चीन के डागु ग्लेशियर पर वैज्ञानिकों का प्रयोग सफल, आर्टिफीशियल फैब्रिक से बर्फ पिघलने की रफ्तार 15% तक घटी

बीजिंग। चीन के एक ग्लेशियर पर किए गए वैज्ञानिक प्रयोग से बर्फ पिघलने की रफ्तार कम करने का नया तरीका सामने आया है। एक अध्ययन के मुताबिक, विशेष प्रकार के आर्टिफीशियल फैब्रिक की मदद से चीन के डागु ग्लेशियर के एक हिस्से में सालाना बर्फ पिघलने की दर को 15% तक घटाने में सफलता मिली। इस प्रयोग में वैज्ञानिकों ने ग्लेशियर के लगभग 500 वर्ग मीटर क्षेत्र को नॉन-वोवन जियोटेक्सटाइल नामक कृत्रिम सामग्री से ढका और वहां होने वाले बदलावों का अध्ययन किया। यह शोध 'रिमोट सेंसिंग' जर्नल में प्रकाशित हुआ है। इसका शीर्षक 'पूर्वी छिंगहाई-तिब्बती पठार पर डागु ग्लेशियर में बर्फ पिघलने को कम करने के लिए कृत्रिम आवरण का उपयोग' (Applying Artificial Cover to Reduce Melting in Dagu Glacier in the Eastern Qinghai-Tibetan Plateau) है। अध्ययन में पाया गया कि कपड़े से ढके हिस्से में आसपास के खुले क्षेत्र की तुलना में बर्फ का नुकसान कम हुआ। हालांकि, समय बीतने के साथ इस तकनीक का प्रभाव घटता गया।
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सूर्य की रोशनी को परावर्तित करने की क्षमता में आई कमी
शोधकर्ताओं के आंकड़ों के अनुसार, प्रयोग के शुरुआती दो महीनों में बर्फ पिघलने की दर में 27% की कमी दर्ज की गई। इसके बाद अगले दो महीनों में यह प्रभाव घटकर 8% रह गया। वैज्ञानिकों ने इसकी एक प्रमुख वजह कपड़े की सूर्य की रोशनी को परावर्तित करने की क्षमता में आई कमी को बताया। अध्ययन में यह भी स्पष्ट किया गया कि अधिक खर्च और दुर्गम ग्लेशियर क्षेत्रों तक पहुंचने में आने वाली मुश्किलों के कारण इस तकनीक को पूरे छिंगहाई-तिब्बती पठार पर बड़े स्तर पर लागू करना आसान नहीं है।
डागु ग्लेशियर के 500 वर्ग मीटर हिस्से पर बिछाया था कृत्रिम कपड़ा
इस प्रयोग के लिए शोधकर्ताओं ने 5 अगस्त 2020 को डागु ग्लेशियर नंबर 17 के मुख्य प्रवाह मार्ग (Flowline) पर विशेष कपड़ा बिछाया। यह स्थान ग्लेशियर के अंतिम छोर (Terminus) से लगभग 50 मीटर की दूरी पर था। इसके तहत करीब 500 वर्ग मीटर क्षेत्र को कवर किया गया, जो पूरे ग्लेशियर के कुल क्षेत्रफल का लगभग 1% था। वैज्ञानिकों ने सिंथेटिक फाइबर से तैयार नॉन-वोवन जियोटेक्सटाइल का चयन किया। इसके पीछे पहले किए गए शोधों के नतीजे थे, जिनमें इस सामग्री की अच्छी Insulation (गर्मी रोकने की) क्षमता सामने आई थी। माना गया कि यह आवरण बाहरी ताप के प्रभाव को कम करके ग्लेशियर की बर्फ को तेजी से पिघलने से बचाने में मदद कर सकता है।
कपड़े को पहुंचाना भी चुनौती पूर्ण था
इस सामग्री को प्रयोग स्थल तक पहुंचाना भी एक चुनौतीपूर्ण काम था। शोधकर्ताओं ने कपड़े को गोंडोला यानी केबल कार की सहायता से लगभग 4,800 मीटर की ऊंचाई तक पहुंचाया। इसके बाद कर्मचारियों ने इसे वहां से उठाकर उस स्थान तक पहुंचाया, जहां ग्लेशियर पर इसका इस्तेमाल किया जाना था। कपड़े के अलग-अलग रोल को आपस में जोड़कर पूरे निर्धारित हिस्से को ढका गया। तेज हवा या अन्य परिस्थितियों में आवरण अपनी जगह से न हटे, इसके लिए रस्सियों और पत्थरों से भरी बोरियों का इस्तेमाल किया गया। प्रयोग के प्रभाव का आकलन करने के लिए वैज्ञानिकों ने फील्ड मेजरमेंट, टेरेस्ट्रियल लेजर स्कैनिंग और ड्रोन सर्वे जैसी तकनीकों का सहारा लिया। इसके जरिए कपड़े से ढकी बर्फ और आसपास मौजूद बिना ढकी बर्फ के बीच होने वाले बदलावों की तुलना की गई।
शुरुआती दो महीनों में बर्फ पिघलने की दर 27% तक कम हुई
प्रयोग शुरू होने के करीब दो महीने बाद ही कपड़े से ढके और खुले ग्लेशियर हिस्सों के बीच स्पष्ट अंतर दिखाई देने लगा। 17 अक्टूबर 2020 तक किए गए माप में पाया गया कि ढका हुआ हिस्सा आसपास की खुली सतह की तुलना में औसतन 0.46 मीटर अधिक ऊंचा था। वैज्ञानिकों के मुताबिक, बिना किसी आवरण वाली बर्फ प्रतिदिन औसतन 1.9 सेंटीमीटर की दर से पिघल रही थी। वहीं, जियोटेक्सटाइल से ढके हिस्से में बर्फ पिघलने की रफ्तार घटकर 1.2 सेंटीमीटर प्रतिदिन रह गई। इन आंकड़ों के आधार पर शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि शुरुआती निगरानी अवधि में कृत्रिम कपड़े ने बर्फ पिघलने की दर को 27% तक कम कर दिया। इस दौरान करीब 178 क्यूबिक मीटर बर्फ को पिघलने से बचाया जा सका।
एक साल में ग्लेशियर की बर्फ पिघलने की दर में 15% की कमी
शोधकर्ताओं ने अगले साल भी इस प्रयोग की निगरानी जारी रखी। अक्टूबर 2020 से अक्टूबर 2021 के बीच जुटाए गए आंकड़ों से पता चला कि जियोटेक्सटाइल का आवरण लंबे समय तक बर्फ पिघलने की प्रक्रिया को धीमा करने में मददगार रहा। हालांकि, शुरुआती महीनों के मुकाबले इसकी प्रभावशीलता कम हो गई थी।
लंबे समय तक प्रभाव बनाए रखना वैज्ञानिकों के लिए चुनौती
हालांकि, प्रयोग के नतीजे उत्साहजनक रहे, लेकिन शोधकर्ताओं ने इस तकनीक की कुछ सीमाओं की ओर भी ध्यान दिलाया। समय के साथ कपड़े की सूर्य की रोशनी परावर्तित करने की क्षमता कम होने से उसका प्रभाव भी घटने लगा। इसके अलावा, ग्लेशियर की अधिक ऊंचाई, कठिन भौगोलिक परिस्थितियां, परिवहन की परेशानी और जियोटेक्सटाइल लगाने की लागत इसके बड़े पैमाने पर इस्तेमाल में बाधा बन सकती हैं।




















