FCRA संशोधन पर अमेरिका से क्यों उठी आवाज? सांसद ने बताया ईसाई विरोधी, क्या है पूरा विवाद

एफसीआरए कानून एनजीओ, सिविक सोसाइटी संगठनों, शैक्षणिक और धार्मिक संस्थाओं को मिलने वाले विदेशी चंदे को नियंत्रित करता है। ईसाई संगठनों ने प्रस्तावित संशोधनों के कुछ प्रावधानों को लेकर अपनी आशंकाएं गृह मंत्री अमित शाह के सामने रखी हैं। मिजोरम के प्रतिनिधिमंडल ने मांग की है कि नए प्रावधान केवल भविष्य में लागू किए जाएं और उन्हें पूर्व प्रभाव से लागू न किया जाए। विपक्ष और कई एनजीओ का आरोप है कि संशोधन से केंद्र सरकार के पास अधिक अधिकार आ सकते हैं। प्रस्तावित बदलावों में एफसीआरए रजिस्ट्रेशन के नवीनीकरण और रजिस्ट्रेशन खत्म होने पर संपत्तियों के प्रबंधन से जुड़े नए प्रावधान शामिल हैं। सरकार का कहना है कि एफसीआरए संशोधन राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने के उद्देश्य से है और इसका किसी धर्म को निशाना बनाने का इरादा नहीं है।
ईसाई संगठनों ने अमित शाह के सामने रखी आपत्ति
मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने अमित शाह से मुलाकात के बाद कहा कि उन्होंने नए एफसीआरए विधेयक को लेकर अपनी आशंकाएं गृह मंत्री के सामने रखी हैं। उन्होंने बताया कि अमित शाह ने भरोसा दिलाया है कि संशोधित कानून पूर्व प्रभाव यानी रेट्रोस्पेक्टिव तरीके से लागू नहीं होगा। लालदुहोमा के साथ मिजोरम कोहरान ह्रुआइतु समिति के अध्यक्ष जॉन रालदोसांगा और काउंसिल ऑफ चर्चेज इन मिजोरम के महासचिव लालहमंगाइहा ने भी गृह मंत्री को ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में कहा गया है कि प्रस्तावित विधेयक और उससे जुड़े नियम केवल भविष्य में लागू किए जाने चाहिए। संगठनों का कहना है कि इन्हें पुराने मामलों पर लागू करने से ईमानदारी से काम कर रहे संस्थानों के सामने अनिश्चितता पैदा होगी।
मक्का समझौते के बाद पाकिस्तान को मिला सुरक्षा कवच? भारत के एक्शन पर क्या करेंगे तुर्की और सऊदी
अमेरिकी सांसद ने कानून को बताया था ईसाई विरोधी
अमेरिकी सांसद राइली मूर ने भारत के प्रस्तावित एफसीआरए संशोधनों पर सवाल उठाते हुए इन्हें ईसाई समुदाय के खिलाफ कार्रवाई बताया। उन्होंने कहा कि यह मुद्दा भारत-अमेरिका के संबंधों के लिए गंभीर चिंता का विषय बन सकता है। नए एफसीआरए संशोधन बिल को लेकर कई ईसाई अल्पसंख्यक संगठनों ने अपनी आपत्ति दर्ज कराई है और केंद्रीय गृह मंत्री से मुलाकात कर आशंकाएं बताई हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया यानी CBCI भी अमित शाह से प्रस्तावित विधेयक और उससे जुड़े अधिसूचित नियम वापस लेने की मांग कर चुका है। CBCI ने 10 जुलाई को गृह मंत्री को ज्ञापन सौंपकर अपनी चिंताएं रखी थीं और सभी संबंधित पक्षों से व्यापक विचार-विमर्श के बाद नया मसौदा तैयार करने की मांग की थी। गुरुवार को डीएमके सांसद पी. विल्सन के नेतृत्व में जॉइंट एक्शन फोरम ऑन माइनॉरिटीज के प्रतिनिधिमंडल ने भी अमित शाह से मुलाकात की। विल्सन ने कहा कि उन्होंने गृह मंत्री से विधेयक वापस लेने या इसे संयुक्त संसदीय समिति यानी JPC के पास भेजने का आग्रह किया। इससे साफ है कि प्रस्तावित संशोधनों को लेकर सरकार के सामने विपक्ष की आपत्तियां बनी हुई हैं।
मार्च में लोकसभा में पेश हुआ था बिल
केंद्र सरकार ने 25 मार्च 2026 को लोकसभा में विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन विधेयक 2026 पेश किया था। विधेयक के कुछ प्रावधानों को लेकर विपक्ष और कई एनजीओ संगठनों ने सवाल उठाए थे और कहा था कि इससे केंद्र सरकार के पास काफी अधिक शक्तियां आ सकती हैं। यह भी आशंका जताई गई थी कि संशोधन के जरिए अल्पसंख्यकों के लिए काम करने वाले संस्थानों के खिलाफ कार्रवाई का रास्ता खुल सकता है। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया था कि प्रस्तावित बदलाव केंद्र को व्यापक अधिकार देने वाले हैं, जिसके बाद उस समय सरकार ने बिल को रोक लिया था। हालांकि, मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि मोदी सरकार मानसून सत्र में नए संशोधनों के साथ एफसीआरए 2026 बिल दोबारा ला सकती है। अब मिजोरम के मुख्यमंत्री ने 12 अगस्त को इसे संसद में पेश किए जाने की जानकारी दी है।
सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा को बताया उद्देश्य
जब एफसीआरए संशोधन बिल पहली बार बजट सत्र में आया था, तब केरल सहित देश के कई हिस्सों में ईसाई संगठनों ने इसका विरोध किया था। उस समय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा था कि विधेयक राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया था कि सरकार का किसी भी धर्म को निशाना बनाने का कोई इरादा नहीं है। केरल में चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ईसाई समुदाय को भरोसा दिलाया था कि उनकी सरकार कभी भी ईसाई समुदाय के हितों के खिलाफ काम नहीं करेगी। पीएम मोदी ने एफसीआरए में प्रस्तावित बदलावों को लेकर विपक्ष पर झूठ फैलाने का आरोप लगाया था। वहीं, मौजूदा विवाद में ईसाई संगठन लगातार मांग कर रहे हैं कि बिल को व्यापक विचार-विमर्श के बाद ही आगे बढ़ाया जाए।
रजिस्ट्रेशन खत्म होने पर संपत्तियों पर सरकार का नियंत्रण
जानकारी के मुताबिक प्रस्तावित संशोधन में संस्थाओं के एफसीआरए रजिस्ट्रेशन को समय-समय पर रिन्यू कराने का प्रावधान है। अगर कोई संस्था समय पर रिन्यूअल के लिए आवेदन नहीं करती या उसका आवेदन खारिज हो जाता है, तो उसका रजिस्ट्रेशन खत्म हो जाएगा। इसके बाद संस्था दोबारा रजिस्ट्रेशन मिलने तक विदेशी चंदा न तो ले सकेगी और न ही उसका इस्तेमाल कर सकेगी। प्रस्तावित संशोधन में रजिस्ट्रेशन रद्द होने वाली संस्थाओं की संपत्तियों के प्रबंधन को लेकर भी सरकार की शक्तियां बढ़ाने का प्रावधान है। विधेयक में नया चैप्टर III-A जोड़े जाने की बात है, जिसके तहत केंद्र सरकार एक प्राधिकरण नियुक्त करेगी। यह प्राधिकरण ऐसी संपत्तियों की देखरेख और प्रबंधन करेगा और यह तय करेगा कि उनका इस्तेमाल किस तरह किया जाए।
'मैं बाबा बागेश्वर तो नहीं हूं...' IIT दिल्ली के दीक्षांत समारोह में PM मोदी ने ऐसा क्यों कहा?
विदेशी चंदे से खरीदी संपत्ति भी प्राधिकरण के अधीन होगी
प्रस्तावित प्रावधानों के तहत विदेशी चंदे से पूरी या आंशिक रूप से खरीदी गई संपत्तियों का प्रबंधन भी इसी प्राधिकरण के पास होगा। इन संपत्तियों की देखरेख के लिए विदेशी चंदे की बची हुई राशि का इस्तेमाल भी किया जा सकेगा। अगर बाद में संस्था को एफसीआरए रजिस्ट्रेशन दोबारा मिल जाता है या उसका रिन्यूअल हो जाता है, तो बचा हुआ विदेशी चंदा संस्था को वापस कर दिया जाएगा। लेकिन तय समय के भीतर रजिस्ट्रेशन बहाल नहीं होने या संस्था बंद हो जाने की स्थिति में उसकी संपत्तियां और फंड स्थायी रूप से प्राधिकरण के पास चले जाएंगे। प्राधिकरण के पास मौजूद संपत्तियों का इस्तेमाल जनहित के कामों के लिए किया जा सकेगा और इन्हें केंद्र या राज्य सरकार के मंत्रालयों, विभागों या सरकारी एजेंसियों को भी दिया जा सकेगा। जरूरत पड़ने पर जमीन या मकान जैसी अचल संपत्तियों को बेचने का अधिकार भी प्राधिकरण के पास होगा और बिक्री से मिलने वाली राशि तथा बचा विदेशी चंदा भारत की संचित निधि में जमा किया जा सकेगा।












