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PU Special :खुद स्टूडेंट होकर बने शिक्षक, स्लम और मजदूर परिवारों के बच्चों का भविष्य संवार रहे युवा

भोपाल में युवा अपनी पढ़ाई के साथ शिक्षक की भूमिका निभाकर स्लम और मजदूर परिवारों के बच्चों को मुफ्त शिक्षा दे रहे हैं। मंथन फाउंडेशन 120 से ज्यादा बच्चों के साथ काम कर रहा है जबकि रुद्राक्ष प्ले स्कूल में करीब 60 बच्चे पढ़ रहे हैं।
खुद स्टूडेंट होकर बने शिक्षक, स्लम और मजदूर परिवारों के बच्चों का भविष्य संवार रहे युवा
मंथन फाउंडेशन

पल्लवी वाघेला, भोपाल। शिक्षा हर बच्चे का अधिकार है लेकिन आर्थिक तंगी, परिवार की परिस्थितियां और लगातार होने वाला पलायन आज भी कई बच्चों को स्कूल से दूर कर देता है। राजधानी भोपाल में कुछ युवाओं ने इसी चुनौती को अपनी जिम्मेदारी मानते हुए ऐसे बच्चों को पढ़ाने का बीड़ा उठाया है। खास बात यह है कि इनमें से कई युवा खुद उस समय स्टूडेंट थे लेकिन उन्होंने पढ़ाई के साथ शिक्षक की भूमिका भी निभाई और स्लम बस्तियों तथा मजदूर परिवारों के बच्चों को शिक्षा से जोड़ने की कोशिश शुरू की। किसी ने अपने छोटे से एक कमरे के घर में फ्री क्लास शुरू की, तो किसी ने घरों से रद्दी और कबाड़ इकट्ठा कर उसकी बिक्री से बच्चों के लिए किताबें और शिक्षण सामग्री जुटाई। इन युवाओं की कोशिशों से कई ऐसे बच्चे दोबारा स्कूल पहुंच सके, जिनकी पढ़ाई आर्थिक या सामाजिक परिस्थितियों के कारण छूट गई थी।

मंथन फाउंडेशन से 120 से ज्यादा बच्चों को मिल रही शिक्षा

भोपाल में करीब 15 युवाओं का एक समूह पिछले चार साल से स्लम बस्तियों में रहने वाले बच्चों की शिक्षा के लिए काम कर रहा है। कोविड के बाद बच्चों की पढ़ाई पर पड़े असर को देखते हुए वर्ष 2022 में इस समूह ने मंथन फाउंडेशन के नाम से रामनगर बस्ती में काम शुरू किया। संस्था के शुरुआती सर्वे में सामने आया कि बस्ती के करीब 54 प्रतिशत बच्चे स्कूल छोड़ चुके थे। कई बच्चों की सीखने की गति भी काफी धीमी थी। स्थिति को देखते हुए फाउंडेशन के वॉलंटियर्स ने शुरुआत में बच्चों के लिए सप्ताह में एक दिन क्लास लगाना शुरू किया। शुरुआती दिनों में बच्चे मैदान में नीम के पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ाई करते थे। बच्चों की पढ़ाई में रुचि बनी रहे, इसके लिए हर तीन महीने में अलग-अलग गतिविधियां भी आयोजित की जाती थीं। धीरे-धीरे बच्चों की पढ़ाई में दिलचस्पी बढ़ी और संस्था ने कई बच्चों का दोबारा स्कूल में दाखिला कराया। मंथन फाउंडेशन से जुड़े गौरव म्हसे बताते हैं कि लगातार काम करने के बाद इस साल संस्था ने ‘कलम से कलाम तक’ लर्निंग सेंटर की शुरुआत की है। यह केंद्र खास तौर पर उन बच्चों के लिए है, जो कभी स्कूल नहीं गए, पढ़ाई छोड़ चुके हैं या स्कूल में दाखिल होने के बावजूद उन्हें सीखने के लिए अतिरिक्त मदद की जरूरत है।

पॉकेट मनी से शुरू हुआ सफर, रद्दी से जुटाई शिक्षण सामग्री

मंथन फाउंडेशन के युवाओं ने शुरुआती दौर में बच्चों की शिक्षा से जुड़ी जरूरतों को पूरा करने के लिए अपनी पॉकेट मनी का इस्तेमाल किया। इसके बाद उन्होंने रद्दी कैंपेन भी शुरू किया। घरों से इकट्ठा की गई रद्दी और अन्य कबाड़ को बेचकर मिलने वाली रकम से बच्चों के लिए किताबें, कॉपियां और दूसरी शिक्षण सामग्री खरीदी गई। गौरव के मुताबिक वर्तमान में फाउंडेशन करीब 120 बच्चों के साथ शैक्षणिक स्तर पर काम कर रहा है। इनमें से करीब 50 प्रतिशत बच्चों का दोबारा स्कूल में दाखिला कराया जा चुका है। फाउंडेशन का उद्देश्य है कि कोई भी बच्चा केवल आर्थिक या सामाजिक परिस्थितियों के कारण शिक्षा से वंचित न रहे। बच्चों को सीखने, आगे बढ़ने और अपने भविष्य को बेहतर बनाने का अवसर मिल सके, इसी दिशा में लगातार काम किया जा रहा है।

खुद पढ़ाई छूटने का दर्द झेला, अब पलायन करने वाले बच्चों को पढ़ा रहीं सरिता

अकबरपुर, विनीत कुंज की रहने वाली सरिता शर्मा ने खुद पढ़ाई छूटने की परेशानी झेली है। परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण उन्हें दसवीं के बाद अपनी पढ़ाई रोकनी पड़ी। लेकिन उन्होंने परिस्थितियों के आगे हार नहीं मानी।

Sarita Sharma

सरिता शर्मा

अपनी पढ़ाई दोबारा शुरू करने के साथ उन्होंने आसपास के बच्चों को मुफ्त में पढ़ाना भी शुरू कर दिया। सरिता बताती हैं कि उनकी मां को कैंसर होने के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति बिगड़ गई थी। इसके बाद कोविड की वजह से मुश्किलें और बढ़ गईं। कोचिंग की फीस जुटाना संभव नहीं था और उन्हें लगा कि बिना कोचिंग के आगे पढ़ना मुश्किल होगा। इसी वजह से दसवीं के बाद उनकी पढ़ाई रुक गई। लॉकडाउन के दौरान उन्हें महसूस हुआ कि उनके आसपास ऐसे कई बच्चे होंगे, जो ट्यूशन नहीं जा पा रहे होंगे और स्कूल बंद होने से उनकी पढ़ाई और प्रभावित हो रही होगी। इसी सोच के साथ उन्होंने अपने घर में ही बच्चों के लिए मुफ्त क्लास शुरू कर दी।

एक कमरे के घर से शुरू हुई मुफ्त पढ़ाई

सरिता का घर छोटा था और उसमें सिर्फ एक कमरा था लेकिन परिवार ने उनके प्रयास में सहयोग किया। धीरे-धीरे बच्चे पढ़ने के लिए आने लगे। इसी दौरान उन्हें पता चला कि आसपास के कई बच्चे स्कूल छोड़ चुके हैं। इसके बाद सरिता ने ऐसे बच्चों के घर जाकर उनके परिवारों से बातचीत की।

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सरिता शर्मा की क्लास

उन्होंने बच्चों को पढ़ाई के साथ कुछ हुनर सिखाने की बात भी कही ताकि भविष्य में वे अपने पैरों पर खड़े हो सकें। बच्चों की संख्या बढ़ने पर उन्होंने वीडियो बनाकर भी बच्चों तक पढ़ाई की सामग्री पहुंचाना शुरू किया। सरिता के प्रयासों से करीब 75 प्रतिशत ड्रॉपआउट बच्चों का दोबारा स्कूल में दाखिला कराया जा सका। परिवार की स्थिति कुछ बेहतर होने के बाद उन्होंने खुद भी अपनी पढ़ाई फिर से शुरू की और अब सोशल वर्क में मास्टर्स कर रही हैं।

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कंस्ट्रक्शन साइट पर बनाया बच्चों के लिए सुरक्षित स्कूल

सरिता के प्रयासों को देखकर दूसरे समाजसेवी भी उनके साथ जुड़ने लगे। इसी पहल के तहत बावड़िया कला की एक कंस्ट्रक्शन साइट पर ‘रुद्राक्ष प्ले स्कूल’ शुरू किया गया है। यहां सरिता लेबर परिवारों के साथ दूसरे स्थानों से पलायन कर आए बच्चों को पढ़ा रही हैं। सरिता के मुताबिक निर्माण स्थलों पर काम करने वाले मजदूर परिवार लगातार एक जगह से दूसरी जगह जाते रहते हैं। ऐसे में उनके बच्चे भी उनके साथ रहते हैं और कई बार निर्माण स्थल पर ही घूमते रहते हैं। इससे उनकी पढ़ाई लगातार टूटती रहती है और बच्चों की सुरक्षा को लेकर भी खतरा बना रहता है। इसी समस्या को देखते हुए कंस्ट्रक्शन साइट पर बच्चों के लिए एक सुरक्षित जगह तैयार की गई, जहां उन्हें पढ़ाई के साथ भोजन और दूसरी गतिविधियों की सुविधा भी मिलती है। यहां बच्चों को सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक पढ़ाया जाता है और अलग-अलग गतिविधियों के जरिए उनका सीखने का स्तर बेहतर करने की कोशिश की जाती है। करीब एक साल पहले शुरू किए गए इस स्कूल में बेसिक शिक्षा देने के बाद 12 बच्चों का मेनस्ट्रीम स्कूल में दाखिला कराया जा चुका है। फिलहाल यहां करीब 60 बच्चे पढ़ रहे हैं।

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बस्ती के बच्चों की पढ़ाई में भी मदद

सरिता का प्रयास केवल कंस्ट्रक्शन साइट तक सीमित नहीं है। वह अपनी बस्ती के बच्चों को भी शाम के समय घर लौटने के बाद पढ़ाती हैं। स्कूल में बच्चों को किसी तरह की परेशानी आने पर उसे दूर कराने की कोशिश भी करती हैं। सरिता का कहना है कि उनकी छोटी सी पहल से मजदूर परिवारों के बच्चों को सुरक्षित जगह मिल रही है और वे दोबारा पढ़ाई से जुड़ पा रहे हैं। उनकी कोशिश है कि परिस्थितियां चाहे जैसी हों, बच्चों की शिक्षा बीच में न छूटे।

Sumit  Shrivastava
By Sumit Shrivastava

सुमित श्रीवास्तव एक अनुभवी मीडिया प्रोफेशनल, बिजनेस पत्रकार और शोधकर्ता हैं। मास कम्युनिकेशन में M.P...Read More

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