मिडिल ईस्ट में चल रही भीषण जंग अब वैश्विक स्तर पर गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच जारी सैन्य टकराव ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर दिया है। इस संघर्ष के बीच संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) ने एक अहम कदम उठाते हुए ईरान से खाड़ी देशों पर हमले तुरंत रोकने की मांग की है। बहरीन की अगुवाई में लाए गए इस प्रस्ताव को परिषद के अधिकांश सदस्यों का समर्थन मिला, जबकि रूस और चीन ने वोटिंग से दूरी बना ली। इस प्रस्ताव ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर मिडिल ईस्ट संकट को और भी केंद्र में ला दिया है।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में बुधवार को ईरान को लेकर एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किया गया। यह प्रस्ताव बहरीन की ओर से पेश किया गया था, जिसमें ईरान द्वारा खाड़ी देशों पर किए जा रहे हमलों की कड़ी निंदा की गई। सुरक्षा परिषद के कुल 15 सदस्य देशों में से 13 देशों ने इस प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया, जबकि रूस और चीन ने वोटिंग से दूरी बनाई। वहीं प्रस्ताव के खिलाफ किसी भी देश ने वोट नहीं दिया।
इस प्रस्ताव में कहा गया है कि, ईरान द्वारा किए जा रहे हमले अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन हैं और वैश्विक शांति एवं सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रहे हैं।
प्रस्ताव में ईरान द्वारा खाड़ी क्षेत्र के कई देशों पर किए गए हमलों का उल्लेख किया गया और उनकी कड़े शब्दों में निंदा की गई।
इन देशों में शामिल हैं-
सुरक्षा परिषद ने कहा कि, इन देशों की संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और राजनीतिक स्वतंत्रता का सम्मान किया जाना चाहिए। प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि, इन देशों पर हमले अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों के खिलाफ हैं।
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UNSC के प्रस्ताव में ईरान से स्पष्ट रूप से कहा गया है कि, वह खाड़ी देशों के खिलाफ सभी सैन्य कार्रवाई और हमलों को तुरंत बंद करे। इसके साथ ही परिषद ने सभी पक्षों से क्षेत्र में तनाव कम करने और शांति बहाल करने के लिए कदम उठाने की अपील की।
प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि, क्षेत्र में सैन्य टकराव को रोकना जरूरी है। नागरिक इलाकों और बुनियादी ढांचे को निशाना बनाना बंद किया जाए। समुद्री सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को सुरक्षित रखा जा।
सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव में होर्मुज स्ट्रेट को लेकर भी गंभीर चिंता व्यक्त की। यह जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है, जहां से बड़ी मात्रा में तेल और गैस की आपूर्ति होती है। ईरान द्वारा इस जलडमरूमध्य को बंद करने की धमकियों ने वैश्विक बाजारों में चिंता बढ़ा दी है।
परिषद ने कहा कि, होर्मुज स्ट्रेट में तनाव वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित कर सकता है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार और समुद्री यातायात पर इसका बड़ा असर पड़ सकता है। वैश्विक अर्थव्यवस्था भी इससे प्रभावित हो सकती है।
मौजूदा संकट की शुरुआत 28 फरवरी को हुई, जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर संयुक्त सैन्य हमला किया।
इस कार्रवाई के बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाना शुरू कर दिया।
इसके बाद कई अरब देशों पर मिसाइल और ड्रोन हमले हुए। अमेरिकी सैन्य बेस को निशाना बनाया गया। क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां तेज हो गईं। इसी के बाद से मिडिल ईस्ट में तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है।
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UNSC के इस प्रस्ताव पर ईरान ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। संयुक्त राष्ट्र में ईरान के राजदूत अमीर सईद इरावानी ने इस प्रस्ताव की आलोचना करते हुए इसे पक्षपातपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि, प्रस्ताव में जंग की वास्तविकता को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है।
इरावानी के अनुसार, संकट की असली वजह अमेरिका और इजरायल के हमले हैं। प्रस्ताव में इस तथ्य का जिक्र नहीं किया गया, यह प्रस्ताव राजनीतिक रूप से प्रेरित है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि, इस प्रस्ताव का उद्देश्य पीड़ित और हमलावर की भूमिका को उलट कर दिखाना है।
ईरान ने यह भी दावा किया है कि उसने केवल अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर जवाबी कार्रवाई की है। ईरानी प्रतिनिधि के अनुसार, अमेरिका और इजरायल के हमलों में 1300 से अधिक नागरिक मारे गए। 17 हजार से ज्यादा लोग घायल हुए। कई घर, स्कूल और अस्पताल तबाह हो गए। ईरान ने यह भी कहा कि, उसने होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह बंद नहीं किया है और वह खाड़ी देशों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखना चाहता है।
वहीं अमेरिका ने ईरान पर नागरिक इलाकों को निशाना बनाने का आरोप लगाया है। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका के प्रतिनिधि माइक वाट्स ने कहा कि ईरान की कार्रवाई से पूरे क्षेत्र की सुरक्षा खतरे में पड़ गई है।
उन्होंने कहा कि, ईरान नागरिक ढांचे और शहरों को निशाना बना रहा है, इससे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ रही है। अमेरिका ने पहले बातचीत के जरिए समाधान निकालने की कोशिश की थी। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि ईरान बातचीत के लिए तैयार नहीं हुआ।
इस प्रस्ताव को 135 देशों ने सह-प्रायोजित किया था, जिनमें भारत भी शामिल है। भारत ने बहरीन के नेतृत्व वाले इस प्रस्ताव को कई देशों के साथ मिलकर समर्थन दिया।
इन देशों में शामिल हैं-
भारत समेत कुल 135 देशों ने इस प्रस्ताव को को-स्पॉन्सर किया।
भारत के लिए मिडिल ईस्ट की स्थिरता बेहद महत्वपूर्ण है। इसके पीछे कई प्रमुख कारण हैं-
1. ऊर्जा सुरक्षा
भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है। अगर इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है तो तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, जिससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर असर पड़ेगा।
2. समुद्री व्यापार
भारत के कई व्यापारिक जहाज होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरते हैं। अगर यह मार्ग बंद होता है तो अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रभावित हो सकता है।
3. भारतीय प्रवासी
खाड़ी देशों में लाखों भारतीय काम करते हैं। इसलिए क्षेत्र में स्थिरता भारत के लिए बेहद जरूरी है।
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सुरक्षा परिषद की वोटिंग में पाकिस्तान भी उन देशों में शामिल था जिन्होंने प्रस्ताव का समर्थन किया। पाकिस्तान ने कहा कि, क्षेत्र में अस्थिरता से वह भी प्रभावित होता है, इसलिए उसने प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया। यह प्रस्ताव क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया था।
UNSC के प्रस्ताव में खाड़ी देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के समर्थन को दोहराया गया। सुरक्षा परिषद ने कहा कि, बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और जॉर्डन इन सभी देशों की सुरक्षा और राजनीतिक स्वतंत्रता का सम्मान किया जाना चाहिए।
सुरक्षा परिषद ने चेतावनी दी कि अगर क्षेत्र में हमले जारी रहते हैं तो इसका असर केवल मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा। इसके संभावित प्रभाव हो सकते हैं-
इसलिए परिषद ने सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की।
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संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को संयुक्त राष्ट्र की सबसे शक्तिशाली संस्था माना जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य दुनिया में शांति और सुरक्षा बनाए रखना है। सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य देश होते हैं।
इनमें से 5 स्थायी सदस्य-
इन देशों के पास वीटो पावर होती है।
10 अस्थायी सदस्य
इनका चयन निश्चित अवधि के लिए किया जाता है।