सचिन तेंदुलकर और जसप्रीत बुमराह दो अलग-अलग पीढ़ी के ऐसे दिग्गज खिलाड़ी जो अपने-अपने क्षेत्र में माहिर हैं। एक गेंदबाजी का हुनरमंद और दूसरा बल्लेबाजी का। भले ही दौर अलग-अलग हो, लेकिन दोनों खिलाड़ियों ने अपने खेलने की कला में जो दक्षता हासिल कर रखी है उसका कोई तोड़ नहीं है। जब भी महान भारतीय खिलाड़ियों की चर्चा होती है, मास्टर ब्लास्टर का नाम सबसे पहले लिया जाता है। उनकी बल्लेबाजी का हुनर बेमिसाल है। वहीं अगर गेंदबाजी की बात की जाए तो जसप्रीत बुमराह आज के दौर के वह खिलाड़ी जिनके हुनर की तुलना सचिन तेंदुलकर से की जाती है। बहुत से दिग्गज क्रिकेटरों का यह मानना है कि जसप्रीत पर सचिन की कला का पूरा प्रभाव दिखता है। जैसे तेंदुलकर अपनी बल्लेबाजी के हुनरमंद हैं वैसे ही अभी की पीढ़ी में जसप्रीत अपनी बल्लेबाजी के बादशाह हैं।
क्रिकेट विशेषज्ञों की राय में बुमराह भारतीय गेंदबाजी के असल 'सचिन तेंदुलकर' हैं। दोनों की क्रिकेट कला क्षेत्र भले ही अलग हो,लेकिन इस सच को झुठलाया नहीं जा सकता कि एक बल्ले से जादू करता था, दूसरा गेंद से करता है। लेकिन दोनों खिलाड़ियों के प्रभाव, खेलने की समझ और बड़े मौकों पर प्रदर्शन की क्षमता में अद्वभुत समानता दिखती है। आज के दौर में बुमराह सिर्फ एक गेंदबाज नहीं, बल्कि टीम इंडिया की जीत की सबसे बड़ी उम्मीद भी बन चुके हैं।
अगर सचिन तेंदुलकर के सफर पर नजर डाला जाए तो पता चलता है कि उन्होंने मात्र 16 साल की उम्र में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की शुरूआत की, और लगातार 24 साल तक खेलते रहे। वहीं बुमराह का करियर थोड़ा अलग रहा है। सफर उतनी लंबी तो नहीं लेकिन सचिन से काफी मिलती-जुलती रही है। बुमराह ने अपनी छोटी सी क्रिकेट जर्नी में ही वो कमाल कर दिखाया जो आज के समय में भारतीय क्रिकेट इतिहास को बढ़ाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। दोनों ही खिलाड़ियों में अपने खेल पर कंट्रोल जबरदस्त है।
चाहे बात बल्लेबाजी की हो या गेंदबाजी की दोनों अपने हुनर के ऐसे उस्ताद रहे हैं जो पूरी मैच की दिशा बदल सकते हैं। बड़े मुकाबलों में बेहतरीन प्रदर्शन उनकी सबसे बड़ी खूबी है। बीते दौर की अगर बात की जाए तो, सचिन जब मैदान में उतरते थे, तो विपक्षी टीम दबाव में आ जाती थी। जब भी सीमित ओवरों की बात आती है, आज के दौर में वही स्थिति बुमराह के साथ देखने को मिलती है। सीमित ओवर में बुमराह जबरदस्त योजना के साथ बल्लेबाजी के दमपर पूरे मैच को बदलने की ताकत रखते हैं।
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दोनों खिलाड़ी मैच प्रैक्टिस की अपनी-अपनी एक अलग विधा अपनाते हैं, जिससे पिच पर उनके खेल का परफेक्शन साफ देखने को मिलता है। अगर पहले के दौर की बात की जाए तो सचिन तेंदुलकर के शुरुआती दिनों को देखने वाले लोगों को याद होगा कि उन्होंने अपने करियर के एक दौर के बाद भारतीय गेंदबाजों के खिलाफ नेट्स में बल्लेबाजी करना लगभग बंद कर दिया था। वे अक्सर कोच या सहयोगियों से थ्रोडाउन लेकर अभ्यास करते थे।
ठीक उसी तरह बुमराह ने भी अपने खेल के तरीकों को बहुत हद तक कुछ खास कुछ अलग बना रखा है। वह भी नेट्स में बल्लेबाजों को कुछ गेंदें जरूर डालते हैं, लेकिन उनकी सबसे ज्यादा प्रैक्टिस अपनी गेंदबाजी की योजनाओं पर केंद्रित होती है। वह इस बात का पूरा ध्यान रखते हैं कि किस बल्लेबाज को क्या गेंद डालनी है, किस लंबाई पर गेंद फेंकनी है?
दोनों ही खिलाड़ियों के जीवन में एक ऐसा दौर आया जब चारों तरफ से इनके काम को लेकर चर्चाएं तेज होने लगीं। सचिन के साथ ये दौर साल 2005 के आसपास आया। जब कहा गया था कि सचिन का बल्ला नहीं चल रहा, वो नहीं खेल पा रहे। लगातार उनके परफॉरमेंस पर सवाल उठने लगे थे, लेकिन इसके बाद उन्होंने आलोचकों के मुंह पर अपने काम से ऐसा तमाचा जड़ा कि वह फिर कभी कुछ बोल नहीं पाए। 2006 से 2011 तक, उन्होंने हर साल 40 से ज्यादा की एवरेज से रन बनाए।
ठीक उसी तरह साल 2022 में जब बुमराह को बैक स्ट्रेस फ्रैक्चर हुआ था, तो चारों ओर चर्चा होने लगी कि बुमराह का करियर खत्म, लेकिन उनकी वापसी ने जो जबरदस्त कमाल ढ़ाया उसके चर्चे आज तक हो रहे हैं।
साल 2023 में भारत उनके दम पर फाइनल में पहुंचा। 2024 में प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट रहे बुमराह के योगदान को कोई चाहकर भी नहीं भूल सकता। पाकिस्तान के खिलाफ मैच में उन्होंने टीम इंडिया की जबरदस्त वापसी कराई और भारत ने 119 रन का बचाव किया था। वहीं, फाइनल में बुमराह के यॉर्कर गेंदबाजी ट्रिक्स ने भारत को जीत दिलाई थी। दोनों की शानदार करियर वापसी की कहानी भी एक सी है। लोगों की आलोचनाओं का जवाब अपने काम से देकर अपनी प्रतिभा का परचम लहराना।
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जसप्रीत बुमराह और क्रिकेट की दुनिया के सरताज सचिन तेंदुलकर दोनों की शख्सियत में बहुत सी समानताएं दिखती हैं। दोनों ही अंदर से बहुत ही मजबूत और आत्मविश्वासी इंसान हैं। लोग क्या कहेंगे? क्या कह रहे हैं इन आलोचनाओं से परे वह सिर्फ और सिर्फ अपने काम पर ध्यान देते आए हैं। तेंदुलकर और बुमराह अपने काम में इतने माहिर हैं कि आलोचकों को उनके क्रिकेट कला के हुनर के आगे खुद ही शांत हो जाना पड़ता है। हर उतार-चढ़ाव के बीच शांत रहकर, आत्मविश्वास बनाए रखकर लार्जर देन लाइफ, एचीवर्स वाली पर्सनैल्टी उन्हें दो अलग-अलग दौर का दिग्गज खिलाड़ी बनाती है।