डाक वोट पर ट्रंप की नई चाल पर सुप्रीम कोर्ट का ब्रेक! मिडटर्म चुनाव से पहले बड़ा फैसला

वॉशिंगटन। अमेरिका में मध्यावधि चुनाव से पहले डाक से मतदान को लेकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन और सुप्रीम कोर्ट के बीच अहम कानूनी मामला सामने आया है। अदालत ने ट्रंप प्रशासन की ओर से मेल मतपत्रों के नियमों में बड़े बदलाव की योजना को फिलहाल रोक दिया है। इसका मतलब है कि राज्य अभी अपनी पुरानी प्रक्रिया के तहत मतदाताओं को डाक मतपत्र भेज सकेंगे। यह फैसला ऐसे समय आया है, जब कई राज्यों में मेल वोटिंग शुरू हो चुकी है। चुनाव अधिकारियों ने नई व्यवस्था को इतने कम समय में लागू करने को मुश्किल बताया था।
ट्रंप की योजना पर क्यों लगी रोक?
ट्रंप प्रशासन डाक मतपत्रों की पूरी प्रक्रिया में एक जैसी व्यवस्था लागू करना चाहता था। प्रस्ताव के तहत सभी राज्यों में मतपत्रों के लिफाफे एक तय तरीके के होने थे। इसके अलावा पात्र मतदाताओं की जानकारी एक ऑनलाइन सिस्टम पर जमा करने की योजना थी। नियमों का पालन नहीं करने वाले राज्यों के मतपत्रों को डाक सेवा के जरिए भेजने से रोका जा सकता था लेकिन चुनाव अधिकारियों ने इस योजना को लेकर व्यावहारिक दिक्कतें बताईं। उनका कहना था कि चुनाव से कुछ सप्ताह पहले मतदान व्यवस्था में इतना बड़ा बदलाव करना आसान नहीं है। कई राज्यों में पुरानी प्रक्रिया के तहत काम पहले ही शुरू हो चुका था। ऐसे में नई व्यवस्था लागू करने से मतदाताओं को परेशानी होने और मतपत्रों पर असर पड़ने की आशंका जताई गई।
तकनीकी गड़बड़ी से बढ़ी चिंता
नई व्यवस्था को लेकर तकनीकी सवाल भी उठे थे। एक व्हिसलब्लोअर रिपोर्ट में दावा किया गया कि प्रस्तावित ऑनलाइन सिस्टम पूरी तरह तैयार नहीं था। इसमें कोड या बारकोड से जुड़ी छोटी गलती भी बड़ी समस्या पैदा कर सकती थी। आशंका थी कि किसी तकनीकी गलती की वजह से बड़ी संख्या में डाक मतपत्र प्रभावित हो सकते हैं।
इसी वजह से चुनाव अधिकारियों ने जल्दबाजी में बदलाव करने के बजाय मौजूदा व्यवस्था जारी रखने पर जोर दिया। अलाबामा, नॉर्थ कैरोलिना और विस्कॉन्सिन जैसे राज्यों में डाक मतपत्र भेजने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी।
सुप्रीम कोर्ट में किस बात पर हुआ विवाद?
ट्रंप प्रशासन ने निचली अदालतों के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सरकार का तर्क था कि अमेरिकी डाक सेवा पर संघीय सरकार के अधिकारों के आधार पर मेल मतपत्रों से जुड़े कुछ नियम तय किए जा सकते हैं। वहीं, डेमोक्रेटिक राज्य अधिकारियों और मतदान अधिकार संगठनों ने इसका विरोध किया। उनका कहना था कि राष्ट्रपति के पास राज्यों की चुनाव प्रक्रिया में इस तरह का व्यापक बदलाव करने का संवैधानिक अधिकार नहीं है। निचली अदालतों ने भी ट्रंप प्रशासन की योजना पर रोक लगाई थी। इसके बाद मामला देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंचा।
दो जजों ने फैसले का विरोध किया
सुप्रीम कोर्ट के संक्षिप्त आदेश से ट्रंप प्रशासन को फिलहाल राहत नहीं मिली। जस्टिस सैमुअल एलिटो और जस्टिस क्लेरेंस थॉमस ने इस आदेश से असहमति जताई। वहीं जस्टिस ब्रेट कवानुघ ने माना कि प्रस्तावित नियम मध्यावधि चुनाव के दौरान लागू नहीं किए जाने चाहिए। हालांकि, उन्होंने यह संकेत भी दिया कि आगे चलकर मामले की कानूनी वैधता पर ट्रंप प्रशासन के पक्ष में फैसला संभव है।
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डाक वोट पर ट्रंप का पुराना रुख
ट्रंप लंबे समय से डाक से मतदान की व्यवस्था पर सवाल उठाते रहे हैं। उन्होंने 2020 के राष्ट्रपति चुनाव में जो बाइडेन से अपनी हार के लिए मेल वोटिंग को जिम्मेदार बताया था, हालांकि चुनाव में बड़े पैमाने पर धांधली के उनके दावों को साबित करने वाला कोई आधार नहीं मिला। इसके बावजूद ट्रंप खुद भी अलग-अलग मौकों पर डाक के जरिए मतदान कर चुके हैं। अमेरिका में बड़ी संख्या में मतदाता मेल वोटिंग का इस्तेमाल करते हैं।




















