PU Special :बीमारी में ठुकराया क्लेम, बीमा कंपनी चुकाएगी 16 लाख का होम लोन

भोपाल। होम लोन के साथ ली गई स्वास्थ्य और मकान क्षतिपूर्ति बीमा पॉलिसी के तहत गंभीर बीमारी का क्लेम खारिज करना बीमा कंपनी को भारी पड़ा। जिला उपभोक्ता आयोग ने आईसीआईसीआई लोम्बार्ड को सेवा में कमी का दोषी मानते हुए उपभोक्ता के बकाया करीब 16 लाख रुपए के होम लोन की राशि ब्याज सहित चुकाने के आदेश दिए हैं। आयोग ने मानसिक पीड़ा और वाद व्यय के लिए भी 15 हजार रुपए देने को कहा है।
18.80 लाख का लिया था होम लोन
भोपाल के राजीव नगर निवासी महेंद्र कुमार ने वर्ष 2018 में आईसीआईसीआई लोम्बार्ड और पीएनबी हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड के खिलाफ उपभोक्ता आयोग में परिवाद दायर किया था। उन्होंने कटारा हिल्स में 2 बीएचके फ्लैट खरीदने के लिए पीएनबी हाउसिंग फाइनेंस से 18.80 लाख रुपए का होम लोन लिया था। लोन के साथ उन्होंने 34,472 रुपए में स्वास्थ्य और मकान क्षतिपूर्ति बीमा पॉलिसी भी ली थी। महेंद्र कुमार के अनुसार, पॉलिसी लेते समय उन्हें बताया गया था कि बीमारी या दुर्घटना की स्थिति में बकाया लोन राशि का भुगतान बीमा कंपनी करेगी।
बीमारी के बाद किया क्लेम, कंपनी ने किया खारिज
वर्ष 2017 में चक्कर आने से गिरने के बाद जांच में महेंद्र कुमार को न्यूरोसिस्टिसरकोसिस की पुष्टि हुई। इसके बाद उन्होंने मेडिकल दस्तावेजों के आधार पर बीमा कंपनी के सामने क्लेम किया। हालांकि, आईसीआईसीआई लोम्बार्ड ने क्लेम को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि संबंधित बीमारी सामान्य बीमारी है और पॉलिसी के तहत कवर नहीं होती।
कंपनी ने बीमारी को बताया पॉलिसी से बाहर
मामले की सुनवाई के दौरान आईसीआईसीआई लोम्बार्ड ने आयोग के सामने तर्क दिया कि उपभोक्ता की बीमारी पॉलिसी के तहत कवर नहीं थी। वहीं, पीएनबी हाउसिंग फाइनेंस ने अपने खिलाफ लगाए गए सेवा में कमी के आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि मामला बीमा कंपनी से संबंधित है और उसके खिलाफ परिवाद खारिज किया जाना चाहिए। आयोग ने दस्तावेजों के आधार पर पीएनबी हाउसिंग फाइनेंस के खिलाफ मामला खारिज कर दिया। वहीं आईसीआईसीआई लोम्बार्ड को सेवा में कमी का दोषी मानते हुए बकाया होम लोन की राशि ब्याज सहित चुकाने के आदेश दिए।
पॉलिसी की शर्तों को समझना जरूरी
उपभोक्ता मामलों के अधिवक्ता विजय बहादुर सिंह तोमर ने बताया कि होम लोन से जुड़ी बीमा पॉलिसी में क्लेम की पात्रता केवल बीमारी के नाम से तय नहीं होती। पॉलिसी की शर्तें, बीमारी की प्रकृति, मेडिकल रिकॉर्ड और क्लेम खारिज करने के आधार को देखना जरूरी होता है। उन्होंने कहा कि हर मामले का फैसला संबंधित पॉलिसी की शर्तों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होता है।




















