PU Special :शिक्षक दिवस-दिव्यांगता को हौसले में बदला, 28 साल से बच्चों का भविष्य गढ़ रहे शिवराज; कलेक्ट्रेट में भी निभाई जिम्मेदारी

पीएम श्री स्वामी विवेकानंद हाई स्कूल मंडीसीहोर के शिक्षक शिवराज सिंह पंवार की कहानी केवल सरकारी सेवा पूरी करने की कहानी नहीं, बल्कि संघर्ष, समर्पण और हौसले से परिस्थितियों को बदलने की प्रेरक मिसाल है।
शिक्षक दिवस-दिव्यांगता को हौसले में बदला, 28 साल से बच्चों का भविष्य गढ़ रहे शिवराज; कलेक्ट्रेट में भी निभाई जिम्मेदारी
गणित की कक्षा में मिशाल बने शिवराज पंवार; शिक्षक दिवस पर सलाम

सुनील  शर्मा,  सीहोर। किसी शिक्षक की पहचान सिर्फ इस बात से नहीं होती कि वह कक्षा में कितने अध्याय पूरा कराता है। असली शिक्षक वह होता है, जो अपने जीवन से विद्यार्थियों को यह सिखा दे कि मुश्किल परिस्थितियां रास्ता रोक सकती हैं, मंजिल नहीं। शिवराज सिंह पंवार इसी सोच का जीवंत उदाहरण हैं। दोनों पैरों से दिव्यांग और 60 प्रतिशत से अधिक दिव्यांगता के बावजूद उनका हौसला आज भी वैसा ही है। 56 वर्ष की उम्र में भी वे पूरे समर्पण के साथ बच्चों को गणित पढ़ा रहे हैं।

1998 में शुरू हुआ सफर आज भी उसी जुनून के साथ जारी

शिवराज सिंह पंवार की शासकीय सेवा की शुरुआत 21 अगस्त 1998 को हुई। गणित विषय से बीएससी, समाजशास्त्र और राजनीति में एमए के साथ डीएड और बीएड की योग्यता हासिल करने वाले पंवार ने अपने सेवाकाल में शिक्षा और प्रशासन दोनों क्षेत्रों में काम किया। सीखने की उनकी ललक कभी कम नहीं हुई। वर्ष 1997 से कंप्यूटर का सामान्य ज्ञान रखने वाले पंवार ने बदलती तकनीक के साथ स्वयं को भी लगातार अपडेट किया।

18 साल कलेक्ट्रेट के एनआईसी में निभाई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी

शिक्षण के साथ पंवार ने करीब 18 वर्षों तक कलेक्ट्रेट सीहोर के राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र यानी एनआईसी में भी सेवाएं दीं। प्रशासनिक कार्यों में उनकी दक्षता, जिम्मेदारी और कार्य के प्रति समर्पण ने उन्हें अधिकारियों के बीच अलग पहचान दिलाई। जिले में पदस्थ रहे कई कलेक्टरों और मंत्रियों ने उनके कार्य की सराहना की और समय-समय पर उन्हें सम्मानित भी किया। यह उपलब्धि बताती है कि उनकी प्रतिभा सिर्फ कक्षा की चारदीवारी तक सीमित नहीं रही।

दिव्यांगता शरीर की थी, हौसला कभी दिव्यांग नहीं हुआ

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जीवन ने उन्हें शारीरिक चुनौती जरूर दी, लेकिन पंवार ने कभी उसे अपनी पहचान नहीं बनने दिया। श्री पंवार बताते हैं कि दोनों पैरों से दिव्यांग होने और 60 प्रतिशत से अधिक दिव्यांगता के बावजूद उन्होंने शिक्षा, प्रशासन और सामाजिक क्षेत्र में लगातार सक्रियता बनाए रखी। उनके जीवन का सबसे बड़ा संदेश यही है कि व्यक्ति की वास्तविक क्षमता उसके शरीर से नहीं, बल्कि उसके आत्मविश्वास और कर्मठता से तय होती है।

दिव्यांगों के अधिकारों के लिए भी उठाई आवाज

सरकारी नौकरी और अध्यापन के अलावा पंवार सामाजिक सरोकारों से भी जुड़े रहे हैं। दिव्यांगों को उनके अधिकार दिलाने और भर्ती में आरक्षण तथा सुविधाओं से जुड़े विषयों पर उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। दिव्यांगों की भर्ती में 3 प्रतिशत के स्थान पर 6 प्रतिशत भारण दिलाने के प्रयासों में भी उनके योगदान का उल्लेख किया जाता है। उन्होंने अपने अनुभव को केवल व्यक्तिगत सफलता तक सीमित नहीं रखा, बल्कि दूसरों के लिए रास्ता आसान करने की कोशिश की।

शिक्षकों के हितों की आवाज बनने का भी किया काम

शिक्षक हितों से जुड़े विषयों पर भी पंवार सक्रिय रहे हैं। भर्ती नियमों, आयु सीमा और शिक्षाकर्मियों से जुड़े मामलों को लेकर उन्होंने अपनी आवाज उठाई। यही वजह है कि शिक्षा विभाग और जिले के शिक्षकों के बीच उनका व्यक्तित्व एक सहज, स्पष्टवादी और मिलनसार शिक्षक के रूप में जाना जाता है। उनके लिए नौकरी सिर्फ जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज के प्रति दायित्व रही है।

गणित के कठिन सवालों में बच्चों को दिखाते हैं आसान रास्ता

वर्तमान में पीएम श्री स्वामी विवेकानंद हाई स्कूल मंडी में माध्यमिक शिक्षक के रूप में विद्यार्थियों को गणित पढ़ा रहे पंवार की शिक्षण शैली बेहद सहज है। वे कठिन सूत्रों और सवालों को छोटे-छोटे उदाहरणों के जरिए समझाने का प्रयास करते हैं। नियमित अभ्यास और समय-समय पर टेस्ट लेना उनकी कार्यशैली का हिस्सा है। उनका प्रयास रहता है कि कोई विद्यार्थी सिर्फ इसलिए पीछे न रह जाए क्योंकि उसे गणित कठिन लगता है।

विद्यार्थियों के लिए शिक्षक से बढ़कर मार्गदर्शक हैं पंवार सर

कक्षा 9 की छात्रा उर्वशी मेवाड़ा के अनुसार पंवार सर गणित बहुत अच्छे से पढ़ाते हैं और पढ़ाई के साथ मार्गदर्शन भी करते हैं। कक्षा 9 के छात्र फैयाम का कहना है कि सर समय-समय पर टेस्ट लेकर विद्यार्थियों की तैयारी परखते हैं और आगे बढ़ने के लिए मार्गदर्शन देते हैं। कक्षा 8 के अंश सूर्यवंशी और इलेश सिलोरिया भी उनकी पढ़ाने की शैली की तारीफ करते हैं।

जिसे समझ नहीं आया, उसे दोबारा समझाना ही शिक्षक की जीत मानते हैं

कक्षा 10 की छात्रा हसीना बताती हैं कि पंवार सर समय-समय पर टेस्ट लेते हैं और यदि कोई विषय समझ में नहीं आता तो उसे दोबारा समझाते हैं। कक्षा 8 की छात्रा आरोही भी उनके पढ़ाने के तरीके को पसंद करती हैं। विद्यार्थियों की ये प्रतिक्रियाएं बताती हैं कि पंवार के लिए अच्छा परिणाम ही सब कुछ नहीं, बल्कि हर बच्चे तक विषय की समझ पहुंचाना ज्यादा महत्वपूर्ण है।

पिटिशन राइटर से लेकर शिक्षक और तकनीकी कार्य तक का अनुभव

शिवराज सिंह पंवार का जीवन अनुभवों से भरा रहा है। शासकीय सेवा से पहले वर्ष 1996-97 में उन्होंने जिला एवं सत्र न्यायालय सीहोर में पिटिशन राइटर के रूप में भी कार्य किया। इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, टीवी और रेडियो के मैकेनिक के रूप में काम करने का अनुभव भी उनके पास है। अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने के कारण उनका अनुभव और सामाजिक संपर्क भी व्यापक रहा।

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उम्र बढ़ी, लेकिन सीखने और सिखाने की ऊर्जा बरकरार

56 वर्ष की उम्र में भी पंवार के भीतर सीखने और सिखाने का जुनून कम नहीं हुआ है। लंबे सेवाकाल के बावजूद विद्यार्थियों के बीच खड़े होकर उसी ऊर्जा से गणित पढ़ाना उनके समर्पण को दर्शाता है। उनके लिए शिक्षक होना केवल एक पद नहीं, बल्कि ऐसी जिम्मेदारी है जिसमें हर दिन किसी बच्चे के भविष्य को बेहतर बनाने का अवसर मिलता है।

शिक्षक दिवस पर एक ऐसे गुरु को सलाम, जो खुद एक प्रेरणा बन गए

शिवराज सिंह पंवार की कहानी 28 वर्षों की शासकीय सेवा से कहीं आगे जाती है। यह उस व्यक्ति की कहानी है जिसने शारीरिक चुनौतियों को अपनी गति नहीं बनने दिया, प्रशासन में जिम्मेदारी निभाई, दिव्यांगों और शिक्षकों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई और आज भी बच्चों के भविष्य को गणित की कक्षा में आकार दे रहा है। शिक्षक दिवस पर उनका जीवन यही संदेश देता है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि इरादे मजबूत हों तो इंसान अपनी सीमाओं से आगे निकल सकता है। ऐसे शिक्षक को शिक्षक दिवस पर दिल से सलाम, जिसने सिर्फ बच्चों को गणित नहीं सिखाया, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी गणित संघर्ष के बीच आगे बढ़ना अपने आचरण से सिखाई।

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By Sunil Sharma

सुनील शर्मा, सीहोर जिला ब्यूरो, पीपुल्स समाचार ढाई दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। दैनिक भास्कर, पत...Read More

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