स्विट्जरलैंड। मिडिल ईस्ट के बढते तनाव के बीच स्विट्जरलैंड ने अमेरिका के सैन्य विमानों के लिए अपने हवाई बेस पर रोक लगा दी है। सरकार का कहना है कि यह कदम देश की लंबे समय से चली आ रही तटस्थता यानि Neutrality नीति के अनुरूप है। स्विट्जरलैंड किसी भी युद्ध में सीधे भाग नहीं लेता और किसी सैन्य गठबंधन का सदस्य भी नहीं है।
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यह निर्णय ऐसे समय आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव चरम पर है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हाल ही में स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में युद्धपोत भेजने के लिए अन्य देशों से आग्रह किया था। इसका कारण ईरान की धमकी थी, जिसने अमेरिका के खार्ग द्वीप पर बमबारी के जवाब में कार्रवाई करने की चेतावनी दी थी।
स्विट्ज़रलैंड सरकार ने बयान में कहा कि स्विस फेडरल काउंसिल ने अमेरिका के कुछ सैन्य विमान के ओवरफ्लाइट अनुरोधों का निर्णय लिया है। ईरान युद्ध से जुड़े दो अनुरोध अस्वीकार कर दिए गए हैं। वहीं एक मेंटेनेंस उड़ान और दो परिवहन विमान की उड़ानों को मंजूरी दी गई है।
स्विट्जरलैंड ने दो अमेरिकी रीकॉन्सेंस विमान की उड़ानों को अस्वीकार किया। ये विमान मुख्य रूप से खुफिया और निगरानी के लिए इस्तेमाल होते हैं।
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इसके अलावा, तीन अन्य उड़ानों को अनुमति दी गई, जिनमें दो परिवहन विमान शामिल थे। इसका मतलब है कि जरूरी सप्लाई और मेंटेनेंस उड़ानों को गुजरने की अनुमति मिली, लेकिन युद्ध से सीधे जुड़े ऑपरेशनों की अनुमति नहीं दी गई।
स्विट्जरलैंड का Neutrality कानून कहता है कि देश किसी युद्ध में भाग नहीं लेगा, किसी सशस्त्र संघर्ष में शामिल नहीं होगा और किसी सैन्य गठबंधन का सदस्य नहीं होगा। यही वजह है कि स्विट्ज़रलैंड ने अमेरिका के युद्ध संबंधित अनुरोधों को ठुकराया।
28 फरवरी, 2026 से अमेरिका और इजराइल की ओर से ईरान पर हमले शुरू हुए। इसके बाद ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई की। अब युद्ध अपने तीसरे हफ्ते में प्रवेश कर चुका है। दोनों पक्षों ने शांति वार्ता के प्रस्ताव खारिज कर दिए हैं और लड़ाई जारी रखने का एलान किया है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने खार्ग द्वीप पर हमले के बाद कहा कि ईरान 'पूरी तरह से तबाह' हो चुका है। वहीं, तेहरान ने अमेरिका को चेतावनी दी है कि वे अपने उद्योग और महत्वपूर्ण संसाधनों को क्षेत्र से निकाल लें, नहीं तो और जवाब दिया जाएगा।
इस संघर्ष में अब तक 2,000 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें ज्यादातर ईरान के नागरिक हैं। युद्ध के कारण तेल की आपूर्ति में भारी बाधा आई है, जिससे वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतें बढ़ गई हैं। यह अब तक का सबसे बड़ा तेल आपूर्ति संकट बन गया है।