चेक बाउंस मामले में कोर्ट का आदेश:ठेकेदार और कंस्ट्रक्शन कंपनी को देना होगा एक लाख रुपए
इंदौर की फौजदारी अदालत ने चेक बाउंस के एक मामले में कंस्ट्रक्शन कंपनी और उसके ठेकेदार को बड़ा झटका देते हुए महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। अदालत ने 10 लाख रुपए के अनादरित चेक मामले में सुनवाई के दौरान ही आरोपी पक्ष को परिवादी को एक लाख रुपए अंतरिम प्रतिकर के रूप में देने के निर्देश दिए हैं।
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दोनों चेक बाउंस
मामला ए.पी. कंस्ट्रक्शन कंपनी और उसके संचालक व ठेकेदार दिलीप पंवार से जुड़ा है। परिवादी सुमत कुमार जैन और अजित कुमार जैन का आरोप था कि आरोपी पक्ष ने उनसे लेन-देन के बाद कुल 10 लाख रुपए का भुगतान नहीं किया। भुगतान के लिए आरोपी की ओर से चेक दिए गए थे, लेकिन बैंक में प्रस्तुत करने पर दोनों चेक बाउंस हो गए। इसके बाद परिवादी पक्ष ने धारा 138 निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट के तहत अदालत में परिवाद प्रस्तुत किया। मामले की सुनवाई इंदौर की फौजदारी अदालत में चल रही है। सुनवाई के दौरान परिवादी पक्ष ने अदालत से मांग की थी कि ट्रायल लंबा चलने की स्थिति में उन्हें अंतरिम राहत दी जाए।
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एक लाख रुपए देने के आदेश
मामले पर सुनवाई करते हुए अदालत ने माना कि प्रथम दृष्टया रिकॉर्ड पर उपलब्ध दस्तावेजों और तथ्यों के आधार पर परिवादी को अंतरिम प्रतिकर दिया जाना उचित है। अदालत ने चेक राशि के 10 प्रतिशत हिस्से के रूप में कुल एक लाख रुपए देने के आदेश दिए। अदालत ने निर्देश दिए कि आरोपी दिलीप पंवार और उसकी ए.पी. कंस्ट्रक्शन कंपनी दोनों परिवादियों को 50-50 हजार रुपए की राशि 60 दिनों के भीतर अदा करें।
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अदालत ने दोनों पक्षों के हितों का संतुलन -
कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि यदि आरोपी तय समय सीमा में राशि जमा नहीं करते हैं, तो यह रकम भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत जुर्माने की राशि की तरह वसूली जाएगी। यानी आदेश की अवहेलना होने पर कानूनी रूप से सख्त कार्रवाई भी की जा सकेगी। सुनवाई के दौरान आरोपी पक्ष की ओर से कई तर्क रखे गए और अंतरिम प्रतिकर दिए जाने का विरोध किया गया। हालांकि अदालत ने कहा कि कानून का उद्देश्य सिर्फ ट्रायल चलाना नहीं, बल्कि पीड़ित पक्ष के हितों की भी रक्षा करना है। इसी आधार पर अदालत ने दोनों पक्षों के हितों का संतुलन बनाते हुए 10 प्रतिशत अंतरिम प्रतिकर देना उचित माना।
कानूनी जानकारों के अनुसार, धारा 143-ए निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट के तहत अदालत को यह अधिकार है कि चेक बाउंस मामलों में ट्रायल लंबित रहने के दौरान भी परिवादी को अंतरिम राहत दिलाई जा सके। ऐसे मामलों में अदालत चेक राशि का एक निश्चित हिस्सा अंतरिम प्रतिकर के रूप में देने का आदेश दे सकती है।












