Peoples Update Special :कैंसर के इलाज के बाद भी बन सकते हैं माता-पिता, भोपाल में बढ़ रहे फर्टिलिटी प्रिजर्वेशन के मामले

प्रवीण श्रीवास्तव, भोपाल। राजधानी भोपाल में बीमारी के इलाज से पहले फर्टिलिटी प्रिजर्वेशन कराने वाले मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। डॉक्टरों का कहना है कि बीते तीन से चार साल में ऐसे मामले करीब 1.5 गुना तक बढ़े हैं। निजी सेंटरों की संख्या भी दो-तीन से बढ़कर एक दर्जन से अधिक हो गई है। वहीं सरकारी अस्पतालों में यह सुविधा अब भी शुरू होने का इंतजार कर रही है।
इलाज से पहले फर्टिलिटी प्रिजर्वेशन बना नई उम्मीद
केस-1 भोपाल के 15 साल के रोहन (परिवर्तित नाम) टेस्टीकुलर कैंसर से जूझ रहे थे। माता-पिता को आशंका थी कि बेटा संतान उत्पत्ति नहीं कर सकेगा। ऐसे में उन्होंने बेटे का स्पर्म फ्रीज कराया। अब रोहन का इलाज लगभग पूरा हो चुका है और वह ठीक हो रहा है। डॉक्टरों का कहना है कि वह भविष्य में पिता बन सकता है। केस-2: 29 साल की रोहिणी (परिवर्तित नाम) को शादी से पहले ब्लड कैंसर का पता चला। उन्होंने इलाज शुरू होने से पहले अपने एग फ्रीज कराए। अब कीमोथैरेपी सहित पूरा उपचार पूरा हो चुका है और रोहिणी पूरी तरह स्वस्थ हैं। अब वह मां बनने के लिए तैयार हैं और जल्द ही उनके घर में किलकारी गूंजेगी।
राजधानी में लगातार बढ़ रहे हैं ऐसे मामले
कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों में लंबे इलाज का असर प्रजनन क्षमता पर भी पड़ता है। ऐसे मरीजों को भविष्य में माता-पिता बनने की उम्मीद खत्म होने का डर हमेशा सताता रहता है। ऐसे में फर्टिलिटी प्रिजर्वेशन से यह डर अब खत्म हो रहा है। मरीज अपने अंडाणु, शुक्राणु या कुछ मामलों में भ्रूण को सुरक्षित रखकर भविष्य के लिए प्रजनन क्षमता का विकल्प बचा रहे हैं। राजधानी में भी अब बीमारी के इलाज से पहले फर्टिलिटी प्रिजर्वेशन के मामले बढ़ रहे हैं। चिकित्सकों का कहना है कि बीते तीन से चार साल से ऐसे मामले 1.5 गुना तक बढ़े हैं। पांच साल पहले शहर में दो या तीन सेंटर पर ही यह सुविधा थी, जो बढ़कर एक दर्जन से ज्यादा हो गई है। इधर, शहर में हमीदिया अस्पताल और एम्स में भी कई साल से फर्टिलिटी प्रिजर्वेशन सेंटर शुरू करने की कवायद चल रही है, फिलहाल यहां इस तरह के सेंटर कागजों में ही हैं। ऐसे में आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों को न चाहते हुए भी नि:संतानता का दंश झेलना पड़ता है।
अंडाणु और शुक्राणु कैसे सुरक्षित रखे जाते हैं?
महिलाओं में दवाओं की मदद से अंडाशय को उत्तेजित कर अंडाणु निकाले जाते हैं। इन्हें बेहद कम तापमान पर क्रायोप्रिजर्वेशन के जरिए सुरक्षित रखा जाता है। पुरुषों के शुक्राणु भी इसी तरह संरक्षित किए जा सकते हैं। कुछ परिस्थितियों में अंडाणु और शुक्राणु से बने भ्रूण को भी सुरक्षित रखा जाता है। बाद में बीमारी का उपचार पूरा होने के बाद जरूरत के अनुसार सहायक प्रजनन तकनीकों (टेस्ट ट्यूब तकनीक) की मदद से इनका इस्तेमाल किया जा सकता है।
इलाज शुरू होने से पहले क्यों जरूरी है यह प्रक्रिया?
महिला रोग विशेषज्ञ डॉ. नीलिमा अग्रवाल बताती हैं कि कैंसर या दूसरी गंभीर बीमारी का इलाज शुरू करने से पहले मरीज और परिवार को फर्टिलिटी प्रिजर्वेशन के विकल्प की जानकारी देना जरूरी माना जाता है। कुछ गंभीर बीमारियां खुद प्रजनन क्षमता को प्रभावित कर सकती हैं, लेकिन कई बार उपचार में इस्तेमाल होने वाली दवाएं, रेडिएशन या सर्जरी भी इसका कारण बन सकती हैं। इसलिए उपचार शुरू करने से पहले मरीज को संभावित प्रभाव और उपलब्ध विकल्पों की जानकारी देना महत्वपूर्ण है। फर्टिलिटी प्रिजर्वेशन सिर्फ कैंसर मरीजों तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रजनन अंगों की बीमारी, रक्त संबंधी गंभीर बीमारी, बोन मैरो या स्टेम सेल ट्रांसप्लांट, ऑटोइम्यून बीमारी और अन्य चिकित्सकीय कारणों में भी विशेषज्ञ मरीज की स्थिति के अनुसार यह विकल्प सुझा सकते हैं।
कितना आता है खर्च और सरकारी सेंटरों की स्थिति?
एग फ्रीजिंग की तुलना में स्पर्म फ्रीजिंग का खर्च कम होता है। स्पर्म फ्रीजिंग के लिए 10 से 20 हजार रुपये सालाना खर्च आता है। वहीं एग फ्रीजिंग में प्रोसीजर का खर्च एक से 1.5 लाख रुपये और प्रिजर्वेशन के लिए 10 से 20 हजार रुपये सालाना खर्च होता है। हमीदिया अस्पताल में वर्ष 2022 में प्रदेश के पहले सरकारी इनफर्टिलिटी सेंटर की घोषणा की गई थी, लेकिन प्रक्रिया अब भी कागजों में ही है। एम्स में भी करीब तीन साल पहले इनफर्टिलिटी क्लीनिक की घोषणा हुई थी, लेकिन फर्टिलिटी लाइसेंस अब तक नहीं मिल सका। काटजू अस्पताल में भी इसकी शुरुआत की तैयारी चल रही है, जहां फिलहाल पहले चरण की सुविधा शुरू करने की योजना है।
विशेषज्ञ बोले, जागरूकता से बढ़ रहे मामले
सीएमएचओ डॉ. मनीष शर्मा ने बताया कि प्रक्रिया चल रही है। इंस्पेक्शन हो चुका है और जल्द ही सभी सरकारी मंजूरी प्रदान कर दी जाएगी। उम्मीद है कि एक महीने में यह सुविधाएं मिलने लगेंगी। वहीं फर्टिलिटी एक्सपर्ट डॉ. मोनिका सिंह का कहना है कि पिछले कुछ सालों में बीमारी के चलते फर्टिलिटी प्रिजर्वेशन के मामले लगातार बढ़े हैं। इसमें सबसे बड़ा कारण जागरूकता है। उनके अनुसार हर महीने एक से दो ऐसे मरीज उनके पास आते हैं, जो इलाज शुरू होने से पहले अपनी फर्टिलिटी सुरक्षित रखने की इच्छा जताते हैं।












