हरदा के भगवान सिंह की आठ साल की उम्र में चली गई थी आंखों की रोशनी; हौसला रहा कायम, ब्रेल लिपि से संवार रहे बच्चों का भविष्य

हरदा।जिले के सुखरास निवासी भगवान सिंह कलम ने जीवन की सबसे बड़ी चुनौती को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि ताकत बना लिया। महज आठ साल की उम्र में आंखों की रोशनी खोने के बावजूद उन्होंने पढ़ाई जारी रखी और शिक्षक बनने का सपना पूरा किया। शिक्षक दिवस के मौके पर पीपुल्स समाचार की टीम जब उनसे मिलने पहुंची तो उनके संघर्ष और जज्बे की प्रेरणादायक कहानी सामने आई।
बहुत इलाज कराया पर नहीं लौटी आंखों की रोशनी
भगवान सिंह बताते हैं कि बचपन में वे सामान्य बच्चों की तरह देख सकते थे। दूसरी कक्षा में पढ़ाई के दौरान उन्हें टाइफाइड हुआ। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी और माता-पिता भी ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन उन्होंने बेटे के इलाज में कोई कमी नहीं छोड़ी। पहले हरदा और फिर इंदौर में इलाज कराया गया, लेकिन धीरे-धीरे उनकी आंखों की रोशनी पूरी तरह चली गई।
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संघर्ष के बीच शिक्षा जारी रखी, शिक्षक बनने का सपना किया पूरा
आंखों की रोशनी जाने के बाद भी भगवान सिंह ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और शिक्षक बनने का सपना साकार किया। वर्ष 2006 में उन्हें प्राथमिक शिक्षक के रूप में नियुक्ति मिली। इसके बाद उन्होंने शिक्षा को अपना माध्यम बनाकर बच्चों का भविष्य संवारना शुरू किया। आज भगवान सिंह सुखरास शासकीय प्राथमिक शाला में बच्चों को पढ़ा रहे हैं। अपनी दृष्टिबाधिता को उन्होंने कभी शिक्षा के रास्ते में बाधा नहीं बनने दिया। उनके लिए शिक्षक बनना केवल नौकरी नहीं, बल्कि अपने संघर्षों को सार्थक करने का माध्यम भी है।
ब्रेल लिपि और स्पेशल बोर्ड से पढ़ाते हैं हिंदी, अंग्रेजी और पर्यावरण
आंखों से दिखाई नहीं देने के बावजूद भगवान सिंह ब्रेल लिपि और स्पेशल बोर्ड की मदद से बच्चों को हिंदी, अंग्रेजी और पर्यावरण जैसे विषय पढ़ाते हैं। उनके पढ़ाने का तरीका ऐसा है कि बच्चों को पढ़ाई समझने में किसी तरह की परेशानी नहीं होती। बच्चे भी कहते हैं कि उन्हें कभी महसूस नहीं होता कि उनके शिक्षक देख नहीं सकते। भगवान सिंह जिस सहजता और आत्मविश्वास के साथ पढ़ाते हैं, उससे किताब में लिखी बातें उन्हें आसानी से समझ में आ जाती हैं। उनका ज्ञान और अनुभव बच्चों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।
हजारों बच्चों के जीवन में पहुंचाई शिक्षा की रोशनी
भगवान सिंह आज अपने ज्ञान और अनुभव के जरिए हजारों बच्चों के जीवन में शिक्षा की रोशनी पहुंचा चुके हैं। उनका जीवन यह साबित करता है कि किसी व्यक्ति की शारीरिक कमी उसकी सफलता की राह में स्थायी बाधा नहीं बन सकती। उनकी कहानी बताती है कि आंखों से दिखाई देना जरूरी नहीं, मंजिल देखने के लिए हौसला होना जरूरी है। दृढ़ इच्छाशक्ति, मेहनत और शिक्षा के प्रति समर्पण के दम पर भगवान सिंह ने न सिर्फ अपना भविष्य संवारा, बल्कि अब दूसरों के भविष्य को भी रोशन कर रहे हैं।
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