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रिसर्च में बड़ा खुलासा: चेरनोबिल के न्यूक्लियर फ्यूल कण 40 साल बाद भी वैसे ही, साइंटिस्ट हैरान

यूक्रेन से लिए गए 8 से 50 माइक्रोमीटर के 6 हॉट पार्टिकल्स की स्टडी - लाइबनिज यूनिवर्सिटी और HZDR ने की जांच।उनके नतीजों से यह समझने में मदद मिलती है कि ये बचे हुए टुकड़े रेडियोएक्टिव पदार्थों को कैसे बनाए रखते हैं।
रिसर्च में बड़ा खुलासा: चेरनोबिल के न्यूक्लियर फ्यूल कण 40 साल बाद भी वैसे ही, साइंटिस्ट हैरान
चेरनोबिल न्यूक्लियर प्लांट

कीव। चेरनोबिल रिएक्टर में हुए धमाकों से आसपास के इलाके में रेडियोएक्टिव मलबा फैलने के चालीस साल बाद भी कुछ बहुत छोटे टुकड़ों में अपने असली न्यूक्लियर फ्यूल का क्रिस्टल स्ट्रक्चर अभी भी बना हुआ है। यूक्रेन से लिए गए छह कणों की एक स्टडी में पाया गया कि यह मटीरियल रिसर्चर की उम्मीद से कहीं ज्यादा केमिकल रूप से स्थिर था। जर्मनी की लाइबनिज यूनिवर्सिटी हनोवर और हेल्महोल्ट्ज-जेंट्रम ड्रेसडेन-रोसेंडॉर्फ (HZDR) के वैज्ञानिकों ने फ्रांस के ग्रेनोबल में सिंक्रोट्रॉन एक्स-रे डिफ्रैक्शन का इस्तेमाल करके इन टुकड़ों की जांच की। उनके नतीजों से यह समझने में मदद मिलती है कि ये बचे हुए टुकड़े रेडियोएक्टिव पदार्थों को कैसे बनाए रखते हैं। हालांकि इस छोटे से सैंपल के आधार पर पूरे दूषित इलाके की स्थिति के बारे में पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता।

तबाही के बहुत छोटे अवशेष रिसर्च में बताए गए

रेडियोएक्टिव हॉट पार्टिकल्स का साइज सिर्फ 8 से 50 माइक्रोमीटर है। अपने छोटे साइज के बावजूद 1986 की दुर्घटना के चार दशक बाद भी ये बहुत ज्यादा रेडियोएक्टिव बने हुए हैं।शोधकर्ताओं ने तीन व्यापक श्रेणियों में अंतर किया। कुछ कण रासायनिक और भौतिक रूप से रिएक्टर के परमाणु ईंधन, यूरेनियम डाइऑक्साइड के समान ही रहते हैं। अन्य कण आंशिक या पूर्ण रूप से जिरकोनियम में लिपटे होते हैं या उस धातु के साथ जुड़े होते हैं जो मूल रूप से ईंधन को घेरे हुए थी।

कैसे बने यह छोटे कण

ये संयुक्त कण तब बने जब रिएक्टर के अत्यधिक तापमान ने ईंधन को पिघला दिया और उसे उसकी सुरक्षात्मक जिरकोनियम परत से जोड़ दिया। तीसरी कैटेगरी रिएक्टर के ग्रेफाइट मॉडरेटर के जलने से उत्पन्न हुई। मॉडरेटर चेन रिएक्शन को बनाए रखने के लिए न्यूट्रॉन की गति को धीमा करता है। लेकिन, आपदा के दौरान इसकी आग दस दिनों तक जलती रही। ईंधन ऑक्सीडाइज होकर यूरेनियम कंपाउंड्स में बदल गया, जिसमें ट्राइयूरेनियम ऑक्टोक्साइड भी शामिल है। यह मैकेनिकली अनस्टेबल मटीरियल आसानी से सूक्ष्म कण बनाता है जिन्हें हवा उड़ा ले जा सकती है, जिससे सांस लेने का खतरा पैदा होता है।

एक्स-रे से ईंधन की स्थायी संरचनाएं सामने आईं

इन टुकड़ों के अलग-अलग दरों पर अपक्षयित होने के कारणों को समझने के लिए इनकी इंटरनल स्ट्रक्चर की जांच करना जरूरी है। हैनोवर के रिसर्चर्स ने यूक्रेनी मिट्टी के सैंपल से कणों को अलग किया और उन्हें टंगस्टन इलेक्ट्रोड से जोड़ा। रेडियोधर्मी सैंपल को ग्रेनोबल ले जाने के लिए कई लेयर से सुरक्षित किया गया था। रॉसेंडॉर्फ बीमलाइन पर HZDR के क्रिस्टलोग्राफर डॉ. क्रिस्टोफ हेनिग और उनके साथियों ने एक फोकस्ड एक्स-रे बीम के अंदर पार्टिकल्स को घुमाया। हेनिग ने कहा- हमने पार्टिकल्स को 100 माइक्रोमीटर (जो लगभग इंसानी बाल की मोटाई के बराबर है) तक फोकस की गई एक्स-रे बीम में पूरी तरह से घुमाया। सभी रिफ्लेक्शन को अच्छी तरह से कैप्चर करने के लिए हमने हर पार्टिकल को अलग-अलग एंगल से मापा। सबसे जरूरी बात यह है कि जिन पार्टिकल्स की जांच की गई, उनमें न्यूक्लियर फ्यूल का क्रिस्टल स्ट्रक्चर काफी हद तक वैसा ही बना रहा।

Puneet Pandey
By Puneet Pandey

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