मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच अमेरिका एक बार फिर बेहद जोखिम भरे मिशन पर विचार कर रहा है- ईरान के संवर्धित यूरेनियम को उसके कब्जे से बाहर निकालना। रिपोर्ट्स के मुताबिक यह ऐसा मैटेरियल है जिससे कई परमाणु बम तैयार किए जा सकते हैं। लेकिन सवाल ये है कि क्या अमेरिका वही कर सकता है जो उसने करीब तीन दशक पहले किया था? 1994 में अमेरिका ने एक गुप्त ऑपरेशन के तहत कजाकिस्तान से सैकड़ों किलो हाईली एनरिच्ड यूरेनियम सुरक्षित निकाल लिया था। वह मिशन बिना गोली चले पूरा हुआ था। मगर आज का ईरान, उस समय के कजाकिस्तान से बिल्कुल अलग है-यहां हर कदम युद्ध की आग में घिरा है। ऐसे में यह मिशन इतिहास दोहराएगा या बड़ा खतरा बन जाएगा, यही सबसे बड़ा सवाल है।
सोवियत संघ के टूटने के बाद कई परमाणु संसाधन अलग-अलग देशों में बिखर गए थे। कजाकिस्तान के एक प्लांट में लगभग 600 किलो हाईली एनरिच्ड यूरेनियम पड़ा था, जो दर्जनों परमाणु बम बनाने के लिए काफी था। उस समय अमेरिका और कजाकिस्तान के बीच समझौता हुआ और एक बेहद गुप्त मिशन शुरू किया गया, जिसे “प्रोजेक्ट सफायर” नाम दिया गया। इसमें अमेरिकी विशेषज्ञों की एक टीम ने कई हफ्तों तक लगातार काम कर इस खतरनाक सामग्री को पैक किया और फिर एयरलिफ्ट कर अमेरिका ले जाया गया। इस पूरे ऑपरेशन में सबसे बड़ी बात यह थी कि इसमें किसी तरह का सैन्य टकराव नहीं हुआ। यह पूरी तरह सहयोग और रणनीति पर आधारित मिशन था।
आज अमेरिका जिस मिशन पर विचार कर रहा है, वह कहीं ज्यादा जटिल और खतरनाक है। यहां मामला किसी दोस्त देश का नहीं, बल्कि एक ऐसे देश का है जो पहले से ही संघर्ष की स्थिति में है और अपने परमाणु कार्यक्रम को अपनी सुरक्षा से जोड़कर देखता है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका ईरान के लगभग 450 किलो एनरिच्ड यूरेनियम को बाहर निकालना चाहता है। लेकिन इसके लिए उसे ईरानी जमीन पर उतरना पड़ सकता है, जो सीधे-सीधे सैन्य कार्रवाई होगी।
कजाकिस्तान और ईरान के मिशन में जमीन-आसमान का फर्क है।
यही कारण है कि विशेषज्ञ इस संभावित मिशन को आधुनिक दौर के सबसे जोखिम भरे ऑपरेशनों में गिन रहे हैं।
अगर अमेरिका इस मिशन को अंजाम देता है, तो उसे विशेष बलों को ईरान के अंदर भेजना होगा। न्यूक्लियर साइट्स, जो अक्सर भूमिगत और सुरक्षित बंकरों में होती हैं, उन्हें कब्जे में लेना आसान नहीं होगा। इसके बाद रेडियोएक्टिव मैटेरियल को सुरक्षित तरीके से निकालना और देश से बाहर ले जाना होगा। यह पूरा ऑपरेशन कई दिनों तक चल सकता है और हर पल हमले का खतरा बना रहेगा।
ईरान पहले ही अपनी सैन्य ताकत और मिसाइल क्षमता के लिए जाना जाता है। ऐसे में किसी भी अमेरिकी कार्रवाई का जवाब तुरंत और आक्रामक हो सकता है। ड्रोन हमले, मिसाइल स्ट्राइक और जमीनी लड़ाई- तीनों खतरे एक साथ मौजूद रहेंगे। यही वजह है कि यह मिशन केवल तकनीकी नहीं, बल्कि पूरी तरह युद्ध जैसी स्थिति में बदल सकता है।
प्रोजेक्ट सफायर की सफलता का सबसे बड़ा कारण था-विश्वास और सहयोग। लेकिन ईरान के मामले में न तो भरोसा है और न ही बातचीत की गुंजाइश। आज की स्थिति में ऐसा कोई भी कदम क्षेत्रीय युद्ध को और भड़का सकता है। यही कारण है कि अमेरिका अभी तक अंतिम फैसला लेने से बच रहा है।