ईरान संकट के बीच चीन ने पलटा खेल!जब दुनिया में मची तेल की मारामारी, शी जिनपिंग ने दिखा दी अपनी ताकत

दुनिया में तेल की कीमतें बढ़ेंगी या घटेंगी, यह फैसला पहले ज्यादातर मध्य पूर्व के देशों के हाथ में माना जाता था। युद्ध, प्रतिबंध, ओपेक के फैसले और राजनीतिक तनाव का सीधा असर तेल बाजार पर पड़ता था। लेकिन हाल ही में ईरान से जुड़े तेल संकट ने एक नई तस्वीर दिखा दी। इस बार सबसे ज्यादा चर्चा उस देश की हो रही है जो किसी भी समझौते की मेज पर मौजूद नहीं था। वह देश है चीन।
चीन कैसे बना सबसे आयातक देश
आज चीन सिर्फ दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक ही नहीं है, बल्कि उसकी ऊर्जा जरूरतें भी इतनी बड़ी हैं कि वह वैश्विक बाजार की दिशा बदल सकता है। यही वजह है कि जब अमेरिका और ईरान होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा खोलने और तेल सप्लाई सामान्य करने में जुटे हैं, तब विशेषज्ञों की नजर चीन पर टिकी हुई है।
सस्ते तेल का फायदा उठाकर चीन ने भर लिए भंडार
पिछले कई सालों से चीन रूस और ईरान से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीद रहा था। जब बाकी देश रोजमर्रा की जरूरतों के हिसाब से तेल खरीद रहे थे, तब चीन भविष्य की तैयारी में जुटा था। अनुमान है कि उसके पास रणनीतिक और व्यावसायिक भंडारों में एक अरब बैरल से भी ज्यादा कच्चा तेल जमा है।
संकट आया तो चीन को नहीं करनी पड़ी भागदौड़
जब वैश्विक स्तर पर तेल की सप्लाई प्रभावित हुई और कई देश खरीदारी बढ़ाने लगे, तब चीन बिल्कुल शांत दिखाई दिया। वजह साफ थी, उसके पास पहले से ही इतना तेल जमा था कि उसे बाजार से अतिरिक्त खरीदारी करने की जरूरत ही नहीं पड़ी। चीन की रिफाइनरियों ने अपने भंडार से तेल निकालकर जरूरतें पूरी कर लीं।
चीन की कम खरीदारी से दुनिया को मिली राहत
विश्लेषकों के मुताबिक संकट के दौरान चीन ने कच्चे तेल का आयात करीब 30 लाख बैरल प्रतिदिन तक कम कर दिया। यह इतनी बड़ी मात्रा है कि इसका असर पूरी दुनिया के तेल बाजार पर पड़ सकता है। अगर चीन भी बाकी देशों की तरह बड़े पैमाने पर खरीदारी करता, तो तेल की कीमतें और तेजी से बढ़ सकती थीं। लेकिन उसकी कम मांग ने बाजार को राहत दी।
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इलेक्ट्रिक गाड़ियों ने भी बदली तस्वीर
चीन सिर्फ तेल के भंडार पर निर्भर नहीं है। वहां इलेक्ट्रिक वाहनों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। आज चीन में बिकने वाली लगभग आधी नई कारें इलेक्ट्रिक या हाइब्रिड हैं। इससे पेट्रोल और डीजल की मांग लगातार घट रही है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार पिछले साल चीन की इलेक्ट्रिक गाड़ियों ने करीब 10 लाख बैरल प्रतिदिन तेल की मांग कम कर दी।
रिफाइनरियों ने भी कम किया उत्पादन
चीन ने केवल तेल खरीदना ही कम नहीं किया, बल्कि उसने ईंधन निर्यात कोटा भी सीमित कर दिया। इसके अलावा कई रिफाइनरियों ने अपनी प्रोसेसिंग दर भी घटा दी। इसका नतीजा यह हुआ कि देश को अतिरिक्त तेल खरीदने की जरूरत नहीं पड़ी और वैश्विक बाजार पर दबाव कम हो गया।
चीन की रणनीति ने बदल दिया पूरा खेल
जहां बाकी देश संकट के दौरान तेल के लिए होड़ मचा रहे थे, वहीं चीन ने अलग रणनीति अपनाई। उसने बाजार में आक्रामक खरीदारी करने के बजाय पीछे हटकर अपने भंडार का इस्तेमाल किया। इस कदम ने तेल बाजार को स्थिर रखने में अहम भूमिका निभाई। भारत समेत कई देशों को इसका फायदा मिला क्योंकि तेल की कीमतों में बहुत ज्यादा उछाल नहीं आया। लेकिन चीन हमेशा अपने भंडार के भरोसे नहीं रह सकता था, इसलिए जिन तेल भंडारों का इस्तेमाल संकट के दौरान किया गया है, उन्हें किसी न किसी समय फिर से भरना पड़ेगा। अगर आने वाले समय में तेल की कीमतें नीचे आती हैं तो चीन दोबारा बड़े खरीदार के रूप में बाजार में लौट सकता है।
होर्मुज खुला तो क्या होगा?
अगर होर्मुज स्ट्रेट पूरी तरह सामान्य हो जाता है और मध्य पूर्व के देशों से तेल की सप्लाई पहले जैसी हो जाती है, तो बाजार में तेल की उपलब्धता बढ़ सकती है। इससे कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। चीन बड़े पैमाने पर दोबारा तेल खरीदना शुरू करता है तो बाजार में आने वाला अतिरिक्त तेल आसानी से खप जाएगा। लेकिन अगर चीन ने खरीदारी सीमित रखी, तो तेल की कीमतों में गिरावट भी देखने को मिल सकती है।
भारत के लिए क्या है सबक?
भारत के लिए यह स्थिति राहत और सीख दोनों लेकर आई है। चीन की कम खरीदारी के कारण तेल की कीमतों पर दबाव कम रहा, जिसका फायदा भारत को भी मिला। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को भी अपने रणनीतिक तेल भंडार बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए। जिन देशों के पास कई महीनों का तेल भंडार होता है, वे वैश्विक संकट के समय ज्यादा मजबूत स्थिति में रहते हैं।
समय के साथ बदले फैसले
एक समय था जब तेल बाजार की दिशा केवल मध्य पूर्व के देश तय करते थे। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। चीन ने अपने विशाल भंडार, कम खरीदारी और इलेक्ट्रिक वाहनों के दम पर साबित कर दिया है कि वह वैश्विक ऊर्जा बाजार का नया किंगमेकर बन चुका है। आने वाले दिनों में तेल की कीमतें किस दिशा में जाएंगी, इस पर दुनिया की नजर चीन के अगले कदम पर रहेगी।











