'डिस्टिंग्विश्ड फ़्लाइंग क्रॉस' (Distinguished Flying Crosses) और कई अन्य सम्मान दिए गए थे।
जनवरी 1950 में रॉयल शब्द हट गया
उस समय IAF के पास छह फाइटर स्क्वाड्रन थीं, जिनमें स्पिटफायर, वैम्पायर और टेम्पेस्ट जैसे विमान शामिल थे। इनके अलावा बॉम्बर, ट्रांसपोर्ट, ऑब्ज़र्वेशन और कम्युनिकेशन यूनिट्स भी थीं। वैम्पायर के आने से फ्लीट में जेट फाइटर शामिल हुए। 1953 में ओरागन आया, फिर मिस्टेयर IVA, हंटर और कैनबरा आए। IAF की तय क्षमता को 15 स्क्वाड्रन से बढ़ाकर 33 स्क्वाड्रन करने की योजना बनाई गई। 1962 में भारत ने सोवियत संघ के साथ MiG-21 फाइटर और जमीन से हवा में मार करने वाली मिसाइलें हासिल करने के लिए समझौते किए।
1965–1971 तक हवाई ताकत के बदलते संतुलन का समय
1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद के सालों में आधुनिकीकरण का एक और दौर आया। यह दौर चीन के साथ 1962 के युद्ध में मिली हार के ठीक बाद और तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की सेना को मजबूत करने की कोशिशों के बीच शुरू हुआ। मिग-21FL ने पुराने विमानों की जगह लेनी शुरू कर दी। IAF अब सिर्फ विमान नहीं जोड़ रही थी, बल्कि उनके आस-पास एक सिस्टम भी बना रही थी। इसी क्रम में जनवरी 1971 में डुंडीगल में एयर फ़ोर्स एकेडमी का उद्घाटन किया गया।
दिसंबर 1971 में पाकिस्तान से युद्ध
लड़ाई में नैट (Gnat) और मिग-21 (MiG-21) विमानों की अहम भूमिका रही। इस युद्ध ने दिखाया कि दो दशक पहले कश्मीर संघर्ष में शामिल हुई वायु सेना की तुलना में, कहीं ज्यादा बड़ी और बेहतर हथियारों से लैस IAF क्या कर सकती थी। भारत के सैन्य दबदबे ने आखिरकार पाकिस्तान को सैन्य इतिहास के सबसे बड़े आत्मसमर्पणों में से एक के लिए मजबूर कर दिया। युद्ध के बाद भी विमानों में जैगुआर (Jaguar) और मिराज 2000 (Mirage 2000) विमान बेड़े में शामिल हुए।
1999 में कारगिल में हवाई ताकत ने बदला जंगी का समीकरण
इस युद्ध में भारतीय विमानों को दुनिया के सबसे ऊंचे और मुश्किल इलाकों में से कुछ के ऊपर उड़ान भरनी थी और लाइन ऑफ कंट्रोल (LoC) को पार करने से भी बचना था। ऑपरेशन सफेद सागर भारतीय वायु सेना (IAF) के सबसे ज्यादा ध्यान खींचे जाने वाले ऑपरेशन्स में से एक बन गया। मिराज-2000 विमानों ने सटीक हमले किए, जबकि मिग विमानों ने अतिरिक्त हमला करने और मदद देने का काम किया। बाद में सरकार ने कारगिल में IAF के प्रयासों का ब्यौरा दिया, जिसमें 2,000 से ज्यादा हेलिकॉप्टर सॉर्टीज के अलावा लगभग 5,000 स्ट्राइक मिशन, करीब 350 टोही और इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस मिशन और लगभग 800 एस्कॉर्ट सॉर्टीज शामिल थीं।
IAF में महिलाएं परेड ग्राउंड से फ्रंटलाइन तक पहुंचीं
महिला अफसरों ने 1990 के दशक की शुरुआत में IAF में शामिल होना शुरू किया। पहले वे ग्राउंड ड्यूटी करती थीं और बाद में ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट और हेलिकॉप्टर उड़ाने लगीं। 2016 में, अवनी चतुर्वेदी, भावना कंठ और मोहना सिंह पहली तीन महिला फाइटर पायलट बनीं। यह सफर तब और आगे बढ़ा जब शिवांगी सिंह भारत की पहली महिला राफेल पायलट बनीं और भावना कंठ 2026 में फाइटर कॉम्बैट लीडर के तौर पर क्वालिफाई करने वाली पहली महिला IAF ऑफीसर बनीं। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान, विंग कमांडर व्योमिका सिंह IAF के एक प्रमुख चेहरे के तौर पर सामने आईं और कर्नल सोफिया कुरैशी के साथ मिलकर देश को जानकारी दी।
2016 से तेजस और भारतीय फाइटर जेट की ओर कदम
अपने इतिहास के ज़्यादातर समय में, IAF विदेशी फाइटर पर निर्भर रहने वाली वायूसेना ने स्वदेशी लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (LCA) की तरफ रुख किया। यह एक मल्टी-रोल फाइटर जेट के तौर पर डिजाइन किया गया था, जिसमें डिजिटल एवियोनिक्स, फ्लाई-बाय-वायर कंट्रोल और कम्पोजिट मटीरियल का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया है। तेजस का पहला स्क्वाड्रन 2016 में IAF में शामिल किया गया था। यह पहले से मौजूद फाइटर जेट बेड़े की जगह रातों-रात लेने वाला विमान नहीं था। तेजस की संख्या बढ़ने के बावजूद IAF ने अपने Su-30MKI, मिराज-2000, मिग-29 और जगुआर विमानों का इस्तेमाल जारी रखा। इसके साथ ही वायुसेना में फ्रांस के रफाल भी शामिल किए गए।
2025 में ऑपरेशन सिंदूर और युद्ध का नया रूप
7 मई 2025 को भारतीय वायु सेना (IAF) का सामना एक ऐसे संघर्ष से हुआ जो 1965 या 1971 की हवाई लड़ाइयों से बिल्कुल अलग था। पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद 'ऑपरेशन सिंदूर' शुरू किया गया था। भारत ने बताया कि शुरुआती हमलों में पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में मौजूद नौ आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया गया। प्रधानमंत्री मोदी की सरकार ने इस कार्रवाई को सोची-समझी और नपी-तुली बताया और शुरुआती बयान में कहा कि इसमें पाकिस्तान के किसी भी सैन्य ठिकाने को निशाना नहीं बनाया गया था। इसके बाद इस ऑपरेशन का दायरा और बढ़ गया।




















