Betul Illegal Sand Mining: टांडा में 3 बिना नंबर ट्रैक्टर पकड़े, वन विभाग की कार्रवाई पर उठे सवाल

मध्य प्रदेश के बैतूल जिले में अवैध रेत परिवहन को लेकर पश्चिम वन मंडल की कार्रवाई अब सवालों के घेरे में है। गवासेन रेंज के वन ग्राम टांडा के पास वन अमले ने अवैध रेत का परिवहन कर रहे तीन बिना नंबर वाले ट्रैक्टर पकड़े। कार्रवाई के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि इन वाहनों के खिलाफ वन अधिनियम के तहत कार्रवाई करने के बजाय मामला राजस्व विभाग को क्यों सौंपा गया? मामले को लेकर स्थानीय स्तर पर चर्चा तेज है। ग्रामीणों का आरोप है कि कार्रवाई सिर्फ खानापूर्ति तक सीमित रही, जबकि इलाके में अवैध रेत कारोबार लंबे समय से चलने की शिकायतें सामने आती रही हैं।
टांडा में तीन बिना नंबर ट्रैक्टर पकड़े गए
गवासेन रेंज के अंतर्गत आने वाले टांडा क्षेत्र में वन अमले ने तीन ट्रैक्टर पकड़े। आरोप है कि इन वाहनों से अवैध रूप से रेत का परिवहन किया जा रहा था। तीनों ट्रैक्टर बिना नंबर के बताए जा रहे हैं। ऐसे में वाहनों की पहचान, रेत के स्रोत और परिवहन से जुड़े दस्तावेजों को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। कार्रवाई के बाद मामला अब इसलिए चर्चा में है क्योंकि वन विभाग ने इसे अपने स्तर पर आगे बढ़ाने के बजाय राजस्व विभाग को सौंप दिया।
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कार्रवाई में क्या-क्या सामने आया?
टांडा क्षेत्र में तीन ट्रैक्टर पकड़े गए। तीनों वाहन बिना नंबर के बताए जा रहे हैं। वाहनों में रेत के अवैध परिवहन का आरोप है। वन अमले ने कार्रवाई की। इसके बाद मामला राजस्व विभाग को सौंपे जाने की बात सामने आई। इसी प्रक्रिया को लेकर स्थानीय स्तर पर सवाल उठ रहे हैं।
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वन अधिनियम में कार्रवाई क्यों नहीं?
पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि रेत का परिवहन वन क्षेत्र से अवैध रूप से किया जा रहा था, तो वन विभाग ने वन अधिनियम के तहत कार्रवाई क्यों नहीं की? स्थानीय लोगों और शिकायतकर्ताओं का कहना है कि वन क्षेत्र से जुड़े मामले में वन विभाग की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। उनका आरोप है कि राजस्व विभाग को मामला सौंपे जाने से कार्रवाई अपेक्षाकृत हल्की हो सकती है।
डिप्टी रेंजर बाथम की पदस्थापना पर भी सवाल
मामले में गवासेन रेंज में डिप्टी रेंजर बाथम की पुनः पदस्थापना भी चर्चा का विषय बनी हुई है। स्थानीय आरोपों के मुताबिक, उनकी दोबारा पदस्थापना के बाद इलाके में अवैध रेत उत्खनन और परिवहन की गतिविधियां बढ़ी हैं। शिकायतकर्ताओं का सवाल है कि यदि क्षेत्र में अवैध रेत कारोबार की लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं तो वन विभाग की ओर से अब तक कितनी प्रभावी कार्रवाई की गई? यही वजह है कि अब अधिकारियों की भूमिका और निगरानी व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
क्या कार्रवाई सिर्फ खानापूर्ति तक सीमित?
ग्रामीणों का आरोप है कि टांडा में हुई कार्रवाई सिर्फ दिखावे तक सीमित है। उनका कहना है कि तीन ट्रैक्टर पकड़ना तभी प्रभावी कार्रवाई मानी जाएगी, जब अवैध रेत के स्रोत, परिवहन और इससे जुड़े लोगों के खिलाफ भी नियमानुसार कार्रवाई हो। ग्रामीणों का यह भी कहना है कि यदि वन क्षेत्र से रेत का अवैध परिवहन हुआ है तो मामले की पूरी जांच होनी चाहिए और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की जानी चाहिए। इस बीच वन विभाग की कार्रवाई को लेकर यह सवाल भी उठ रहा है कि आखिर मामला राजस्व विभाग को सौंपने की जरूरत क्यों पड़ी।
सत्ताधारी नेताओं से कनेक्शन का दावा
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मामले को लेकर कुछ सूत्रों की ओर से दावा किया जा रहा है कि पकड़े गए तीनों ट्रैक्टर सत्ताधारी दल से जुड़े लोगों के बताए जा रहे हैं। इसी आधार पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि प्रभावशाली लोगों को बचाने के लिए वन अधिनियम के तहत कार्रवाई नहीं की गई।
डीएफओ की भूमिका पर भी उठे सवाल
कार्रवाई को लेकर पश्चिम वन मंडल के वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा है कि क्या वरिष्ठ अधिकारियों को पूरे घटनाक्रम की जानकारी थी और क्या उन्होंने इस मामले में कार्रवाई की प्रक्रिया की समीक्षा की? शिकायतकर्ताओं की मांग है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर यह स्पष्ट किया जाए कि तीनों वाहनों पर कौन-सा प्रकरण दर्ज किया गया, रेत कहां से लाई गई थी और मामला किस आधार पर राजस्व विभाग को सौंपा गया।



















