Aakash Waghmare
11 Jan 2026
भोपाल। विजयादशमी यानी दशहरा आते ही पूरे देश में बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में रावण के पुतले का दहन किया जाता है। पर क्या आप जानते हैं कि हमारे देश में कुछ ऐसी जगहें भी हैं जहां रावण को पूजनीय माना जाता है। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कुछ हिस्सों में रावण को या तो दामाद या प्रथम पूज्य देवता मानकर उनकी आराधना की जाती है। आइए जानते हैं इन अद्भुत स्थानों के बारे में...

मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में एक गांव का नाम ही रावण है। यहां के कान्यकुब्ज ब्राह्मण रावण को अपना पूर्वज और देवता मानते हैं। यहां रावण को 'रावण बाबा' कहा जाता है और उनकी पूजा प्रथम पूज्य देवता के रूप में होती है। कोई भी शुभ काम शुरू करने से पहले ग्रामीण रावण की लेटी हुई विशाल प्रतिमा के सामने दंडवत प्रणाम करके उनकी नाभि में तेल लगाते हैं। दशहरे पर यहां रावण दहन नहीं बल्कि भंडारा होता है।

मंदसौर को प्राचीन काल में दशपुर कहा जाता था। यहीं की मंदोदरी से रावण का विवाह हुआ था। इसलिए मंदसौर के लोग रावण को अपना दामाद (जमाई) मानते हैं और पूरे साल उनकी पूजा करते हैं। यहां रावण की 41 फीट ऊंची प्रतिमा है। जहां नामदेव समाज के लोग विशेष रूप से पूजा करते हैं। दशहरे की शाम रावण वध से पहले लोग रावण से क्षमा-याचना भी करते हैं। लोग रावण के पैर में धागा भी बांधते हैं। जिससे माना जाता है कि बीमारियां दूर होती हैं।

राजस्थान के जोधपुर में मेहरानगढ़ फोर्ट की तलहटी में रावण और मंदोदरी का मंदिर है। यहां रहने वाले गोधा गोत्र के श्रीमाली दवे ब्राह्मण खुद को रावण का वंशज मानते हैं। उनके लिए दशहरा शोक का प्रतीक है। वे रावण दहन देखने नहीं जाते बल्कि शोक मनाते हैं। इस दिन वे रावण के दर्शन करते हैं। वहीं, कुछ परिवार पिंडदान भी करवाते हैं। वे रावण को महान विद्वान और संगीतज्ञ होने के लिए पूजते हैं।

उत्तर प्रदेश के मेरठ के गंगोल गांव में दशहरा नहीं मनाया जाता, बल्कि शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है। 1857 की क्रांति में अंग्रेजों ने दशहरे के दिन गांव के 9 वीर सपूतों को फांसी पर लटका दिया था। तब से गांव के लोग इस दिन को शहादत दिवस मानकर शोक मनाते हैं और रावण दहन की जगह भजन-कीर्तन करते हैं।
इस तरह भारत में रावण को देखने और पूजने की ये अनोखी परंपराएं सदियों से चली आ रही हैं। जो देश की विविधता को दर्शाती हैं।