वर्दी का रौब दिखाकर करता रहा उगाही:आखिर कौन है यह फर्जी डीआईजी ?

आरोपी ने पुलिस जैसी वर्दी, लग्जरी कार और आलीशान कार्यालय के दम पर अपनी झूठी पहचान बनाई थी। कारोबारी परिवार को गिरफ्तारी और बदनामी का डर दिखाकर उससे लगातार रकम वसूलता रहा। पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर पूरे नेटवर्क और आर्थिक लेनदेन की जांच शुरू कर दी है।
फर्जी अधिकारी बन करोड़ों रुपए हड़पे
पुलिस के अनुसार आरोपी मनीष कुमार लंबे समय से खुद को विभिन्न जांच एजेंसियों का वरिष्ठ अधिकारी बताकर लोगों को प्रभावित कर रहा था। उसने पुलिस जैसी वर्दी, सरकारी अंदाज की गाड़ी और प्रभावशाली पहचान तैयार कर रखी थी। झांसी में उसने ऐसा कार्यालय भी बना रखा था जिससे लोग आसानी से उसके झांसे में आ जाते थे। इसी बनावटी रुतबे के सहारे वह लोगों को धमकाकर पैसे वसूलने का काम करता था।
सर्राफा कारोबारी परिवार को बनाया निशाना
इस पूरे मामले में दतिया के प्रतिष्ठित सर्राफा कारोबारी अरविंद अग्रवाल और उनके परिवार को मुख्य रूप से निशाना बनाया गया। आरोप है कि आरोपी ने कारोबारी परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा और बाजार में उनकी साख को हथियार बनाया। कार्रवाई और गिरफ्तारी का डर दिखाकर उन्हें मानसिक दबाव में रखा।
रिटायर्ड प्रोफेसर की भूमिका भी जांच के घेरे में
पुलिस जांच में सामने आया है कि कारोबारी परिवार से परिचित एक रिटायर्ड प्रोफेसर की भूमिका भी संदिग्ध बताई जा रही है। आरोप है कि पुरानी पहचान का फायदा उठाकर आरोपी को कारोबारियों तक पहुंचाने में मदद की गई। हालांकि पूरे मामले में उनकी भूमिका की अभी जांच जारी है। पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि कथित साजिश में वह शामिल थे या नहीं।
जेल भेजने की धमकी देकर वसूले रुपये
अक्टूबर 2024 में आरोपी कथित तौर पर काली वर्दी पहनकर कारोबारी की दुकान पर पहुंचा और खुद को एंटी करप्शन एंड क्राइम कंट्रोल फोर्स का डीआईजी बताया। उसने एक कथित एफआईआर दिखाकर जेल भेजने की धमकी दी। इसके बाद मामला निपटाने और कार्रवाई रोकने के नाम पर पैसे मांगे जाने लगे। डर की वजह से कारोबारी परिवार अलग-अलग किश्तों में करीब 80 लाख रुपये देता रहा।
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परिवार की दूसरी पीढ़ी को भी नहीं छोड़ा
जब पहली बार बड़ी रकम हासिल हो गई तो आरोपियों ने कारोबारी परिवार के अन्य सदस्यों को निशाना बनाया। इस बार खुद को एंटी करप्शन ब्यूरो का इंस्पेक्टर बताकर दिवंगत कारोबारी के बेटे प्रियांश सिंघल को डराया गया। उन पर पुराने लेनदेन का हवाला देकर कार्रवाई की धमकी दी गई। बताया जा रहा है कि जून से अगस्त 2025 के बीच उनसे भी करीब 29 लाख 50 हजार रुपये वसूले गए।
शिकायत के बाद खुली फर्जीवाड़े की पोल
पूरे मामले का खुलासा तब हुआ जब प्रियांश सिंघल ने कथित अधिकारी की शिकायत सीधे संबंधित व्यक्ति से की। जवाब में आरोपी को पहचानने से इनकार किए जाने पर उन्हें शक हुआ। उन्होंने झांसी जाकर पड़ताल की तो पता चला कि संबंधित विभाग में ऐसा कोई अधिकारी मौजूद ही नहीं है। शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने जाल बिछाया और 10 जून को आरोपी को पैसे लेने पहुंचते ही गिरफ्तार कर लिया। अब उसके बैंक खातों, संपत्तियों और पूरे नेटवर्क की गहन जांच की जा रही है।












