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पुणे का शनिवारवाड़ा महल ना सिर्फ पेशवाओं की शान और इतिहास का प्रतीक है, बल्कि रहस्यमयी और डरावनी घटनाओं के लिए भी मशहूर है। रात के समय यहां से अजीबो-गरीब आवाजें आती हैं, और कहा जाता है कि महल की दीवारों के बीच आज भी दर्दनाक चीखें गूंजती हैं।
हर साल हजारों लोग इस किले को देखने आते हैं, लेकिन जैसे ही सूरज ढलता है, यह ऐतिहासिक इमारत डरावनी कहानियों का गवाह बन जाती है। इस रिपोर्ट में हम आपको बताएंगे कि क्या वाकई में शनिवारवाड़ा एक भूतिया जगह है या फिर ये सिर्फ अफवाह है।
शनिवारवाड़ा का निर्माण 1732 में पेशवा बाजीराव प्रथम ने करवाया था। यह महल कभी मराठा साम्राज्य की सत्ता का प्रमुख केंद्र हुआ करता था। महल की भव्यता, विशाल दरवाजे, नक्काशीदार दीवारें और फव्वारे इसे शाही लुक देते थे। लेकिन पेशवा परिवार के अंदरूनी षड्यंत्रों ने इस जगह को बदनाम कर दिया। खासकर 1740 में पेशवा नारायण राव की हत्या ने इस किले को भूतिया स्थान बना दिया।
स्थानीय लोगों और गार्ड्स का दावा है कि शनिवारवाड़ा के अंदर रात में अजीब आवाज़ें, दरवाज़ों का अपने आप खुलना-बंद होना और छायाओं का दिखाई देना आम बात है। यही वजह है कि यहां सूर्यास्त के बाद एंट्री पर बैन है। यहां भूत-प्रेतों की कहानियों में इतना दम है कि विदेशी पर्यटक भी डर और रोमांच के चलते इस जगह को देखने आते हैं।
नारायण राव मराठा साम्राज्य के दसवां पेशवा थे, जो केवल 17 वर्ष की उम्र में गद्दी पर बैठे थे। वह पेशवा नाना साहेब बालाजी बाजीराव के सबसे छोटे बेटे और बाजीराव प्रथम के पोते थे। बेहद कम उम्र में सत्ता संभालने के कारण उन्हें राजनीतिक साजिशों का सामना करना पड़ा। कहा जाता है कि उनके चाचा रघुनाथ राव और चाची आनंदीबाई ने सत्ता की लालच में उनकी हत्या की साजिश रची थी। 30 अगस्त 1773 को शनिवार वाड़ा में उनकी बेरहमी से हत्या कर दी गई। मरने से पहले उन्होंने चिल्लाकर कहा था, काका, मला वाचवा जो आज भी शनिवार वाड़ा की दीवारों में गूंजता माना जाता हैं।
मस्तानी और पेशवा बाजीराव का संबंध भारतीय इतिहास की सबसे चर्चित और भावनात्मक प्रेम कहानियों में से एक है। मस्तानी, जो एक नर्तकी और बुद्धिमान राजकुमारी थीं, पेशवा बाजीराव की वीरता और व्यक्तित्व से इतनी प्रभावित हुईं कि दोनों एक-दूसरे के प्रेम में पड़ गए। बाजीराव ने सामाजिक विरोध के बावजूद मस्तानी को अपनी जीवनसंगिनी बनाया और उनके लिए शनिवार वाड़ा में अलग महल बनवाया गया जिसे ‘मस्तानी महल’ कहा जाता था। यह प्रेम न सिर्फ एक सच्चे रिश्ते की मिसाल बना, बल्कि आज भी इतिहास प्रेमियों के बीच कौतूहल और सम्मान का विषय है।

मस्तानी की मृत्यु 28 अप्रैल 1740 को हुई थी। ऐसा कहा जाता है कि जब पेशवा बाजीराव की मृत्यु हुई, तो उसी सदमे में मस्तानी ने भी प्राण त्याग दिए। उनकी मौत को लेकर कई कहानियाँ प्रचलित हैं, कुछ में कहा गया कि उन्होंने आत्महत्या की, तो कुछ में बताया गया कि उन्हें पुणे के पास पाबल गांव में बंदी बनाकर रखा गया था और वहीं उनका निधन हुआ। आज भी पाबल गांव में मस्तानी की मजार मौजूद है, जहां लोग उनके प्रेम और बलिदान को याद करते हैं।
शनिवार वाड़ा में 27 फरवरी 1828 को एक भीषण आग लगी थी, जिसने इस ऐतिहासिक किले का बड़ा हिस्सा नष्ट कर दिया था। आग लगने के पीछे की वजह आज तक साफ नहीं हो पाई है, लेकिन इतिहासकारों का मानना है कि यह या तो एक साजिश थी या फिर एक गंभीर लापरवाही का नतीजा।
इस आग की सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि इसे बुझाने में पूरे 7 दिन लग गए थे। लकड़ी और तेल से बनी इमारतों ने आग को और भड़का दिया, जिसकी वजह से इसे रोक पाना मुश्किल हो गया। आग इतनी विकराल थी कि किले के अंदर का लगभग पूरा ढांचा जलकर खाक हो गया था, सिर्फ पत्थरों की दीवारें बची रह गईं।
आज भी पुणे आने वाले सैलानियों की लिस्ट में शनिवार वाड़ा एक प्रमुख नाम है। चाहे इतिहास के छात्र हों या फिर आम पर्यटक, हर कोई इस किले की दीवारों में छिपे राज और घटनाओं को जानने के लिए यहां जरूर आता है। वाड़ा की भव्य बनावट और मराठा साम्राज्य के गौरवशाली अतीत की झलक आज भी लोगों को आकर्षित करती है।
इतिहास को करीब से महसूस करने के लिए लोग शनिवार वाड़ा की गलियों में घूमते हैं, दीवारों पर बने चित्रों को देखते हैं और गाइड्स या ऑडियो टूर की मदद से उस दौर की घटनाओं को समझते हैं। यहां आने वालों को न सिर्फ एक भूतिया एहसास होता है, बल्कि एक गहरी ऐतिहासिक अनुभूति भी होती है, जो मराठा वंश की विरासत को जीवित बनाए रखती है।