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CBSE की थ्री लैंग्वेज पॉलिसी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त:नोटिस जारी कर दो हफ्ते में मांगा जवाब, 22 जुलाई को होगी अगली सुनवाई

कक्षा 9 के छात्रों के लिए लागू की गई CBSE की थ्री लैंग्वेज पॉलिसी अब सुप्रीम कोर्ट की समीक्षा के दायरे में आ गई है। इस नीति से जुड़े सर्कुलरों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने CBSE को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने बोर्ड से दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा है और अगली सुनवाई 22 जुलाई को तय की है।
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नोटिस जारी कर दो हफ्ते में मांगा जवाब, 22 जुलाई को होगी अगली सुनवाई
CBSE की थ्री लैंग्वेज पॉलिसी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकीलों ने नई भाषा नीति के क्रियान्वयन पर कई सवाल उठाए। अदालत के सामने शिक्षकों की कमी, पाठ्यपुस्तकों की उपलब्धता और छात्रों की भाषा चयन की स्वतंत्रता जैसे मुद्दे रखे गए। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने नीति पर कोई रोक नहीं लगाई है, लेकिन CBSE से विस्तृत जवाब तलब किया है।

सुप्रीम कोर्ट ने CBSE को जारी किया नोटिस

कक्षा 9 के छात्रों के लिए जारी किए गए थ्री लैंग्वेज पॉलिसी से जुड़े सर्कुलरों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए CBSE को नोटिस जारी करते हुए दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामले की अगली सुनवाई 22 जुलाई को होगी, जहां बोर्ड का पक्ष भी सुना जाएगा।

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नीति लागू करने की तैयारी पर उठे सवाल

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि फिलहाल देश में इस नीति को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए पर्याप्त संसाधन मौजूद नहीं हैं। उन्होंने बताया कि 22 निर्धारित भारतीय भाषाओं में से केवल तीन भाषाओं की किताबें उपलब्ध हैं। ज्यादातर स्कूलों में संबंधित भाषाओं के शिक्षक भी नहीं हैं, जिससे छात्रों के सामने व्यावहारिक कठिनाइयां पैदा हो सकती हैं।

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छात्रों की भाषा चयन की स्वतंत्रता पर बहस

वरिष्ठ वकील आनंद ग्रोवर ने अदालत में दलील दी कि CBSE के सर्कुलर छात्रों को अपनी पसंद की भाषा चुनने का पूरा अवसर नहीं देते। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि कोई छात्र संस्कृत की जगह पंजाबी पढ़ना चाहता है, तो कई स्कूलों में उसके लिए न शिक्षक हैं और न ही पाठ्यपुस्तकें। ऐसे में छात्रों के विकल्प सीमित हो जाते हैं और नीति का उद्देश्य प्रभावित हो सकता है।

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शिक्षकों की कमी और जल्दबाजी पर भी सवाल

वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि देश के अधिकांश स्कूलों में इतनी बड़ी संख्या में भारतीय भाषाओं के शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं। वहीं, वरिष्ठ वकील श्याम दीवान ने अदालत को बताया कि इस नीति को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाना था। ऐसे में पर्याप्त तैयारी के बिना इसे लागू करने की जल्दबाजी उचित नहीं मानी जा सकती और इससे स्कूलों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

नेटिव लैंग्वेज शब्द पर अदालत की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने नेटिव लैंग्वेज शब्द की व्याख्या पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने का उद्देश्य स्वागत योग्य है, लेकिन नेटिव शब्द की स्पष्ट परिभाषा जरूरी है। अदालत ने यह भी पूछा कि क्या अंग्रेजी को भारतीय नेटिव लैंग्वेज माना जा सकता है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने नीति पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है और न ही इसके अमल पर रोक लगाई है। 

Rohit Sharma
By Rohit Sharma

पीपुल्स इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया स्टडीज, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय...Read More

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