PU Special :प्रीमियम जमा करने के बाद भी पॉलिसी लैप्स, बीमा कंपनी को देना पड़ा 1.30 लाख रुपए का मुआवजा

भोपाल। बीमा पॉलिसी का प्रीमियम जमा करने के लिए ग्राहक ने रकम दी, बैंक खाते से राशि कटी भी, लेकिन कुछ समय बाद वही पैसा खाते में वापस आ गया। इसके बाद कंपनी ने पॉलिसी को ही लैप्स घोषित कर दिया। परेशान होकर उपभोक्ता ने भोपाल जिला उपभोक्ता आयोग में आवेदन दिया। सुनवाई के दौरान आयोग ने पाया कि कंपनी यह स्पष्ट नहीं कर सकी कि भुगतान की राशि वापस क्यों की गई और पॉलिसी लैप्स करने का आधार क्या था। आयोग ने बीमा कंपनी को उपभोक्ता को कुल 1.30 लाख रुपए देने का आदेश दिया है।
2021 में ली थी करीब 3 लाख की पॉलिसी
पिपलानी क्षेत्र निवासी दीक्षा अग्रवाल ने वर्ष 2021 में करीब 3 लाख रुपए की बीमा पॉलिसी खरीदी थी। इसके बाद प्रीमियम जमा करने को लेकर परेशानी सामने आई। उनका कहना था कि एक चेक के जरिए प्रीमियम की राशि जमा कराई गई। रकम उनके बैंक खाते से कट भी गई, लेकिन कुछ दिन बाद वही राशि दोबारा खाते में वापस आ गई। दीक्षा ने बीमा कंपनी के अधिकारियों से संपर्क कर भुगतान वापस होने का कारण पूछा, लेकिन उन्हें स्पष्ट जवाब नहीं मिला। इसके बाद कंपनी की ओर से अगले दो साल का प्रीमियम एक साथ जमा करने को कहा गया।
तीन माह बाद लौटी राशि
दीक्षा के अनुसार उन्होंने करीब 4.87 लाख रुपए का भुगतान किया। यह रकम भी कुछ समय बाद उनके बैंक खाते में वापस आ गई। खास बात यह रही कि राशि तीन महीने से अधिक समय बाद वापस हुई। जब उन्होंने कंपनी से संपर्क किया तो उन्हें बताया गया कि पॉलिसी लैप्स हो चुकी है। दीक्षा का कहना था कि कंपनी के पास उनकी रकम कई महीनों तक रही, लेकिन न तो राशि वापस होने का स्पष्ट कारण बताया गया और न ही पॉलिसी लैप्स करने की उचित वजह समझाई गई। इसके बाद उन्होंने उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कराई।
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कंपनी का तर्क-दस्तावेज और जानकारी दी थी
सुनवाई के दौरान बीमा कंपनी ने कहा कि पॉलिसी से संबंधित दस्तावेज और जरूरी जानकारी ग्राहक को उपलब्ध कराई गई थी। कंपनी ने यह भी दलील दी कि पॉलिसी प्राप्त होने के बाद निर्धारित अवधि में उसे रद्द करने का विकल्प था, जिसका महिला ने इस्तेमाल नहीं किया। आयोग ने रिकॉर्ड की जांच के बाद पाया कि कंपनी 4.87 लाख रुपए की राशि वापस करने और पॉलिसी को लैप्स करने की परिस्थितियों को स्पष्ट रूप से साबित नहीं कर सकी। आयोग ने यह भी कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड से यह भी सामने नहीं आया कि भुगतान में हुई गड़बड़ी के लिए उपभोक्ता जिम्मेदार थी। आयोग ने बीमा कंपनी को उपभोक्ता को 1 लाख रुपए देने का आदेश दिया। इसके अलावा मानसिक परेशानी और वाद व्यय के लिए 30 हजार रुपए देने के आदेश दिए हैं।
रसीद, बैंक स्टेटमेंट और पूरा रिकॉर्ड रखें
उपभोक्ता मामलों की एडवोकेट मोना पालीवाल ने कहा कि बीमा प्रीमियम जमा करते समय चेक, बैंक स्टेटमेंट, रसीद, कंपनी से हुई बातचीत और ई-मेल जैसे सभी रिकॉर्ड सुरक्षित रखना चाहिए। यदि ग्राहक के खाते से राशि कटने के बाद वापस आती है तो कंपनी से उसका लिखित कारण मांगना जरूरी है। पॉलिसी की स्थिति में बदलाव या लैप्स होने की जानकारी भी ग्राहक को स्पष्ट रूप से दी जानी चाहिए। ऐसे मामलों में दस्तावेज ही उपभोक्ता के दावे को मजबूत बनाते हैं।
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