PU Special :इंदौर हाईकोर्ट ने कहा-अगर सुलह की गुंजाइश नहीं तो 6 महीने का इंतजार जरूरी नहीं 15 दिन में फैसला करें

विश्वनाथ सिंह, इंदौर। आपसी सहमति से तलाक लेने वाले दंपती को हर स्थिति में छह महीने की प्रतीक्षा अवधि पूरी करना जरूरी नहीं है। यदि पति-पत्नी लंबे समय से अलग रह रहे हों, साथ रहने की कोई संभावना न हो और सुलह की कोशिशें विफल हो चुकी हों, तो न्यायालय परिस्थितियों के आधार पर इस अवधि में छूट दे सकता है।
सुप्रीम और हाई कोर्ट के फैसलों के अनुरूप हो निर्णय
इंदौर हाई कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए पारिवारिक न्यायालय का आदेश निरस्त कर दिया है।जस्टिस संदीप एन. भट्ट ने अशुतोष की याचिका मंजूर करते हुए फैमिली कोर्ट इंदौर को निर्देश दिया कि आपसी सहमति से तलाक की अर्जी में छह महीने की अवधि माफ करने के आवेदन पर सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के हालिया फैसलों के अनुरूप नए सिरे से निर्णय लिया जाए। कोर्ट ने यह निर्णय प्रमाणित प्रति मिलने के 15 दिन के भीतर करने को कहा है।
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पति-पत्नी ने सहमति से तलाक की संयुक्त अर्जी दी थी
पति-पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-बी के तहत आपसी सहमति से तलाक की संयुक्त अर्जी दायर की थी। दोनों अप्रैल-मई 2025 से अलग रह रहे हैं। इसके बावजूद पारिवारिक न्यायालय ने छह महीने की प्रतीक्षा अवधि के आधार पर मामले की अगली तारीख 4 अप्रैल 2027 तय कर दी। पति ने प्रतीक्षा अवधि माफ करने का आवेदन दिया, लेकिन उसे खारिज कर दिया गया। इसके खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई थी।
विवाह को अनावश्यक रूप से खींचना नहीं
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 13-बी(2) में दी गई छह महीने की अवधि अनिवार्य नहीं, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार न्यायालय के विवेक पर निर्भर है। न्यायालय ने कहा कि इस अवधि का उद्देश्य पति-पत्नी को जल्दबाजी में तलाक लेने से रोकना और यदि संभव हो तो विवाह बचाने का अवसर देना है, लेकिन जब सुलह की कोई संभावना नहीं बची हो और प्रतीक्षा अवधि केवल दोनों पक्षों की पीड़ा बढ़ाने वाली हो, तब विवाह को अनावश्यक रूप से लंबा खींचना कानून के उद्देश्य के अनुरूप नहीं होगा। ऐसी स्थिति में केवल प्रतीक्षा अवधि पूरी न होने के आधार पर राहत से वंचित नहीं करना चाहिए।
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