PU Special :महाराष्ट्र की मिट्टी, मप्र में ड्यूटी और गणपति की भक्ति, महाराष्ट्र मूल के IAS के लिए गणेशोत्सव बचपन से मिले संस्कारों का हिस्सा

पुष्पेन्द्र सिंह, भोपाल। महाराष्ट्र में गणेश उत्सव केवल घर में प्रतिमा स्थापना तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दस दिनों तक सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन भी गणराया के रंग में रंगा रहता है। मध्यप्रदेश में भी गणपति के प्रति आस्था गहरी है, लेकिन यहां घरों में स्थापना की परंपरा अधिक दिखाई देती है। मध्यप्रदेश में प्रशासनिक जिम्मेदारी संभाल रहे महाराष्ट्र मूल के IAS अधिकारियों के लिए यह उत्सव अपनी जड़ों से जुड़े रहने का मौका भी है। बचपन के गणेश मंडल से शुरू हुआ रिश्ता IAS बनने के बाद भी कायम है, बस भूमिका बदल गई है-तब आयोजन में हाथ बंटाते थे, अब प्रशासनिक जिम्मेदारी भी साथ होती है।
संकेत भोंडवे: मंडल के कार्यकारी सदस्य से IAS तक
आयुक्त नगरीय विकास एवं आवास संकेत भोंडवे बताते हैं कि उनके गांव में सौ साल से अधिक समय से गणेश प्रतिमा स्थापित करने की परंपरा चली आ रही है। बचपन में वे कॉलोनी के गणेश उत्सव मंडल के कार्यकारी सदस्य रहे। मंडप के लिए रस्सी बांधने, कील ठोकने से लेकर रात में जागरण और प्रसाद बांटने तक के काम किए। इन अनुभवों ने सामूहिकता और साथ मिलकर काम करने की सीख दी। गणेश उत्सव से जुड़ी एक और बचपन की स्मृति IAS बनने के सपने से जुड़ती है। गणेश आयोजनों में जब IAS-IPS अधिकारी प्रसाद बांटने आते थे, तो उन्हें देखकर लगता था कि वे भी कभी उन्हीं की तरह बनेंगे। पिछले 10-15 वर्षों से वे मध्यप्रदेश में अपने घर गणपति स्थापित करते आ रहे हैं। व्यस्तता के कारण आरती में शामिल न हो पाएं तो परिवार परंपरा निभाता है। वे कहते हैं कि घर में गणपति स्थापना का एक उद्देश्य बच्चों को भारतीय संस्कृति, कला और धर्म से जोड़ना भी है। वे महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश की गणेश परंपरा में मूल भाव समान मानते हैं। फर्क उन्हें आयोजन के तरीके में दिखाई देता है-महाराष्ट्र में सामुदायिक आयोजन अधिक व्यापक हैं, जबकि मध्यप्रदेश मंह घरों में स्थापना ज्यादा होती है।
स्वप्निल वानखड़े: महाराष्ट्र से दूर, बप्पा के साथ
दतिया कलेक्टर स्वप्निल वानखड़े ने इस बार भी अपने सरकारी आवास पर गणपति स्थापित की है। महाराष्ट्र से दूर रहते हुए भी उनके लिए यह परिवार की परंपरा को आगे बढ़ाने का माध्यम है। उनके मुताबिक जगह और जिम्मेदारियां बदलती रहती हैं, लेकिन गणपति के आगमन का उत्साह नहीं बदलता। उनके लिए गणेश उत्सव पूजा के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक सीख का माध्यम भी रहा। आज वही उत्सव उनके लिए निजी आस्था के साथ प्रशासनिक जिम्मेदारी भी लेकर आता है। बचपन में उन्हें आरती और प्रसाद का इंतजार रहता था, अब यह भी देखना होता है कि जिले में आयोजन सुरक्षित हों, यातायात सुचारु रहे और विसर्जन शांतिपूर्ण हो। इसके बावजूद वे परिवार के साथ आरती के लिए समय निकालने की कोशिश करते हैं, चाहे कितनी भी देर से पहुंचें। गणेश उत्सव शुरू होते ही महाराष्ट्र में रहने वाली उनकी मां का फोन भी आता है-गणपति की स्थापना हुई या नहीं, आरती की या नहीं। बानखड़े के लिए ये छोटे सवाल बड़ी प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बीच बचपन और परिवार से जोड़ने वाली कड़ी हैं। दोनों अधिकारियों के अनुभव बताते हैं कि महाराष्ट्र से मध्यप्रदेश तक गणेश उत्सव का रूप भले बदले, आस्था की डोर नहीं बदलती। बचपन में गणेश मंडल और परिवार से मिले संस्कार IAS बनने के बाद भी साथ रहते हैं। फर्क इतना है कि उत्सव के बीच अब निजी भक्ति के साथ पूरे जिले की जिम्मेदारी भी निभानी होती है।
ये भी पढ़ें: सात करोड़ के आभूषणों से सजे खजराना गणपति, चढ़ाए गए हीरे जड़ित नए नेत्र




















