वंदे मातरम न गाने पर सजा का सवाल, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब; 12 अक्टूबर को अगली सुनवाई

धार्मिक मान्यताओं या अंतरात्मा की स्वतंत्रता के कारण राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ नहीं गाने वाले व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है या नहीं, अब सुप्रीम कोर्ट इस कानूनी सवाल पर सुनवाई करेगा। मंगलवार को हुई सुनवाई में अदालत ने केंद्र सरकार से अपना पक्ष रखने को कहा। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वंदे मातरम के स्वरूप या इसे कितने कड़वों में गाया जाना चाहिए, यह तय करना अदालत का विषय नहीं है। फिलहाल सुनवाई का दायरा इसके अपमान और उससे जुड़े दंड के कानूनी प्रावधानों तक सीमित रहेगा। यह मामला कर्नाटक के संगीतकार और मैग्सेसे पुरस्कार विजेता टी. एम. कृष्णा की याचिका से जुड़ा है। उन्होंने प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट्स टू नेशनल ऑनर एक्ट, 1971 में किए गए हालिया संशोधन और वंदे मातरम से जुड़े दंडात्मक प्रावधानों को चुनौती दी है। याचिका में धार्मिक स्वतंत्रता और अंतरात्मा की आजादी के अधिकार का हवाला दिया गया है।
धार्मिक कारणों से नहीं गाने और जानबूझकर रोकने में अंतर
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि किसी व्यक्ति का शांतिपूर्वक गीत नहीं गाना और किसी दूसरे व्यक्ति को गीत गाने से जानबूझकर रोकना या उसके गायन में बाधा डालना एक जैसी स्थिति नहीं है। याचिका में तर्क दिया गया है कि संविधान व्यक्ति को धार्मिक स्वतंत्रता और अंतरात्मा की आजादी देता है। याचिकाकर्ता का पक्ष है कि किसी व्यक्ति को उसकी धार्मिक मान्यताओं के विपरीत किसी गीत को गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने इसी संवैधानिक और कानूनी सवाल पर केंद्र का पक्ष जानने के लिए याचिका की प्रति सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को देने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को होगी।
वंदे मातरम से जुड़े दंड प्रावधान को चुनौती
याचिका में 1971 के कानून में किए गए उस बदलाव को चुनौती दी गई है जिसके तहत राष्ट्रगीत के गायन में जानबूझकर बाधा डालने या उसके अपमान से जुड़े कृत्यों पर आपराधिक दंड का प्रावधान किया गया है। संशोधित व्यवस्था में दोष सिद्ध होने पर तीन साल तक की सजा, जुर्माना या दोनों का प्रावधान बताया गया है। सुप्रीम कोर्ट फिलहाल इस बात की जांच कर रहा है कि इन दंडात्मक प्रावधानों का धार्मिक स्वतंत्रता और अंतरात्मा की आजादी जैसे संवैधानिक अधिकारों के साथ किस तरह संबंध बनता है।
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बिजॉय इमैनुएल मामले का भी हुआ उल्लेख
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के 1986 के बिजॉय इमैनुएल बनाम केरल फैसले का भी उल्लेख हुआ। उस मामले में जेहोवा विटनेस संप्रदाय के कुछ स्कूली बच्चों ने अपने धार्मिक विश्वासों के कारण राष्ट्रगान नहीं गाया था लेकिन वे राष्ट्रगान के दौरान सम्मानपूर्वक खड़े रहे थे। सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले में कहा था कि केवल इसलिए कि बच्चों ने अपने धार्मिक विश्वास के कारण राष्ट्रगान नहीं गाया, इसे अपने आप में राष्ट्रगान का अनादर नहीं माना जा सकता, जबकि उन्होंने सम्मानपूर्वक खड़े होकर अपना व्यवहार किया था। बाद की सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक सामग्री में भी इस फैसले के इसी सिद्धांत को दर्ज किया गया है।
सुनवाई के दौरान तुषार मेहता की टिप्पणी पर आपत्ति
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की एक टिप्पणी को लेकर कुछ देर के लिए अदालत में बहस हुई। रिपोर्टों के मुताबिक मेहता ने कहा कि नक्सलियों के हिसाब से निर्णय नहीं लिए जाएंगे। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर ने इस टिप्पणी पर आपत्ति जताई। रिपोर्टों के अनुसार मेहता ने टिप्पणी वापस लेने से इनकार किया और स्पष्ट किया कि उनका संदर्भ उन लोगों से था जो संवैधानिक प्रक्रिया का सम्मान नहीं करते।
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अब केंद्र के जवाब पर रहेगी नजर
सुप्रीम कोर्ट ने अभी यह अंतिम फैसला नहीं दिया है कि धार्मिक मान्यताओं या अंतरात्मा के आधार पर वंदे मातरम नहीं गाने वाले व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है या नहीं। अदालत ने इस कानूनी पहलू पर केंद्र सरकार का पक्ष मांगा है। अगली सुनवाई में केंद्र की दलीलों के बाद अदालत यह देखेगी कि राष्ट्रगीत से जुड़े दंडात्मक प्रावधानों की सीमा क्या है और उनका संवैधानिक अधिकारों के साथ किस तरह संतुलन बनाया जा सकता है। 12 अक्टूबर को होने वाली सुनवाई इस मामले में अगला महत्वपूर्ण चरण होगी।




















