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पति के गुजरने के बाद घर तक बिका, पर नहीं मानी हार, फूड स्टॉल लगाकर बना रहीं बच्चों का कॅरियर

इंटरनेशनल वूमन्स डे : संघर्ष और चुनौतियों के बावजूद हार न मानने वाली महिलाओं की कहानी
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पति के गुजरने के बाद घर तक बिका, पर नहीं मानी हार, फूड स्टॉल लगाकर बना रहीं बच्चों का कॅरियर

प्रीति जैन। परिवार और बच्चों की खातिर महिलाएं अपनी सीमाओं का विस्तार करती हैं और तमाम संघर्षों और मुश्किलों के बावजूद अपने घर को संभालती हैं। इंटरनेशनल वूमन्स डे के मौके पर ऐसी ही महिलाओं से मुलाकात का मौका मिला जिन्होंने अपने बच्चों की शिक्षा की खातिर नौकरी न करते हुए स्व-रोजगार को प्राथमिकता थी। नौकरी में छुट्टियों की समस्या रहती है इसलिए वे सड़क किनारे खड़े होकर अपने कुकिंग के पैशन को फॉलो करते हुए अपने बच्चों की शिक्षा का प्रबंध कर रहीं हैं। इनमें से कोई जेनेटिक्स में पीजी है तो कोई स्कूल में हेडमिस्ट्रेस रह चुकी है। पति के गुजरने के बाद स्व-रोजगार कर रहीं यह महिलाएं अन्य महिलाओं के लिए मिसाल हैं, जो इस तरह के संकट से गुजर रही हैं। इनका कहना है, महिलाओं की मानसिक ताकत बहुत ज्यादा होती है। पति का साथ छूटने के बाद यह समझ नहीं आता था क्या होगा, लेकिन खोजो तो रास्ता मिल ही जाता है।

बेटियों की पढ़ाई के लिए शुरू किया अपना काम

मैं शहर के एक प्रतिष्ठित स्कूल में हेडमिस्ट्रेस थी लेकिन कोविड में जॉब चली गई और पति को बीमारी ने घेर लिया। उनके इलाज में हमारा घर तक बिक गया। साल 2020 के बाद डेढ़ साल का समय जमा पूंजी से निकाला, फिर भोपाल के बाहर जॉब लगी तो अपनी बेटियों को अकेला छोड़कर भी चली गई, लेकिन छोटी बच्चियां अकेले कैसे रह पाएंगी यह सोचकर वापस भोपाल आ गई और फिर एक दिन राजमा-चावल बनाकर आॅटो में रखकर जगह तलाश करके एमपी नगर में विजय स्तंभ पास टेबल लगाकर खड़ी हो गई। मुझे देखकर कई लोगों ने कहा कि आप तो कुछ अच्छे प्रोफाइल की लग रही हैं, तो यहां क्यों स्टॉल लगाया है। लोग मेरा खाना पसंद करते हैं क्योंकि मैं होममेड फूड दे रही हूं। दोपहर 12 बजे से शाम 7 बजे तक खड़ी रहती हूं ताकि मेरी बेटियों की पढ़ाई जारी रहे। -ज्योति जयाराज, एमपी नगर

पानी पूरी बेचकर करा रहीं बेटे को IIT की तैयारी

मेरे पति लैब टेक्नीशियन थे लेकिन तीन साल पहले उनकी बीमारी के चलते हमारी सारी पूंजी खत्म हो गई। कुछ समय बाद मेरे पति भी गुजर गए। उस समय मैंने एमपी-पीएससी का प्रीलिम्स एग्जाम पास किया था और मुख्य परीक्षा की तैयारी कर रही थी लेकिन सारे सपने अधूरे रह गए। बेटा पढ़ने में होशियार है तो मैंने उसे आईआईटी की तैयारी कराने के लिए स्व-रोजगार का विकल्प चुना, लेकिन व्यवसाय शुरू करने के लिए पूंजी नहीं थी तो सोचा सबसे सस्ते में पानी-पूरी का काम ही शुरू हो सकता है, तो वो शुरू किया और एमएलबी कॉलेज के सामने स्टॉल लगाने लगी। लड़कियां बहुत सहयोग करती हैं, उनकी वजह से अपने बेटे को आईआईटी की कोचिंग भेज पा रही हूं। कोचिंग के मितेश राठी ने भी मेरा बहुत सहयोग किया। आमदनी ज्यादा न सही लेकिन रेगुलर इनकम मिल रही है। -लता पाल, स्ट्रीट वेंडर

मुंबई छोड़कर भोपाल को बनाया कर्मभूमि

सड़क के किनारे फूड स्टॉल लगाना आसान नहीं होता। नगर निगम कई बार सामान जब्त कर लेता है इसलिए मैं सुबह 6 बजे से 11 बजे तक ही अपना फूड ट्रक लगाती हूं। मैं जेनेटिक्स एंड बायोमेडिकल में पीजी हूं। भोपाल एनजीओ में जॉब के सिलसिले में आई थी, उस दौरान आदिवासी इलाकों में मिलेट्स का महत्व जाना। एनजीओ का प्रोजेक्ट पूरा हुआ तो मैं मुंबई वापस नहीं गई और अकेले भोपाल में रहकर मिलेट्स डोसा, इडली बनाने का काम शुरू किया। पांच लाख रुपए में मेरा फूड ट्रक तैयार हुआ और शाहपुरा पर मेरा व्यवसाय अच्छा चल रहा है। सुबह 4 बजे से उठकर खाने की तैयारी करती हूं और अब मैं दो अन्य लोगों को रोजगार दे पा रही हूं। मुंबई वापस न जाकर भोपाल में ही काम करना मुझे सुकून भरा लगा। -पिंकी मंडल, ड्रमस्टिक फूड ट्रक

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