PU Special :हिंदी दिवस पर हिंदी विश्वविद्यालय की हकीकत, एमए हिंदी में सिर्फ 1 विद्यार्थी

रामचन्द्र पाण्डेय, भोपाल। प्रदेश के विभागों में हिंदी का प्रयोग होने लगा है, लेकिन सेंट्रल के विभाग और व्यावसायिक क्षेत्र में आज भी अंग्रेजी का ही उपयोग हो रहा है। वर्ष 2011 में 68 विद्यार्थियों से शुरू हुआ विश्वविद्यालय आज 4000 सीटों की क्षमता तक पहुंच गया है, परंतु कक्षाएं खाली हैं। 2023 में 13 सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति हुई, जिन पर सालाना लगभग 1.56 करोड़ का वेतन भार है, लेकिन पढ़ाने के लिए विद्यार्थी नहीं हैं। आंकड़े बताते हैं कि हिंदी विश्वविद्यालय को हिंदी को डिजिटल मीडिया, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, अनुवाद और कंटेंट निर्माण से जोड़कर रोजगारपरक बनाने की जरूरत है।
हिंदी विवि में प्रवेश की हकीकत
अटल बिहारी हिंदी विश्वविद्यालय में प्रवेश के आंकड़े हिंदी की मौजूदा स्थिति पर सवाल खड़े कर रहे हैं। एमए हिंदी में महज 1 विद्यार्थी है, जबकि एमए भूगोल में 1, एमए अर्थशास्त्र में 1 और एमए इतिहास में 3 विद्यार्थी ही हैं। वहीं एमए योग में 12, एमएससी रसायन में 8, एमएससी कंप्यूटर में 15, एमकॉम में 9, एमबीए में 1, एलएलएम में 5 और एमएफए में 6 विद्यार्थी प्रवेशित हैं।
ये भी पढ़ें: लवकुश जयंती पर गुना में शोभायात्रा निकली, फूलों से हुआ भव्य स्वागत
4000 सीटों की क्षमता, फिर भी कक्षाएं खाली
वर्ष 2011 में 68 विद्यार्थियों से शुरू हुआ विश्वविद्यालय आज 4000 सीटों की क्षमता तक पहुंच गया है, लेकिन कक्षाएं खाली हैं। 2023 में 13 सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति हुई, जिन पर सालाना लगभग 1.56 करोड़ का वेतन भार है, लेकिन पढ़ाने के लिए विद्यार्थी नहीं हैं। स्थिति यह है कि 13 नए शिक्षकों पर 13 लाख प्रतिमाह का खर्च हो रहा है, लेकिन कई कोर्स में छात्र नगण्य हैं।
चार कुलपति बदले, पर हालात वही
स्थापना से अब तक चार कुलपति बदल चुके हैं, लेकिन कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं बना। कौन से कोर्स चलाने हैं, कौन से बंद करने हैं और शोध को कैसे बढ़ाना है, इस पर दीर्घकालिक नीति का अभाव है। जिस विश्वविद्यालय के नाम में ही हिंदी है, वहां हिंदी में एक छात्र होना बताता है कि हिंदी को नई पीढ़ी से जोड़ा नहीं गया और अब हिंदी को डिजिटल मीडिया, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), अनुवाद और कंटेंट निर्माण से जोड़ना जरूरी है।
राष्ट्र के विकास में हिंदी की भूमिका
साहित्यकारों के अनुसार देश के सर्वांगीण विकास में हिंदी भाषा की उपयोगिता अत्यधिक है। यदि देश का उच्च वर्ग हिन्दी के विकास लिए समर्पित भाव से कार्य करने के लिए तैयार हो जाए तो हिन्दी की स्थिति में सुधार संभव है। हिन्दी भाषा के सम्यक विकास के लिए पर्याप्त अभ्यास की जरूरत होती है और इसे शुद्ध बोलने, शुद्ध पढ़ने और शुद्ध लिखने के लिए सतत अभ्यास करने की जरूरत है।
अंग्रेजी माध्यम के बढ़ते प्रभाव पर चिंता
डॉ. दामोदर जैन, शिक्षाविद एवं पूर्व सदस्य एनसीईआरटी, भोपाल के अनुसार आजकल गांव-गांव में अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों की भीड़ बढ़ती जा रही है, जिससे आज के बच्चे अपनी हिंदी भाषा से दूर होते जा रहे हैं। हिन्दी भारतीय समाज के उल्लास और सौंदर्य की भाषा है। यह चिंतन, मनन और भाव धारा की भाषा है। अगर हमें राष्ट्रीय स्तर पर अपनी लाज बचानी है तो हिन्दी भाषा के प्रयोग को बढ़ाना चाहिए और इसके लिए हिन्दी भाषा का प्रयोग करने वाले लोगों को समाज में सम्मानित करना होगा।
ये भी पढ़ें: सत्य निकेतन हादसे में कोर्ट का सख्त रुख! PG संचालकों को 12 दिन की न्यायिक हिरासत, जांच तेज
हिंदी को रोजगारपरक बनाने की जरूरत
शिक्षाविद और आरटीआई एक्टिविस्ट रमाकांत पाण्डेय ने कहा कि हिंदी विवि के आंकड़े बताते हैं कि हिंदी उन्नति नहीं, पतन की ओर जा रही है। हिंदी दिवस पर केवल संगोष्ठी करना काफी नहीं है। हिंदी विश्वविद्यालय को हिंदी को रोजगारपरक बनाना होगा। भाषा प्रौद्योगिकी, पत्रकारिता, अनुवाद और भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक तकनीक से जोड़कर ही विद्यार्थियों को आकर्षित किया जा सकता है। कुलपति बदलने से दिशा नहीं बदलती, स्पष्ट अकादमिक विजन से दिशा बदलती है। मनीष कुमार द्विवेदी, शिक्षाविद और समाजसेवी ने कहा कि हमारे देश की साधारण जनता अधिकतर अंग्रेजी नहीं, हिन्दी बोलना जानती है। यह देश भर की संपर्क भाषा भी है, लेकिन बड़े कारोबारी और सरकारी भाषा के रूप में बहुधा अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जा रहा है। हिन्दी तो हमारी मां के समान मातृभाषा है, इसलिए इसका स्थान तो सर्वोच्च होना ही चाहिए, लेकिन अभी भी हिंदी की प्रगति में अनेक बाधाएं हैं। हिन्दी की लोकप्रियता बढ़ाने में ऊंचे पद पर कार्यरत अधिकारियों का बड़ा योगदान हो सकता है, लेकिन वे आज भी हिंदी के प्रयोग से बचते नजर आते हैं। हिंदी के विकास के लिए सार्वभौमिक प्रयास की जरूरत है।




















