दिवाली स्पेशल: उदास न रहे कोई बच्चा, दीक्षा दुबे बना रही हैं त्योहार को खास; कैंसर पहाड़ी से बंजारों की बस्ती तक बांट रही खुशियां

सागर यादव, ग्वालियर। शहर में एक तरफ घरों और बाजारों में दीपावली की तैयारियां जोरों पर हैं। कहीं रंग-बिरंगी लाइटें सज रही हैं, तो कहीं मिठाइयों और नए कपड़ों की खरीदारी हो रही है। लेकिन इन चमकती रोशनियों के बीच कुछ ऐसे बच्चे और परिवार भी हैं, जिनके लिए त्योहार का मतलब सिर्फ नए कपड़े, मिठाई और पटाखे नहीं, बल्कि किसी अपने के साथ होने का एहसास है। ऐसे ही बच्चों की दिवाली रोशन करने के लिए शहर के समाजसेवी आगे आ रहे हैं।
शहर की बेटी दीक्षा दुबे के लिए त्योहार पर बच्चों के साथ समय बिताना ही सबसे बड़ी खुशी है। उनका कहना है कि बच्चों के साथ दीये जलाना, मिठाई बांटना और उनकी मुस्कान देखना ही असली त्योहार है। इस बार उनकी कोशिश सिर्फ दिवाली तक सीमित नहीं रहेगी। त्योहार के बाद भी बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य और खुशियों के लिए लगातार काम करने की योजना है। उनका सपना है कि कोई भी बच्चा दिवाली पर उदास न रहे।
दीक्षा कैंसर पहाड़ी, बिक्की फैक्ट्री, रेलवे क्रॉसिंग के आसपास और बंजारों की बस्तियों में जाकर बच्चों और जरूरतमंद परिवारों के साथ दिवाली मनाती हैं। कई बच्चे ऐसे हैं, जिन्हें उनके आने का इंतजार रहता है। वे जानते हैं कि दिवाली या होली पर दीक्षा जरूर आएंगी।
दीक्षा से बातचीत
बच्चों के साथ दिवाली मनाने का विचार कहां से आया? मेरे दादाजी हमेशा कहा करते थे कि बेटा, हमेशा ऐसे लोगों की मदद करो, जिन्हें मदद की जरूरत है। उन्हीं की प्रेरणा से यह विचार आया।
यह पहला आयोजन है या हर साल करती हैं? हर वर्ष ऐसे कार्यक्रम किए जाते हैं। शहर में कई ऐसी बस्तियां हैं, जहां जरूरतमंदों के लिए कुछ किया जा सकता है। इस वर्ष कुछ नया सोचा है। त्योहारों के बाद भी मदद करने की योजना है, क्योंकि तब भी इन्हें मदद की जरूरत होती है।
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कितने बच्चों की भागीदारी तय है और क्या उपहार देंगी?
बच्चों की संख्या हमेशा उम्मीद से ज्यादा हो जाती है। हम 80-90 बच्चों के लिए तैयारी करके जाते हैं, तो करीब 150 बच्चे पहुंच जाते हैं। इस बार बच्चों को पढ़ाई से संबंधित सामग्री, कपड़े और गर्म कपड़े बांटने की योजना है।




















