CJP Protest लाठीचार्ज पर दिल्ली पुलिस का जवाब, ‘कील वाली लाठी’ के आरोप से किया इनकार

नई दिल्ली। जंतर-मंतर पर CJP Protest के दौरान हुए पुलिस एक्शन को लेकर दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में जवाब दाखिल किया है। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर जरूरत से ज्यादा बल इस्तेमाल करने के आरोपों को खारिज किया है। डीसीपी सचिन शर्मा की ओर से दाखिल हलफनामे में कहा गया कि प्रदर्शन की शुरुआत शांतिपूर्ण थी, लेकिन बाद में भीड़ के एक हिस्से ने बैरिकेड तोड़कर संसद की ओर बढ़ने की कोशिश की। पुलिस के मुताबिक, करीब 30 हजार लोग प्रदर्शन में मौजूद थे और उन्हें संभालने के लिए लगभग 5 हजार पुलिसकर्मी तैनात किए गए थे। स्थिति बिगड़ने पर चरणबद्ध तरीके से बल का इस्तेमाल किया गया।
30 हजार की भीड़, 5 हजार पुलिसकर्मी तैनात
दिल्ली पुलिस के अनुसार प्रदर्शन स्थल पर करीब 30 हजार लोग मौजूद थे और भीड़ लगभग तीन किलोमीटर के इलाके में फैली हुई थी। इतनी बड़ी संख्या को संभालने के लिए करीब 5 हजार जवान लगाए गए थे। पुलिस का कहना है कि भीड़ के एक हिस्से ने कई स्तरों पर लगाए गए बैरिकेड हटाने की कोशिश की। इसके बाद हालात तनावपूर्ण हो गए और पुलिस को भीड़ को रोकने के लिए कार्रवाई करनी पड़ी।
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पुलिस ने ‘कील वाली लाठी’ पर दी सफाई
प्रदर्शन के दौरान कील लगी लाठी के कथित इस्तेमाल को लेकर भी पुलिस ने अपना जवाब दिया है। पुलिस ने कहा कि वीडियो में दिखाई दे रहा डंडा किसी पुलिसकर्मी के हाथ में नहीं था। उसके मुताबिक, वह एक प्रदर्शनकारी के पास था और उस पर राष्ट्रीय ध्वज लगा हुआ था। पुलिस ने यह भी कहा कि भीड़ को नियंत्रित करने के लिए लाठी का इस्तेमाल नियमों के तहत किया गया था।
240 पुलिसकर्मी भी हुए घायल
हलफनामे में दिल्ली पुलिस ने बताया कि प्रदर्शन के दौरान 240 से अधिक पुलिसकर्मी और वर्दीधारी अधिकारी घायल हुए। करीब 200 आम लोगों और प्रदर्शनकारियों के चोटिल होने की भी जानकारी दी गई है। पुलिस का दावा है कि प्रदर्शन में कुछ असामाजिक तत्व और हिस्ट्रीशीटर भी शामिल हो गए थे। इन लोगों की मौजूदगी से हालात और बिगड़ने का आरोप लगाया गया है।
संसद मार्च की नहीं मिली थी अनुमति
पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि प्रदर्शनकारियों को संसद तक मार्च करने की अनुमति नहीं दी गई थी। इसके बावजूद भीड़ ने आगे बढ़ने की कोशिश की। पुलिस ने इसे गैरकानूनी जमावड़ा बताते हुए कहा कि बैरिकेड तोड़ने और आगे बढ़ने के प्रयास के बाद बल प्रयोग जरूरी हो गया था। पुलिस ने सोशल मीडिया पोस्ट, तस्वीरों और अधूरे वीडियो के आधार पर कार्रवाई को गलत ठहराने पर भी सवाल उठाए।
2,873 लोगों के आपराधिक रिकॉर्ड का जिक्र
हलफनामे में पुलिस ने करीब 2,873 लोगों के खिलाफ दर्ज गंभीर आपराधिक मामलों का भी उल्लेख किया है। इनमें हत्या, हत्या की कोशिश, डकैती, दुष्कर्म और POCSO जैसे मामले शामिल बताए गए हैं। पुलिस के अनुसार, इन लोगों की भूमिका की जांच SIT करेगी। साथ ही प्रदर्शन में शामिल शांतिपूर्ण छात्रों और गंभीर आपराधिक मामलों वाले लोगों के बीच अंतर करने की बात कही गई है।
चेहरे की पहचान पर भी पुलिस का जवाब
प्रदर्शन के दौरान फेस रिकग्निशन तकनीक के इस्तेमाल पर पुलिस ने कहा कि इसका उद्देश्य सामान्य प्रदर्शनकारियों की निगरानी करना नहीं था। पुलिस के मुताबिक, तकनीक का इस्तेमाल गंभीर अपराधों में पहले से रिकॉर्ड रखने वाले संदिग्ध लोगों की पहचान में मदद के लिए किया गया। किसी व्यक्ति के खिलाफ सिर्फ तकनीक से मिली पहचान के आधार पर कार्रवाई नहीं की गई, बल्कि फील्ड स्तर पर भी पुष्टि की गई।
SC ने छात्रों के अधिकार पर दिया जोर
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि छात्रों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने संकेत दिया कि गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड नहीं रखने वाले छात्रों के खिलाफ प्रदर्शन से जुड़ी FIR पर राहत देने के लिए अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल किया जा सकता है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी कहा कि हत्या, दुष्कर्म और POCSO जैसे गंभीर मामलों को छोड़कर अन्य मामलों पर अलग से विचार किया जा सकता है।











