ट्रंप की डील, नेतन्याहू की दुविधा ;क्या समझौते से पहले ही शुरू हो गई नई जंग?

अमेरिका और ईरान के बीच महीनों की तनातनी के बाद एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर सहमति बनी है, लेकिन इस डील को लेकर सबसे बड़ी बेचैनी इजरायल में दिखाई दे रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जहां इस समझौते को मध्य पूर्व में स्थिरता की दिशा में बड़ा कदम मान रहे हैं, वहीं इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू इसे पूरी तरह भरोसेमंद नहीं मानते।
विशेषज्ञों का मानना है कि समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद भी असली चुनौती अब शुरू हुई है। अगले 60 दिनों तक अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम, तेल आपूर्ति और समझौते की शर्तों को लागू करने पर बातचीत होगी। इसी दौरान इजरायल की भूमिका भी काफी अहम रहने वाली है।
ईरान को लेकर नेतन्याहू का पुराना रुख
बेंजामिन नेतन्याहू लंबे समय से ईरान को इजरायल की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताते रहे हैं। उनका आरोप रहा है कि तेहरान परमाणु हथियार हासिल करने की दिशा में लगातार आगे बढ़ रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, इजरायली नेतृत्व को अब भी शक है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर वास्तविक और स्थायी प्रतिबंध स्वीकार नहीं करेगा।
अमेरिकी राजनीति में भी उठ रहे सवाल
अमेरिका में कई रिपब्लिकन नेता और इजरायल समर्थक विश्लेषक भी इस समझौते को लेकर सवाल उठा रहे हैं। राजनीतिक टिप्पणीकार मार्क लेविन ने इसे बेअसर करार देते हुए कहा कि इस डील का कोई खास मतलब नहीं है। लुइसियाना से सीनेटर बिल कैसिडी ने भी समझौते की आलोचना करते हुए कहा कि ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं पर प्रभावी रोक नहीं लगाई गई है। उनका कहना है कि ईरान भविष्य में होर्मुज जलडमरूमध्य को दबाव के हथियार के रूप में फिर इस्तेमाल कर सकता है। वहीं टेक्सास के सीनेटर टेड क्रूज ने समझौते से जुड़े आर्थिक पैकेज पर सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या इससे ईरान को सैकड़ों अरब डॉलर की राहत मिलने वाली है। अमेरिका के पूर्व उपराष्ट्रपति माइक पेंस ने भी ट्रंप प्रशासन से सतर्क रहने की सलाह दी है।
लेबनान बना सबसे बड़ा पेच
इस पूरे समझौते में सबसे ज्यादा विवाद लेबनान को लेकर दिखाई दे रहा है। एमओयू में लेबनान समेत सभी मोर्चों पर सैन्य गतिविधियां खत्म करने और क्षेत्रीय संप्रभुता का सम्मान करने की बात कही गई है। हालांकि समस्या यह है कि इस समझौते पर न तो इजरायल ने हस्ताक्षर किए हैं और न ही लेबनान ने। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जमीनी स्तर पर युद्धविराम जैसी शर्तों को लागू कौन और कैसे करेगा। इसके अलावा समझौते में यह भी स्पष्ट नहीं किया गया है कि ईरान समर्थित संगठन हिजबुल्लाह के साथ भविष्य में कैसा व्यवहार होगा और क्या तेहरान को उसके लिए समर्थन रोकना होगा।
‘हम इस समझौते से बंधे नहीं हैं’
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बेंजामिन नेतन्याहू ने डोनाल्ड ट्रंप से कहा है कि इजरायल खुद को इस समझौते से बाध्य नहीं मानता। हाल ही में नेतन्याहू ने कहा था कि हमने गाजा, लेबनान और सीरिया में इजरायल की सुरक्षा के लिए मजबूत सुरक्षा क्षेत्र बनाए हैं। इजरायल के रक्षा मंत्री इजराइल काट्ज ने भी कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि इजरायली सेना लेबनान, सीरिया और गाजा में सुरक्षा क्षेत्रों में अनिश्चितकाल तक बनी रहेगी ताकि सीमा और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
ट्रंप और नेतन्याहू के बीच बढ़ रही दूरी?
अमेरिका-ईरान समझौते ने ट्रंप और नेतन्याहू के बीच सोच का अंतर भी उजागर कर दिया है। ट्रंप क्षेत्र में बड़े युद्ध को टालकर कूटनीतिक समाधान चाहते हैं, जबकि नेतन्याहू मानते हैं कि ईरान और उसके सहयोगी संगठनों पर लगातार दबाव बनाए रखना ही इजरायल की सुरक्षा के लिए जरूरी है।












